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मुहर्रम में अज़ा ,मातम और अलम का महत्त्व जानकर हो जाएंगे दंग

पहले के समय और अब के समय में आया बदलाव

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लखनऊ

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Ritesh Singh

Sep 08, 2019

Muharram 2019

मुहर्रम में अज़ा ,मातम और अलम का महत्त्व जानकर हो जाएंगे दंग

Ritesh Singh

लखनऊ , नवाबों का शहर लखनऊ अपनी तमीज़,तहजीब के लिए देश - विदेश में जाना जाता हैं यहाँ पर हर त्यौहार को बड़ी ही शिद्द्त के साथ मानते हैं आज हम आपको बताने जा रहे हैं। मुहर्रम के महीने में किस तरह से की जाती हैं। मजलिस और क्या महत्व हैं अलम का। अलम का नाम आते ही हर व्यक्ति के मन में ख्याल जरूर आता हैं कि इसका क्या अर्थ हैं मुस्लिम समुदाय के हैं लोगों को अच्छे से होता हैं गैर मुस्लिम समान्तः जानकारी नहीं होती हैं। लखनऊ के विषय पर कई पुस्तकों को लिखने वाले लेखक एस एन लाल ने बतायाकि अलम का मतलब सुख शांति का प्रतीक वो निशान जिसकी खास दिनों में खास पूजा होती हैं। उन्होंने बतायाकि लखनऊ का इतिहास बहुत ही पुराना हैं। मुहर्रम के महीने में अज़ा ,मजलिस ,मातम और अलम का अपना ही महत्व हैं। खुदा को याद करने का एक माध्यम हैं। मुहर्रम जिसमें हर उम्र के लोग हज़रत अली को याद करते हैं।

अलम को घर के मंदिर में रखा जाता हैं

एस एन लाल ने बतायाकि अजादारी में अलम को साफ सुथरा कर सजाकर रखते हैं। आज भी मोहर्रम के दिनों में इमाम के रौजों व इमामबाड़ों से अलम का जुलूस निकलता है। उन्होंने कहाकि पहला अलम का जुलूस सन 1380 ईस्वी में आम रास्तों पर निकला था जिसमे जुलूस को देखने के लिए एक हुजूम उभर पड़ा था। अलम में भी कई प्रकार के चिन्ह होते हैं उन चिन्हों की भी अपनी अपनी महत्ता हैं। जिस तरह से हिन्दू समाज में घर की सुख शांति के लिए अपने इष्ट की मूर्ति लाते हैं ठीक उसी तरह से मुस्लिम समाज में अलम का महत्व हैं।

पहले के समय और अब के समय में आया बदलाव

पहले जब मुहर्रम का जुलूस निकलता था उसमें अलम बहुत देखने को मिलते थे। तरह तरह के अलम लाइन से लगे हुए दीखते थे लेकिन समय के साथ साथ यह बहुत कुछ बदल गया। मुहर्रम तो होता हैं अज़ादारी भी होती हैं लेकिन अब दूसरे वर्ग के लोग मुहर्रम के जुलूस में बहुत कम नज़र आता हैं और अलम के अलग - अलग तरह के निशान भी नज़र आते हैं। जोकि पहले एक जैसे होते थे।

मुहर्रम के महीने में पहली मजलिस हज़रत अली की कब्र पर हुई

साहित्यकार एस एन लाल ने बतायाकि पहली मजलिस 27 जनवरी सन 661 ईसवी में हजरत अली की शहादत पर हुई थी। कहाकि अजादारी और मोहर्रम के महीने की हिंदुस्तान में सही पहचान लगभग 1031 में हुई थी। जब ईरान से सैय्यद सालार मसूद गाज़ी हिंदुस्तान आए थे वो अपने साथ ही अलम लेकर आए ।