
रेखा सिनहा
लखनऊ. यूपी दिवस के अवसर पर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने लखनऊ में सूबे के प्रत्येक जिले को एक नई पहचान दी। हर जिला अपने विशिष्ट उत्पाद के लिए जाना जाएगा। इस क्रम में इलाहाबाद को मूंजकला के प्रमोशन के लिए चयनित किया गया है। हस्तकला के रूप में मूंज कला प्रयाग के गांवों में आज भी जिंदा है। लेकिन इसके संवर्धन के लिए इस परपंरागत व्यवसाय को कुछ सरकारी संरक्षण की जरूरत होगी। इसके लिए जरूरी है कि मुख्यमंत्री कम से कम इलाहाबाद जिले में ही सही एक मूंज बैंक की स्थापना की पहल करें ताकि मूंज का संग्रहण और भंडारण किया जा सके।
...ताकि कारीगरों को मिले कच्चा माल
सरकार ने जैसे पश्चिम बंगाल समेत अन्य राज्यों में जूट बैंक बनाये हैं, वैसे ही मूंज बैंक की स्थापना की जाए। इससे मूंज कला के लिए आवश्यक कच्चा माल कारीगरों को आसानी से मिल जाएगा। पूरे साल भर इसकी उपलब्धता रहेगी। साथ ही उसके मूल्य पर भी नियंत्रण रहेगा। इस कला में इस्तेमाल किया जाने वाला मूंज बरसात में नदी के किनारे उगने वाले सरपत की ऊपरी परत निकाल कर उसे सुखा कर तैयार किया जाता है। अप्रैल-मई में सरपत उगने लगता है और सितम्बर-अक्टूबर तक ये मूंज निकालने के लिए तैयार हो जाता है। नैनी में गरीब तबके के लोग नदी किनारे से सरपत निकाल कर मूंज तैयार करते हैं और उसे गुच्छे बांधकर सुखाते हैं। इसे बल्ला कहते हैं। ये लोग गांवों में घूम-घूम कर बल्ला बेचते हैं। तब इस बल्ले से डलिया व अन्य सामान बनाये जाते हैं। इस बल्ले का निश्चित मूल्य नहीं होता। एक नौ इंच डायमीटर की डलिया बनाने में लगभग डेढ़ कुइया (मापने की स्थानीय इकाई) मूंज और तीन मुठ्ठी कास लग जाता है। इतना मूंज कभी 25 तो कभी 30 रुपये में मिलता है और कास 20-25 रुपये में यानी एक डलिया बनाने में 45-55 रुपये का कच्चा माल लग जाता है। कारीगरों के पास इतनी पूंजी नहीं होती कि सालभर के लिए कच्चा माल का स्टॉक लेकर रख लें। ऐसे में कई बार चाहकर भी वे काम नहीं कर पाते। अगर इलाहाबाद में स्थायी मूंज बैंक बन जाए तो कारीगरों की पहली बाधा दूर हो जाएगी।
कारीगरों की बढ़े मजदूरी
इस कला को बड़े दायरे में फैलाने में दूसरी बाधा है परम्परागत तरीके पर पूर्णत: निर्भरता। मूंज का काम हाथ से होता है। केवल कैंची और तकुआ, सलाई से ये काम किया जाता है। जिससे काम की गति धीमी होती है। बहुत एक्सपर्ट कारीगर एक दिन में एक डलिया ही बना पाता है। डलिया में कच्चा माल 45-55 रूपए का लगा और एक दिन की न्यूनतम मजदूरी लगभग 300 सौ रुपये जोड़ ली जाए तो कारीगर को डलिया की कीमत 350 रुपए मिलनी चाहिए, लेकिन, इतना दाम नहीं मिल पाता। जरूरत इस बात की है कि तकनीकी से जोडकऱ इस कला के कारीगरों को प्रशिक्षित किया जाए, जिससे वे कम समय से ज्यादा सामान बना सकें। आईआईटी कानपुर युक्ति के माध्यम से इस दिशा में प्रयास कर रहा है। ऐसे प्रयासों को बढ़ावा दिया जाए और कारीगरों के बीच उनकी पहुंच बढ़ायी जाए।
रासायनिक रंगों को इस्तेमाल हो बंद
इस इको फ्रेण्डली कला को पर्यावरण और उत्पाद इस्तेमाल करने वालों के हित में पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए रासायनिक रंगों के बजाय वेजीटेबिल कलर्स के प्रयोग को बढ़ावा दिया जाए। इसके लिए कारीगरों को जागरूक किया जाए और वेजीटेबिल रंगों की उपलब्धता उनके बीच करायी जाए।
बिचौलियों का हस्तक्षेप हो बंद
महानगरों और विदेशों में मूंज के सामानों की डिमांड है। पिछले तीन वर्ष में इन सामानों के लिए नैनी आने वालों की संख्या बढ़ी है लेकिन इनमें बिचौलिए ज्यादा है। अगर सरकारी स्तर पर इन सामानों की बिक्री की व्यवस्था की जाए तो भविष्य में इस कला में बिचौलियों का हस्तक्षेप कम होगा। जिसका फायदा कारीगरों को मिलेगा और उनका जीवनस्तर सुधरेगा।
उत्पाद को हो मानकीकरण
मूंज कला के उत्पादों का मानकीकरण किये जाने की जरूरत है। कुछ उत्पाद मूंज को कास पर लपेट कर (क्वायलिंग) बनाये जाते हैं, जो जल्दी तैयार होते हैं। जबकि कुछ उत्पाद तकुए से गोद-गोद कर मूंज डालकर कस कर बनते है। इसमें कई बार कारीगर की उंगलियों पर कटने से घाव हो जाते हैं लेकिन, जानकारी के अभाव में खरीददार दोनों का दाम बराबर देते हैं। कई बार बिचौलिये इसका फायदा उठाकर सस्ते सामान को महंगे में बेचते हैं। भविष्य में इन उत्पादों का मानकीकरण और संभावित मूल्य निर्धारण भी किया जाना चाहिए।
बिक्री एजेंसी का हो गठन
मूंज कला के कारीगर संगठित नहीं हैं, इसलिए इन सामानों को एक्सपोर्ट करने में दिक्कत आती है। जितनी कागजी कार्रवाई और औपचारिकता एक्सपोर्ट करने की प्रक्रिया में करनी पड़ती है, वह एक कारीगर के वश की बात नहीं। इसके लिए किसी एजेंसी का गठन किया जाना चाहिए।
क्या है मूंज कला
नदी किनारे स्वत: उगने वाले सरपत की ऊपरी परत को निकालकर सुखाया जाता है, जिसे मूंज कहते हैं। मूंज को खूब सुखाकर इसके गुच्छे बनाये जाते हैं, जिसे बल्ला कहते हैं। पानी में सूखा रंग डालकर खौलाया जाता है, इसमें इन बल्लों को भिगोकर रंगा जाता है। रंग में बल्लों को पकाया जाता है, जिससे खूब चटक रंग चढ़ता है। विशेष घास जिसे कास कहते हैं, उस पर सादे और रंगे हुए मूंज को लपेट कर तरह-तरह का सामान बनाया जाता है। इसमें डलिया, पिटरिया, सेनी, कोरई, तिपारी आदि शामिल हैं। हस्तशिल्प के बाजार में इन्हें मूंज के फ्रूट बास्केट, बाउल, कोस्टर, इकोफ्रेण्डली कैसरोल, ज्वेलरी बॉक्स, ट्रे , पेन स्टैण्ड, कटलरी स्टैण्ड, रोटी सर्वर आदि नाम से जाना जाता है।
(लेखिका वरिष्ठ पत्रकार, सोशल एक्टिविस्ट और सोशल एंटरप्रेन्योर हैं। उत्तरप्रदेश की लुप्त होती कलाओं के संरक्षण और संवद्र्धन के लिए काम कर रही हैं)
Updated on:
24 Jan 2018 07:06 pm
Published on:
24 Jan 2018 06:09 pm
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