5 फ़रवरी 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

क्या 2027 में जाटव वोट बैंक बचा पाएंगी मायावती? बसपा के लिए यह रहेगी चुनौती

2007 में सत्ता के शिखर पर रही बसपा आज राजनीतिक संघर्ष के दौर में है। लगातार गिरता वोट शेयर, जाटव समुदाय का सपा की ओर रुझान और बीजेपी के खिलाफ नरमी का आरोप पार्टी को नुकसान पहुंचा रहा है।

3 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Anuj Singh

Jan 15, 2026

मायावती की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू

मायावती की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू Source- X

Mayawati 70th Birthday: बहुजन समाज पार्टी (बसपा) प्रमुख मायावती आज अपना 70वां जन्मदिन मना रही हैं। यह मौका सिर्फ जश्न का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है। कांशीराम की राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाने वाली मायावती आज उस दौर में खड़ी हैं, जहां पार्टी का कोर वोट बैंक जाटव समुदाय खिसकता हुआ नजर आ रहा है। ऐसे में 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या मायावती जाटव वोट बैंक को एक बार फिर अपने साथ जोड़ पाएंगी?

अखिलेश पर तीखे हमले, योगी पर नरमी

हाल ही में बसपा संस्थापक कांशीराम की पुण्यतिथि पर आयोजित रैली में मायावती ने बड़ी भीड़ जुटाई। लेकिन राजनीतिक संदेशों के लिहाज से यह रैली खास रही। मंच से मायावती के सबसे तीखे हमले सपा और कांग्रेस पर रहे। सपा प्रमुख अखिलेश यादव पर उनकी भाषा जितनी तल्ख थी, उतनी ही नरमी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए दिखी। यही वजह है कि पिछले कुछ वर्षों से बसपा को 'बीजेपी की बी-टीम' कहे जाने का नैरेटिव मजबूत हुआ है। इस राजनीतिक धारणा का सीधा फायदा यूपी में मुख्य विपक्षी दल सपा को मिलता दिख रहा है।

लोकसभा में बसपा का सिमटना

उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से 17 सीटें अनुसूचित जाति (SC) के लिए आरक्षित हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में इन 17 में से बीजेपी ने 8 सीटें जीतीं, समाजवादी पार्टी को 7 सीटें मिलीं, कांग्रेस और आज़ाद समाज पार्टी (चंद्रशेखर) को 1-1 सीट, बसपा का खाता शून्य रहा। यह आंकड़ा बसपा के लिए इसलिए भी चिंताजनक है, क्योंकि 2019 में पार्टी ने 10 सीटें जीती थीं, जबकि 2024 में वह पूरी तरह बाहर हो गई।

जाटव वोटर का सपा की ओर झुकाव

मायावती के लिए सबसे बड़ी चिंता सिर्फ सीटों की नहीं, बल्कि कोर जाटव वोट बैंक की है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जाटव समुदाय का एक बड़ा हिस्सा अब सपा की ओर शिफ्ट हो रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में सपा के दो जाटव उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की-जालौन से नारायण दास अहरिवार, इटावा से जितेंद्र दोहरे। दूसरी ओर, बीजेपी पहले ही गैर-जाटव दलित वोट बैंक में मजबूत पैठ बना चुकी है। इसका असर सीधे वोट प्रतिशत में दिख रहा है।

2007 से शुरू हुई गिरावट की कहानी

बसपा का स्वर्णिम दौर 2007 का विधानसभा चुनाव माना जाता है, जब पार्टी ने 30.40% वोट शेयर और 206 सीटें के साथ पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई थी। इसके बाद गिरावट का सिलसिला शुरू हुआ:-

2012: 25.90% वोट, 80 सीटें

2017: 22.20% वोट, 19 सीटें

2022: 12.90% वोट, सिर्फ 1 सीट

इसके उलट सपा का ग्राफ ऊपर गया

2017: 21.90% वोट, 47 सीटें

2022: 32.10% वोट, 111 सीटें

2022 में बसपा को करीब 10 फीसदी वोटों का नुकसान हुआ और लगभग उतने ही वोट सपा के खाते में जुड़े। इसका सीधा असर सीटों की संख्या में उछाल के रूप में दिखा।

लोकसभा और विधानसभा में घटता वोट शेयर

अगर बसपा के लंबे राजनीतिक सफर पर नजर डालें, तो तस्वीर और साफ होती है कि कैसे बसपा का वोट शेयर 2009 के बाद लगातार गिर रह है।

लोकसभा चुनावों में वोट शेयर- 2009: 6.33% (21 सीटें), 2019: 3.67% (10 सीटें) 2024: 2.07% (0 सीटें)।

विधानसभा चुनावों में वोट शेयर- 2007: 30.40% (206 सीटें), 2017: 22.20% (19 सीटें), 2022: 12.90% (1 सीट) ये आंकड़े बताते हैं कि बसपा का जनाधार लगातार सिकुड़ रहा है।

2027 में क्या है मायावती की चुनौती?

2027 के विधानसभा चुनाव में मायावती के सामने कई सवाल खड़े हैं- क्या बसपा जाटव समुदाय की खोई हुई भरोसे की डोर फिर से जोड़ पाएगी?, क्या पार्टी सिर्फ प्रतीकात्मक राजनीति से आगे बढ़कर ग्राउंड पर सक्रियता दिखाएगी?, क्या मायावती विपक्ष की भूमिका में स्पष्ट रूप से बीजेपी के खिलाफ खड़ी होंगी?

जन्मदिन के जश्न के बीच सियासी परीक्षा

मायावाती आज 70 साल की हो गईं हैं। एक समय यूपी की गद्दी पर राज करने वाली बसपा आज कहीं दूर दिखाई दे रही है, जो न ही पार्टी के भविष्य के लिए और ना ही खुद मायावती के राजनितीक भविष्य के लिए अच्छा है। पार्टी और मायावती के लिए 2027 का विधानसभा चुनाव बहुत ही अहम रहने वाला है, क्योंकि इस चुनाव के बाद पार्टी का भविष्य आगे कैसा रहेगा, वो सबित हो जाएगा।