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एक थी फूलन: 15 की उम्र में हुआ था गैंगरेप, बदले में किए 22 मर्डर!

फूलन की कहानी किसी फिल्म से कम भी नहीं है इसीलिए उस पर फिल्म भी बनी और किताब भी लिखी गई

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Kaushlendra Singh

Jul 25, 2016

Phoolan Devi

Phoolan Devi

लखनऊ। 70-80 के दशक में एक दौर था जब बीहड़ों में डाकूओं का खौफ हुआ करता था। मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के सीमावर्ती इलाके डाकुओं के लिए सबसे मुफीद थे। इन्हीं डाकुओं के बीच बीहड़ में एक नाम था 'फूलन' जिसे आम बोलचाल में लोग फूलन देवी कहते थे। फूलन को मीडिया में 'बैंडिट क्वीन' भी कहा गया। फूलन की कहानी किसी फिल्म से कम भी नहीं है इसीलिए उस पर फिल्म भी बनी और किताब भी लिखी गई। हम भी आपको फूलन की कहानी 'एक थी फूलन' (सीरीज) पढ़ा रहे हैं।

फूलन ने तय किया बीहड़ से संसद तक का सफर

फूलन ने बीहड़ में 1976 से 1983 तक राज किया। इंदिरा गांधी की पहल पर फूलन ने 12 फरवरी, 1983 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने अपनी शर्तों पर आत्मसमर्पण कर दिया। जेल से छूटने के बाद वह राजनीति में आईं और सांसद बनीं।

दलित की बेटी थी फूलन

फूलन देवी का जन्म 10 अगस्त 1963 को उत्तर प्रदेश के जालौन जिले के एक छोटे से गांव गोरहा का पूरवा में हुआ था। जातिगत भेदभाव होने की वजह से बचपन से ही फूलन गरीबी और लोगों के बुरे व्यवहार का शिकार बनी रही। 11 साल की छोटी सी उम्र में फूलन की शादी उसे काफी बड़े आदमी से करा दी गई थी। छोटी सी उम्र में भारी शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना ने फूलन को अंदर से बागी बना दिया। जिसका परिणाम हुआ कि वह अपने ससुराल से भाग कर वापस अपने पिता के घर आ गई।

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15 की उम्र में हुआ था गैंगरेप

फूलन के गांव में जाति की खाई काफी गहरी थी। छोटी-छोटी बातों पर उसे जलील होना पड़ता था। एक दिन गांव के ठाकुरों ने किसी विवाद के चलते उसे सबक सिखाने की ठानी। 15 साल की छोटी सी उम्र में फूलन को सामूहिक बलात्कार का सामना करना पड़ा। फूलन ने बचाने के लिए दूसरों से और छोड़ देने के लिए उन दरिंदों से बड़ी मिन्नतें की लेकिन किसी ने उसकी बातों की परवाह नहीं की।

ऐसा कहा जाता है कि फूलन की जिंदगी को खत्म करने के लिए गांव के मुखिया ने डकैतों को बुलाया था लेकिन फूलन को देखकर उन लोगों ने अपना इरादा बदल दिया और उसे अपने साथ उठा ले गए। बीहड़ में भी दस्यु सरगना श्रीराम और उसका भाई लाला राम ने फूलन के साथ कई बार बलात्कार हुआ। बीहड़ में ही फूलन की मुलाकात विक्रम मल्लाह से हुई और दोनों ने मिलकर अपना खुद का अलग गिरोह बना लिया।

इस घटना से सुर्खियों में आईं थी फूलन

आमतौर पर फूलनदेवी को डकैत के रूप में (रॉबिनहुड) की तरह गरीबों का पैरोकार समझा जाता था। सबसे पहली बार (1981) में वे राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में तब आईं जब उन्होंने और उनके गैंग ने कानपुर के बेहमई गांव में ऊंची जातियों के बाइस लोगों का एक साथ तथाकथित (नरसंहार) किया जो (ठाकुर) जाति के लोग थे। इसे बेहमई हत्याकांड के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन बाद में उन्होंने इस नरसंहार से इंकार किया था।

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इंदिरा गांधी की पहल पर किया आत्म समर्पण

उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश सरकार के अलावा प्रतिद्वंदी गिरोहों ने फूलन को पकड़ने की बहुत सी नाकाम कोशिशें कीं। इंदिरा गांधी की सरकार ने (1983) में उनसे समझौता किया की उन्हें (मृत्यु दंड) नहीं दिया जाएगा और उनके परिवार के सदस्यों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाया जाएगा। फूलनदेवी ने इस शर्त को मान लिया क्योंकि उस वक्त तक उनके करीबी विक्रम मल्लाह की पुलिस मुठभेड़ में मौत हो चुकी थी, जिसने फूलन को तोड़ कर रख दिया था। आत्म समर्पण के लिए फूलन ने कुछ अपनी शर्तें भी रखी थीं। 12 फरवरी, 1983 को उसने मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के सामने आत्मसमर्पण कर दिया।

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11 साल काटी जेल, मुलायम बने मसीहा

बिना मुकदमा चलाये ग्यारह साल तक जेल में रहने के बाद फूलन को 1994 में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने रिहा कर दिया। ऐसा उस समय हुआ जब दलित लोग फूलन के समर्थन में गोलबंद हो रहे थे और फूलन इस समुदाय के प्रतीक के रुप में देखी जाती थी।

फूलन ने अपनी रिहाई के बाद बौद्ध धर्म में अपना धर्मातंरण किया। 1996 में फूलन ने उत्‍तर प्रदेश के भदोही सीट से (लोकसभा) का चुनाव जीता और संसद पहुंचीं। 25 जुलाई सन 2001 को दिल्ली में उनके आवास पर फूलन की हत्या कर दी गयी।

हत्या और उसके षड्यंत्र की कहानी पढ़िए यहां... 22 क्षत्रियों की मौत का बदला लेने की खातिर मारी गई यह 'दलित नेता'

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