
लखनऊ. एक लेखक अपनी जिंदगी में आमतौर पर उन विषयों पर लिखता है जिन्हें वह अपने आसपास के परिवेश में महसूस करता है या फिर जिन विषयों में उसकी रूचि होती है। पद्म भूषण से सम्मानित लेखक अमृत लाल नागर ने अपने जीवन में बहुत सारे विषयों को अपने लेखन का विषय बनाया। उनकी कहानियां और उनके उपन्यास सामाजिक विषयों पर न सिर्फ केंद्रित रहे बल्कि उनकी शैली ने समस्याओं की ओर ध्यान भी खींचा। उनकी तमाम कृतियों के बीच एक कृति ऐसी भी रही, जिसकी पृष्ठभूमि कम लोगों को ही मालूम होगी। उनकी एक ऐसी की कृति थी - 'ये कोठेवालियां'। राष्ट्रीय लेखक दिवस पर पत्रिका इस उपन्यास से जुड़े कई रोचक संस्मरण प्रस्तुत कर रहा है इस कृति की पृष्ठभूमि और लेखक के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश है।
तत्कालीन राष्ट्रपति डाक्टर राजेंद्र प्रसाद की इच्छा पर लिखी थी किताब
इस पुस्तक की प्रस्तावना में अमृतलाल नागर ने लिखा है - ' सन 1950 में राष्ट्रपति देशरत्न राजेन्द्र प्रसाद जी ने यह इच्छा प्रकट की थी कि वेश्याओं से भेंट करके कोई व्यक्ति उनके सुख-दुख का हाल लिखे। वे स्वयं ही इनके सम्बन्ध में लिखना चाहते थे, परन्तु अवकाशभाव के कारण ऐसा न कर सके। मेरे मित्र पण्डित रुद्रनारायण शुक्ल उस समय पत्रकार थे, उन्हें लगा कि यह काम किसी हिन्दी लेखक को ही करना चाहिए और अपने इस तर्क से प्रभावित होकर उन्होंने ‘प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया’ के संवाददाता को यह सूचना दे दी कि नागर देशरत्न राजेन्द्रबाबू की इच्छापूर्ति के लिए यह काम करेगा। अपनी इस नयी जिम्मेदारी की सूचना मुझे भी आम जनता के साथ-ही-साथ दैनिक समाचार-पत्रों से प्राप्त हुई। '
कई अनछुए पहलुओं को किया स्पर्श
आगरा में जन्में और फिर लखनऊ में आकर बस गए अमृतलाल नागर ने ये कोठेवालियां के अलावा कई अन्य कृतियों में वेश्यावृत्ति में जीवन काट रही महिलाओं के दर्द को उकेरने की कोशिश की है। 'शकीला' नाम की कहानी में भी उन्होंने एक ऐसे परिवार की कहानी उकेरी है जिसके केंद्र में एक परिवार के जीवनयापन के लिए यह 'काम' एक मात्र साधन बचा है। 'ये कोठेवालियां' की प्रस्तावना पढ़कर पता चलता है कि शुरुआती दौर में अमृतलाल नागर इस विषय पर बेहद दुविधा में रहे लेकिन मित्रों से सलाह-मशविरा के बाद उन्होंने इस विषय पर अनछुए पहलुओं को स्पर्श करने की कोशिश की। जानकर तो यहां तक दावा करते हैं कि उनके इस उपन्यास में कई स्थानों पर लखनऊ और आगरा की कई बदनाम गलियों की कहानियों की मार्मिक झलक देखने को मिलती है।
कई अंश हैं बेहद रोचक और दिलचस्प
अपनी कृति में वे कई जगहों पर इस तरह से कलम चलाते हैं जिससे पढ़ने वाले को यह अहसास होता है कि कोई व्यक्ति खुद के अनुभव से निकली कहानियां बता रहा है। एक अंश - ' मेरे सहपाठी के पिता यों तो अपने व्यावसायिक कार्यवश प्राय: बाहर ही रहते थे, उसकी प्रिय वेश्या वहाँ भी उनके पास रह आती थी और अब यहाँ रहते थे तो भी वह अधिकतर अपनी वेश्या के घर पर ही रहते थे। वेश्या-पुत्र का लाड़-दुलार भी अधिक होता था। वह वेश्या अपने समय में लखनऊ की सरनाम गायिका थी। अपने घर में रहते हुए भी मेरे सहपाठी की माता अपने बच्चे से अधिक अपने पति की वेश्या के बच्चे का ध्यान रखने के लिए बाध्य थी। वेश्या-पुत्र के तनिक-सी शिकायत कर देने पर मेरे इन दोनों सहपाठियों के पिता अपनी पत्नी को इस बुरी तरह से फटकारते थे कि कोई घर की नौकरानी को भी न फटकारेगा। कभी-कभी वह वेश्या उनकी कोठी में भी आठ-दस दिन के लिए रह जाया करती थी। यद्यपि वह मरदाने भाग में ही रहती थी, परन्तु उसका शासन उन दिनों घर के अन्दर तक चलता था। पत्नी अपनी सौत वेश्या की दासी-मात्र रह जाती थी और उससे उत्पन्न दोनों बच्चे भी स्वयं अपने ही घर में गौण हो जाते थे।'
Updated on:
01 Nov 2017 02:50 pm
Published on:
01 Nov 2017 12:33 pm
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