
राम जन्मभूमि ट्रस्ट चढ़ावा मामले में CBI जांच की मांग वाली याचिका खारिज (फोटो सोर्स : भाषा संवाद WhatsApp News Group)
Ram Janmabhoomi Temple Donation Case: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट में कथित चढ़ावा चोरी प्रकरण की केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग वाली जनहित याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया। राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि इसी विषय से संबंधित मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, ऐसे में समान विषय पर उच्च न्यायालय में याचिका पर विचार किए जाने का कोई औचित्य नहीं बनता। दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायालय ने याचिका को निरस्त कर दिया।
यह याचिका मोहित अशोक द्वारा दाखिल की गई थी। याचिका में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ट्रस्ट में कथित चढ़ावा चोरी के मामले की निष्पक्ष जांच के लिए CBI जांच कराने की मांग की गई थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जानी चाहिए ताकि पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच हो सके और यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसके तथ्य सामने आ सकें। सुनवाई के दौरान अदालत ने याचिका की ग्राह्यता और मामले की वर्तमान कानूनी स्थिति पर भी विस्तार से विचार किया।
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता (AAG) विनोद शाही तथा मुख्य स्थायी अधिवक्ता (CSC) शैलेंद्र सिंह ने न्यायालय के समक्ष पक्ष रखा। उन्होंने अदालत को अवगत कराया कि इसी विषय से संबंधित याचिका पहले से ही सुप्रीम कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है।
सरकारी पक्ष का कहना था कि जब एक ही विषय सर्वोच्च न्यायालय में लंबित है, तब उसी मुद्दे पर उच्च न्यायालय में समान राहत की मांग करने वाली याचिका पर सुनवाई का कोई औचित्य नहीं है। उन्होंने न्यायालय से याचिका खारिज करने का अनुरोध किया।
मामले की सुनवाई जस्टिस राजन राय और जस्टिस मंजीव शुक्ला की खंडपीठ ने की। अदालत ने याचिकाकर्ता और राज्य सरकार दोनों की ओर से प्रस्तुत तर्कों को विस्तार से सुना। सुनवाई के दौरान न्यायालय ने इस बात पर विशेष ध्यान दिया कि जिस विषय पर याचिका दाखिल की गई है, वह पहले से ही सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन बताया गया है। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए अदालत ने याचिका को स्वीकार करने का आधार नहीं पाया।
भारतीय न्याय व्यवस्था में सामान्यतः यदि किसी विषय पर उच्चतम न्यायालय में मामला विचाराधीन हो, तो उसी विषय पर समान प्रकृति की याचिकाओं पर अन्य अदालतें सावधानीपूर्वक निर्णय लेती हैं। इस मामले में भी राज्य सरकार ने इसी सिद्धांत का हवाला देते हुए अदालत को बताया कि समान मुद्दे पर सर्वोच्च न्यायालय पहले से सुनवाई कर रहा है। न्यायालय ने उपलब्ध तथ्यों और प्रस्तुत दलीलों के आधार पर यह माना कि वर्तमान परिस्थितियों में याचिका पर अलग से विचार करना उचित नहीं होगा।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। अदालत के इस आदेश के साथ फिलहाल उच्च न्यायालय में इस मामले की कार्यवाही समाप्त हो गई है। हालांकि संबंधित विषय सर्वोच्च न्यायालय में लंबित होने के कारण आगे की कानूनी प्रक्रिया वहीं जारी रहेगी।
कानूनी विशेषज्ञ अनुराग रस्तोगी का मानना है कि न्यायालयों द्वारा किसी मामले की सुनवाई के दौरान न्यायिक प्रक्रिया और स्थापित सिद्धांतों का पालन सर्वोपरि होता है। यदि किसी विषय पर पहले से सक्षम न्यायालय में सुनवाई चल रही हो, तो समान प्रकृति के मामलों में न्यायालय उस तथ्य को महत्वपूर्ण आधार मानते हैं। इसी सिद्धांत के अनुरूप लखनऊ पीठ ने भी अपने समक्ष दाखिल याचिका पर निर्णय देते हुए उसे खारिज कर दिया।
लखनऊ पीठ के इस आदेश के बाद अब इस पूरे प्रकरण में आगे की कानूनी कार्रवाई और संभावित निर्णय पर निगाहें सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही पर टिकी रहेंगी। चूंकि राज्य सरकार ने अदालत को स्पष्ट रूप से बताया कि संबंधित मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, इसलिए अब उसी मंच पर आगे की सुनवाई और न्यायिक प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी।
फिलहाल, इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ खंडपीठ द्वारा याचिका खारिज किए जाने के साथ इस चरण की न्यायिक प्रक्रिया समाप्त हो गई है, जबकि संबंधित मामले में अंतिम कानूनी स्थिति सर्वोच्च न्यायालय में होने वाली सुनवाई और उसके आदेशों के आधार पर स्पष्ट होगी।
Updated on:
06 Jul 2026 02:09 pm
Published on:
06 Jul 2026 02:05 pm
