15 जनवरी 2026,

गुरुवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Good News : चार सितंबर को मदर टेरेसा बनेंगी संत

उनके दो चमत्कारों की पुष्टि होने के बाद अब उनके संत बनने का रास्ता साफ हो गया है।

7 min read
Google source verification

image

Ashish Kumar Pandey

Mar 15, 2016

Mother

Mother

लखनऊ.
बेसहारा, दीन दुखियों की सेवा में अपना जीवन समर्पित करने वाली मदर टेरेसा दुनिया में जानी जाती हैं। आज वह भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा किए गए कार्य आज भी उन्हें जिंदा रखें हुए हैं। उन्होंने जो समाज के लिए किया है, उस कार्य को बहुत कम ही लोग कर सकते हैं। आज उसके कारण वह इस मुकाम पर पहुंचने जा रही हैं जहां पहुंचना मानों असंभव ही है। आखिरकार वह समय आ ही गया जब मदर टेरेसा का संत बनने का रास्ता साफ हो गया। 18 साल के लंबे इंतजार के बाद मिशनरीज आफ चैरिटी की संस्थापक मदर टेरेसा के संत बनने का रास्ता अब साफ हो गया है। वैटिकन ने मदर के दूसरे चमत्कार का मानते हुए इसकी पुष्टि कर दी है।अब मदर का संत बनने का रास्ता साफ हो गया है। इससे मिशनरीज मुख्यालय में खुशी का माहौल है।


कोलकाता में मिशनरीज आफ चैरिटी को जैसे ही इस बारे में पता चला तो वहां मिशनरीज मुख्यालय में खुशी की लहर छा गर्इ। चैरिटी की प्रवक्ता सुनीता कुमार ने कहा कि मदर टेरेसा को संत बनाने की वैटिकन ने आधिकारिक तौर पर पुष्टि कर दी है। मदर टेरेसा को चार सितंबर को संत घोषित कर दिया जाएगा। हम इससे बेहद खुश और प्रसन्न हैं। उन्होंने कहा कि चर्च ने मदर के दूसरे चमत्कार को मान्यता दे दी है। अब उनके संत बनने का रास्ता साफ हो गया है।


संत का दर्जा पाने की हकदार थीं

लखनऊ स्थित सेंट्रल मैथोडिस्ट चर्च के पादरी डाॅक्टर हर्बट एबुल ने कहा कि यह बड़े खुशी की बात है कि मदर टेरेसा का संत बनने का रास्ता साफ हो गया है। मदर टेरेसा संत का दर्जा पाने की हकदार थीं। उन्होंने हमेशा अच्छे कार्य किए, उन्होंने बिना भेदभाव के निःस्वार्थ भाव से समाज की सेवा की। आज उनकी इसी सेवा के कारण उनके संत बनने का रास्ता साफ हुआ है।


सेंट फ्रांसिस काॅलेज लखनऊ के चांसलर एंड स्पोक्सपर्सन डाॅक्टर डोनाल्ड एच.आर.डीसुजा ने कहा कि मदर टेरेसा हमारे लिए संत हैं, कि्रश्चियन लोग उन्हें पहले से ही संत मानते हैं। चार सितंबर को उन्हें आफिसियल तौर पर संत घोषित कर दिया जाएगा।


क्या था पहला चमत्कार
वैसे तो मदर के कर्इ चमत्कार हैं, लेकिन उनका पहला चमत्कार कई साल पहले सामने आया था। अब ब्राजील का एक मामला सामने आया है। वहां मदर की प्रार्थना से एक व्यक्ति चमत्कारिक रूप से स्वस्थ हो गया था। मदर टेरेसा के निधन के बाद भी कई एेसे चमत्कार होते रहे हैं। मदर ने कोलकाता में मिशनरीज आफ चैरिटी की स्थापना की थी। उन्होंने अपने जीवन के 45 साल यहां गरीबों और बेघरों के सेवा में गुजारे।


इसके बाद धन्य घोषित किया था

संबंधित खबरें


मदर के निधन के छह साल बाद 2003 में पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले की एक आदिवासी युवती मोनिका बेसरा और उसके चिकित्सक के दावों के बाद तत्कालीन वैटिकन प्रमुख पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मदर को धन्य घोषित किया था। मोनिका ने दावा किया था कि मदर के आशीर्वाद से उसकी कैंसर की बीमारी ठीक हो गर्इ थी। चर्च ने जांच के बाद दावे को सही पाया था। मदर को संत का दर्जा देने की प्रक्रिया में वैटिकन ने अपने कई नियमों में ढील दी थी, लेकिन वहीं दूसरे चमत्कार वाले प्रावधान से छूट नहीं दी जा सकती। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के बाद अब मदर को चार सितंबर को संत की उपाधि से दी जाएगी।


यह है दूसरा चमत्कार

दूसरे चमत्कार का मामला ब्राजील से सामने आया है। वहां एक आदमी दिमागी बीमारी से पीड़ित था, लेकिन वह मदर की प्रार्थना से ही पूरी तरह सही हो गया। वैटिकन ने अपनी तरफ से इस मामले की जांच के बाद इसे चमत्कार के तौर पर मान्यता दी है। उसके बाद ही पोप फ्रांसिस ने मदर को संत का दर्जा देने का फैसला किया।


संत बनने की शर्तें
Mother
रोमन कैथोलिक चर्च के नियमों के मुताबिक, किसी को संत घोषित करने के लिए उसके दो चमत्कार साबित होने जरूरी हैं। पहले चमत्कार के बाद उस व्यक्ति को धन्य घोषित किया जाता है, उसके बाद दूसरे की पुष्टि होने के बाद उसे संत का दर्जा दे दिया जाता है।

कोलकाता के पूर्व आर्कबिशप हेनरी डिसूजा बताते हैं, यह प्रक्रिया काफी लंबी और जटिल है। किसी को संत का दर्जा देने से पहले चर्च को इस बात का पूरा भरोसा होना चाहिए कि वह व्यक्ति सचमुच एक संत था।


जिसकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सके

कोलकाता से सटे दक्षिण 24 परगना जिले के बारुईपुर स्थित कैथीड्रल के बिशप सल्वाडोर लोबो कहते हैं कि दुनिया के कई देशों से मदर के चमत्कार की खबरें मिलती रही हैं, लेकिन कैथोलिक चर्च के नियमों के मुताबिक कुछ मानदंडों पर खरा उतरने के बाद ही उनको चमत्कार माना जा सकता है। वे कहते हैं कि चमत्कार उसे ही माना जाता है जिसकी कोई वैज्ञानिक व्याख्या नहीं हो सके।


मदर टेरेसा हमारे लिए पहले से ही संत हैं

कैथोलिक डायोसेस आॅफ लखनऊ आैर सेंट फ्रांसिस काॅलेज लखनऊ के चांसलर एंड स्पोक्सपर्सन डाॅक्टर डोनाल्ड एच.आर.डीसुजा ने कहा कि मदर टेरेसा हमारे लिए संत हैं, कि्रश्चियन लोग उन्हें पहले से ही संत मानते हैं। चार सितंबर को उन्हें आधिकारिक तौर पर संत घोषित कर दिया जाएगा। उन्होंने कहा कि वह हमेशा गरीबों आैर दुखियों, लाचार आैर असहाय लोगों की सेवा करती रहीं, उन्होंने अपना पूरा जीवन ही सेवा में समर्पित कर दिया। उन्होंने कहा कि राजधानी के स्रपु मार्ग पर प्रेम निवास है जहां पर बीमार, असहाय आैर लाचार लोगों की सेवा की जाती है, पुलिस भी लावारिस, बीमार आैर असहाय लोगों को यहां लाकर छोड़ देती है, जिसकी यहां पर सेवा की जाती है। यहां पर लगभग डेढ़ सौ लाचार आैर असहाय लोग हैं।

लखनऊ स्थित सेंट्रल मैथोडिस्ट चर्च के पादरी डाॅक्टर हर्बट एबुल ने कहा कि यह बड़े खुशी की बात है कि मदर टेरेसा को संत बनने का रास्ता साफ हो गया है। मदर टेरेसा संत का दर्जा पाने की हकदार थीं। उनके चमत्कार के बारे में जगह-जगह से सुनने को मिलता है। लोग उनको संत ही मानते थे। उन्होंने हमेशा अच्छे कार्य किए, उन्होंने अपने जीवन में हमेशा अच्छे कार्य किए। आज उनकी इसी सेवा के कारण उनके संत बनने का रास्ता साफ हुआ है।



मदर टेरेसा के बारे में

मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त, 1910 स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) हुआ था। उन्होंन अपना जीवन गरीबों आैर असहाया लोगों की सेवा में समर्पित कर दिया था। माना जाता है कि दुनिया में लगभग सारे लोग सिर्फ अपने लिए जीते हैं पर मनुष्य इतिहास में कुछ ही एेसे लोग उदहारण हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन दूसरों की सेवा आैर उनके परोपकार में लगा दिया। मदर टेरेसा भी ऐसे ही महान लोगों में एक हैं जो सिर्फ दूसरों के लिए जीते हैं।


पढ़ार्इ के साथ-साथ गाना उन्हें बेहद पसंद था

मदर का जन्म 26 अगस्त, 1910 को स्कॉप्जे (अब मसेदोनिया में) में हुआ। उनके पिता निकोला बोयाजू एक साधारण व्यवसायी थे। मदर का वास्तविक नाम अगनेस गोंझा बोयाजिजू था। अलबेनियन भाषा में गोंझा का अर्थ फूल की कली होता है। जब वह साल की थीं तभी उनके पिता की मृत्यु हो गर्इ, जिसके बाद उनके लालन-पालन की जिम्मेदारी उनकी माता द्राना बोयाजू के ऊपर आ गयी। वह पांच भाई-बहनों में सबसे छोटी थीं। पढाई के साथ-साथ, गाना उन्हें बेहद पसंद था। वह और उनकी बहन पास के गिरजाघर में मुख्य गायिका थीं। 18 साल की उम्र में उन्होंने सिस्टर्स ऑफ़ लोरेटो में शामिल होने का फैसला किया। वह आयरलैंड गयीं जहाँ उन्होंने अंग्रेजी सीखी।


6 जनवरी, 1929 को भारत आर्इं

सिस्टर टेरेसा आयरलैंड से 6 जनवरी, 1929 को कोलकाता में लोरेटो कॉन्वेंट पंहुचीं। वह एक अनुशासित शिक्षिका थीं और विद्यार्थी उनसे स्नेह करते थे। 1944 में वह हेडमिस्ट्रेस बन गईं। उनका मन शिक्षण में पूरी तरह रम गया था पर उनके आस-पास फैली गरीबी, दरिद्रता और लाचारी उनके मन को बहुत अशांत करती थी। 1943 के अकाल में शहर में बड़ी संख्या में मौते हुईं और लोग गरीबी से बेहाल हो गए। 1946 के हिन्दू.मुस्लिम दंगों ने तो कोलकाता शहर की स्थिति और भयावह बना दी।


मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी

1946 में उन्होंने गरीबों, असहायों, बीमारों और लाचारों की जीवनपर्यंत मदद करने का मन बना लिया। इसके बाद मदर टेरेसा ने पटना के होली फॅमिली हॉस्पिटल से आवश्यक नर्सिग ट्रेनिंग पूरी की और 1948 में वापस कोलकाता आ गईं और वहां से पहली बार तालतला गईं, जहां वह गरीब बुजुर्गों की देखभाल करने वाली संस्था के साथ रहीं। उन्होंने मरीजों के घावों को धोया, उनकी मरहमपट्टी की और उनको दवाइयां दीं।


शुरूआती दौर बहुत कठिन था

मदर के अनुसार, इस कार्य में शुरूआती दौर बहुत कठिन था। वह लोरेटो छोड़ चुकी थीं, इसलिए उनके पास कोई आमदनी नहीं थी, उनको अपना पेट भरने तक के लिए दूसरों की मदद लेनी पड़ी। जीवन के इस महत्वपूर्ण पड़ाव पर उनके मन में बहुत उथल-पथल हुई, अकेलेपन का एहसास हुआ और लोरेटो की सुख-सुविधायों में वापस लौट जाने का खयाल भी आया लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।


चैरिटी की स्थापना की अनुमति मिल गयी
Mother
7 अक्टूबर 1950 को उन्हें वैटिकन से मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी की स्थापना की अनुमति मिल गयी। इस संस्था का उद्देश्य भूखों, निर्वस्त्र, बेघर, लंगड़े.लूले, अंधों, चर्म रोग से ग्रसित और ऐसे लोगों की सहायता करना था जिनके लिए समाज में कोई जगह नहीं थी।


मिशनरीज ऑफ़ चैरिटी का आरम्भ मात्र 13 लोगों के साथ हुआ था पर टेरेसा की मृत्यु के समय (1997) 4 हजार से भी ज्यादा सिस्टर्स दुनियाभर में असहाय, बेसहारा, शरणार्थी, अंधे, बूढ़े, गरीब, बेघर, शराबी, एड्स के मरीज और प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों की सेवा कर रही हैं। मदर टेरेसा ने निर्मल हृदय और निर्मला शिशु भवन के नाम से आश्रम खोले। निर्मल हृदय का ध्येय असाध्य बीमारी से पीड़ित रोगियों व गरीबों का सेवा करना था, जिन्हें समाज ने बाहर निकाल दिया हो। निर्मला शिशु भवन की स्थापना अनाथ और बेघर बच्चों की सहायता के लिए हुई। जब वह भारत आईं तो उन्होंने यहां बेसहारा और विकलांग बच्चों और सड़क के किनारे पड़े असहाय रोगियों की दयनीय स्थिति को अपनी आँखों से देखा। इन सब बातों ने उनके ह्रदय को इतना द्रवित किया कि वे उनसे मुँह मोड़ने का साहस नहीं कर सकीं। उन्होंने जनसेवा का जो संकल्प लिया, जिसका पालन वो अपने अंतिम सांस तक करती रहीं।


सम्मान और पुरस्कार

मानवता की सेवा के लिए उन्हें कर्इ अंतर्राष्ट्रीय सम्मान एवं पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उन्हें पहले पद्मश्री (1962) और बाद में भारत रत्न (1980) से अलंकृत किया। संयुक्त राज्य अमेरिका ने उन्हें 1985 में मेडल आफ़ फ्रीडम 1985 से नवाजा। मदर टेरेसा को 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला।


आैर कह दिया दुनिया को अलविदा

बढती उम्र के साथ.साथ उनका स्वास्थ्य भी बिगड़ता गया। 1983 में 73 वर्ष की आयु में उन्हें पहली बार दिल का दौरा पड़ा। उस समय मदर रोम में पॉप जॉन पॉल द्वितीय से मिलने के लिए गई थीं। 1989 में उन्हें दूसरा हृदयाघात आया और उन्हें कृत्रिम पेसमेकर लगाया गया। 1991 में मैक्सिको में न्यूमोनिया के बाद उनके ह्रदय की परेशानी और बढ़ गयी। 13 मार्च 1997 को उन्होंने मिशनरीज ऑफ चैरिटी के मुखिया का पद छोड़ दिया और 5 सितम्बर 1997 को उनकी मौत हो गई।