
नाटक ʼ नवाब झूमर द्वितीय ' ने दर्शकों को हंसाकर लोटपोट किया
सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्था निसर्ग के तत्वावधान में सन्त गाडगे महाराज प्रेक्षागृह में चल रहे अभिनव नाट्य समारोह के आज दूसरे दिन वरिष्ठ नाट्य लेखक मोहम्मद असलम द्वारा लिखित एवं अनुपम बिसारिया द्वारा निर्देशित नाटक ʼ नवाब झूमर द्वितीय ' ने दर्शकों को हंसाकर लोटपोट किया।
लेखक एक- नाट्य अनेक’ थीम से सजे नाट्य समारोह की आज दूसरी संध्या में उमंग फाउंडेशन की प्रस्तुति के तहत मंचित नाटक 'नवाब झूमर द्वितीय' ने लखनऊ के नवाबों की याद दिलाते हुए, न केवल हंसा कर लोटपोट किया, अपितु यह भी बताया की शौक को केवल शौक के रूप में रखा जाए तो वह सबके लिए बेहतर है।हास्य परिहास्य की चाशनी से परिपूर्ण नाटक ' नवाब झूमर द्वितीय ' की कहानी सन 1857 के इर्द-गिर्द गोमती नदी के एक छोर पर बनी कोठी मदहोश के नवाब बालम, उनकी बेगम तमन्ना और उनकी बेटी मायसा के रिश्ते की तलाश की बानगी दर्शाती है।
मायसा का मुंह लगा रज्जब मायशा के रिश्ते के लिए दुग्गी पिटवा देता है। इस ऐलान को सुनकर कई दावेदार आ जाते हैं।इस दरमियान मायशा का रिश्ता नवाब झूमर द्वितीय के साथ कबूल हो जाता है। इस शादी के बाद, नवाब बालम को एक दिन पता चलता है कि नवाब झूमर द्वितीय ने लखनऊ में हर दुकानदार से उधार ले रखा है। झूमर द्वितीय मायसा से कहता है कि उधार लेना नही है वह फैजाबाद के मुकदमे से जीत जायेगा तो वह नवाब झूमर प्रथम की औलाद साबित हो जायेगा। मायसा कहती है कि जुआ खेलना नवाबों का शौक है, उधार से क्या मतलब...।
मोहम्मद असलम खान ने इस नाटक को जिस खुबसूरती से लिखा है उसी खुबसूरती से एक एक किरदार को अपनी लेखनी से गढ़ा भी है, इस नाट्य लेखक के लिए यह कहना कोई अतिश्योक्ति न होगी की उनके लिखे हर शब्द एक एक मोती के तरह हैं, जिन्हे एक नाटक रूपी माला में पिरोया गया।
Published on:
16 Jun 2022 06:25 pm
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