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85 सीटों को साधने के लिए मायावती ने दो ब्राह्मणों को मैदान में उतारा

सतीश चंद्र मिश्र और उपाध्याय का परिवार जुटा वोट जुटाने में, दलितों और पंडितों का गठजोड़ बसपा को करेगा मजबूत

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Mahendra Pratap Singh

Sep 22, 2016

Mayawati

Mayawati

पत्रिका एक्सक्लूसिव

लखनऊ. बसपा सुप्रीमो मायावती अपनी पिछली गलतियों से सीख ले चुकी हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में वे वही गलती नहीं दोहराना चाहतीं जो उन्होंने 2012 में की थीं। यह मानना है राजनीतिक पंडितों का। विश्लेषकों की मानें तो बहुजन समाज पार्टी उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनावों में दलित-मुस्लिम-ब्राह्मण समीकरण दुरुस्त करके बड़ा धमाका कर सकती है। यही नहीं मायावती ने उत्तर प्रदेश की कुल 403 विधानसभाओं में से आरक्षित 85 सीटों पर भी अपना ध्यान केंन्द्रित किया है। 2012 के चुनावों में बसपा को इन 85 सीटों में से महज 16 सीटों पर ही जीत हासिल हुई थी। इसीलिए इस बार मायावती आरक्षित सीटों पर दलितों को साधने के साथ ही ब्राह्मण कार्ड खेलने की तैयारी में हैं।

सिपहसालार को मैदान में उतारा
मायावती 2017 के चुनाव में दलित-ब्राह्मण की सोशल इंजीनियरिंग का प्रयोग एक बार फिर से आजमाना चाहती हैं। इसके लिए उन्होंने पूरा खाका तैयार कर लिया है और अपने सबसे विश्वसनीय साथी सतीश चंद्र मिश्रा को इसकी जिम्मेदारी सौंपी है। बसपा सुप्रीमो ने अपनी पार्टी के ब्राह्मण नेताओं को प्रदेश की 85 सुरक्षित सीटों में मेहनत करने का निर्देश दिया है ताकि उन सीटों पर दलित वोट के अलावा बसपा के खाते में सवर्ण वोट भी आएं। सवर्ण और परंपरागत दलित वोट के गठजोड़ से ही बसपा की नैया पार लग सकती है।

रामवीर को भी जिम्मेदारी
मायावती अपने खास सहयोगी सतीश चंद्र मिश्रा से 85 सुरक्षित सीटों में कम से कम 30 जनसभाएं करवाना चाहती हैं। जबकि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आने वाली अन्य 23 सुरक्षित सीटों पर प्रचार की कमान बसपा विधायक रामवीर उपाध्याय के हाथों में होगी। सतीश मिश्रा 25 सितंबर को कौंशांबी से अपने अभियान की शुरुआत करेंगे। मिश्रा की प्रत्येक जनसभाएं कम से कम दो सुरक्षित विधानसभाओं के क्षेत्रों को कवर करेंगी। इस पूरी कवायद में मिश्रा की मदद उनके समधी गोपाल नारायण और उनके दामाद परेश मिश्रा के अलावा अन्य परिवार वाले लोग भी करेंगे। गोपाल बसपा से विधान परिषद के सदस्य रह चुके हैं जबकि परेश वकील हैं और प्रदेश के 7 संभागों में काफी एक्टिव हैं। ऐसे ही रामवीर उपाध्याय की मदद में उनकी पत्नी सीमा उपाध्याय और भाई मुकुल नजर आएंगे। सीमा पूर्व सांसद हैं जबकि मुकुल पूर्व विधान परिषद सदस्य।

ब्राह्मण वोट महत्वपूर्ण
मायावती ने यह कदम अपनी पार्टी का इतिहास खंगाल कर उठाया है। बसपा को 2012 में 85 आरक्षित सीटों में से केवल 16 सीटें ही मिली थीं। 2007 में यह आंकड़े बिल्कुल उलट थे। 2007 के चुनावों में दलित-ब्राह्मण संयोजन से बसपा को 61 सुरक्षित सीटों पर जीत दिलाई थी। 1993 में बसपा को 23 आरक्षित सीटों पर जीत मिली थी जबकि 1996 में 20 और 2002 में 24। आरक्षित सीटों पर बसपा का कमजोर प्रदर्शन साबित करता है कि दलित वोट पिछले चुनाव में कई राजनीतिक दलों में बंटा।

ये है माया का गणित
उत्तर प्रदेश की कुल आबादी का 21 प्रतिशत हिस्सा दलित है। यह वर्ग बसपा का पारंपरिक वोट बैंक है। लेकिन, मायावती यह जानती हैं कि केवल दलित वोटों के दम पर यूपी का चुनावी रण नहीं जीता जा सकता। इसीलिए मायावती कोई सॉलिड वोट बैंक तलाश रही हैं जिसके गठबंधन से सत्ता हासिल की जा सके। 11 प्रतिशत ब्राह्मण वोट बैंक को ध्यान रखते हुए 2007 और 2012 के विधानसभा चुनावों में मायावती ने ब्राह्मण कार्ड खेला था।2012 के चुनावों से सबक लेकर इस बार मायावती मुस्लिम वोट बैंक को साधने की कोशिश भी कर रही हैं। क्योंकि सपा से टूटकर अगर मुस्लिम वोट बैंक बसपा से जुड़ा तो विधानसभा की तस्वीर बदल सकती है।
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