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बनारस की हवा मुर्दों के बदन में रूह फूंक देती है… मिर्जा गालिब ने काशी को कहा था काबा-ए-हिंदुस्तान

गालिब ने बनारस के सफर के दौरान बनारस के बारे में जो लिखा वो खूब मशहूर हुई। बनारस पहुंचकर जब गालिब ने वहां 3 हफ़्ते गुजारे तो पूरे बनारस को अपनी कलम की तहरीर दे दी।

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लखनऊ

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Nazia Naaz

Dec 27, 2022

आगरा औऱ बनारस से था गालिब को खास लगाव

हुई मुद्दत के गालिब मर गया पर याद आता है, वो हर बात पर कहना कि यूं होता तो क्या होता... हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन दिल को बहलाने को गालिब ये ख्याल अच्छा है..

आप मिर्जा गालिब के इन शेर से कभी ना कभी जरूर रूबरू हुए होंगे। मिर्जा गालिब के ऐसे तमाम शेर हैं, जिन्हें सुनकर और सुनाकर आप महफिलें जमाते होंगे, आज इन्हीं मिर्जा गालिब की बर्थ एनिवर्सरी है।

बनारस में जनन्त सी हवा चलती है

मिर्जा गालिब की बनारस-यात्रा मशहूर है। बनारस में गालिब ने 3 हफ्ते गुजारे। गालिब ने अपने दोस्त मौलवी मोहम्मद अली खां को एक खत लिखा। इस खत में गालिब ने बनारस में रहते वक्त अपने दिल में चल रही बातों का जिक्र किया। गालिब ने अपने खत में लिखा कि

''जब मैं बनारस में दाखिल हुआ, उस दिन पूरब की तरफ़ से जान बख्शने वाली, जन्नत की- सी हवा चली, जिसने मेरे बदन को तवानाई अता की और दिल में एक रूह फूंक दी। उस हवा के करिश्माई असर ने मेरे जिस्म को फ़तह के झण्डे की तरह बुलंद कर दिया। ठण्डी हवा की लहरों ने मेरे बदन की कमजोरी दूर कर दी।''

गालिब का बचपना ताजनगरी यानी आगरा में ही बीता

27 दिसंबर 1797 में आगरा में पैदा हुए गालिब आज भी लोगों की जुबान पर हैं। जवानी तो दिल्ली में बीती लेकिन गालिब का बचपना ताजनगरी यानी आगरा में ही बीता, शायद यही वजह थी कि आगरा गालिब के दिल में बसता रहा। गालिब का आगरा के लिए प्यार उनके खतों में साफ झलकता है।

गालिब ने अपने दोस्त ज्याउद्दीन अहमद खां को एक खत लिथा था

जाने बिरादर! गालिब नामुराद के अश्क व आह यानी आब- व- हवाएं अकबरबाद आपके लिए साजगार हो। मेरा वतन आगरा में है, इसलिए मुझसे बहुत करीब है। मैं खुश हूं कि मेरे शौक दूर अंदेशी ने मेरे दीदह यानी आंख व दिल को सफर में आपके साथ कर दिया। ताकि इस गुबरत (परदेश) में अपने वतन के दीदार की शादमानी (खुशी) , दाद भी आपको दे सकूं।

मेरठ की शराब के शौकीन थे गालिब

आगरा में जन्मे गालिब जवानी में दिल्ली आ गए। शराब के शौकीन थे, मजेदार बात ये थी कि मेरठ की छावनी वाली शराब उन दिनों दिल्ली के महरौली में ही मिलती थी। गालिब अपने ससूराल दिल्ली में घर जमाई थे, शराब के शौकीन गालिब हर महीने ससूर की पेंशन मिलने पर हर महीने महरौली से गधे पर महीने भर की शराब लाद लाते थे।

जब बनारस जाने के लिए कलकत्ता का प्लान कैंसिल कर दिया था

एक बार गालिब कलकत्ता के गवर्नर जनरल को याचिका देने के लिए कलकत्ता जाने वाले थे। उस वक्त कुछ काम आ जाने की वजह से गालिब को इलाहाबाद अपने चचेरे भाई के यहां जाना पड़ा। गालिब यहां जाते ही बीमार पड़ गए, उन्हें 6 महीने यहीं ठहरना पड़ा। गालिब की तबियत ठीक नहीं हो रही थी, उनके दोस्त नवाब मुहम्मद अली खान ने खत लिखकर बनारस बुलाया। खत में कहा कि बनारस का पाक पानी पीओ, जरूर ठीक हो जाओगे। बस फिर क्या गालिब नाव की सवारी कर इलाहाबाद से बनारस पहुंच गए।

गालिब की नजर में रामपुर

मिर्जा गालिब का रामपुर से भी गहरा रिश्ता रहा। गालिब रामपुर के दो शासकों के उस्ताद रहे, उस वक्त गालिब को रामपुर रियासत से हर महीने सौ रुपये वजीफा मिलता, गालिब ने रामपुर में कई महीने गुजारे थे। रामपुर में ही रामपुर रजा लाइब्रेरी में गालिब की तमाम किताबें आपको आज भी मिल जाएंगी।

गालिब ने अपनी कलम से रामपुर के बारे में जो लिखा

रामपुर अहले नजर की है नजर में वो शहर,

के जहां हश्त बहश्त आके हुए हैं बाहम।

रामपुर एक बड़ा बाग है अज रोये मिसाल,

दिलकश व ताजा व शादाब व वसी व ख़ुर्रम।

जिस तरह बाग़ में सावन की घटाएं बरसें,

है उसी तौर पे यां दजला फिशां दस्ते करम।

हर बरस के हो दिन पचास हजार …

गालिब आज जिंदा तो नहीं हैं लेकिन हम सबके बीच आज भी मौजूद हैं। आप चाहें तो अपनी बर्थडे विशेज के मैसेज चेक कर लीजिए, गालिब आपको वहीं मिलेंगे।

"तुम सलामत रहो हजारों बरस, हर बरस के हो दिन पचास हजार "मैसेज नहीं गालिब का शेर है।

मिर्जा गालिब के शेर

हजारों ख्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मेरे अरमां, लेकिन फिर भी कम निकले।

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और।

या रब, न वह समझे हैं, न समझेंगे मेरी बात
दे और दिल उनको, जो न दे मुझको जबां और।

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा,
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं...।

ज़िंदगी अपनी जब इस शक्ल से गुज़री
हम भी क्या याद करेंगे कि ख़ुदा रखते थे।

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना,
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।

कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा 'ग़ालिब' और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले।