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पुलिस कस्टडी में अतीक-अशरफ मर्डर को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर, छह साल में 183 एनकाउंटर पर भी उठाए गए सवाल

माफिया अतीक के बेटे असद के एनकाउंटर, पुलिस कस्टडी में अतीक और अशरफ की हत्या के बाद अब यूपी में 2017 से अब तक हुई 183 मुठभेड़ की जांच को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की गई है।  

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लखनऊ

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Neel Kamal

Apr 17, 2023

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यूपी के प्रयागराज में उमेशपाल हत्याकांड के गैंगस्टर अतीक के आतंक का चैप्टर अब बंद हो चुका है। पिछले तीन दिनों के अंदर जो कुछ हुआ उससे अतीक समेत उसके पूरे आतंक का साम्राज्य ढह चुका है। लेकिन पुलिस अभिरक्षा में गैंगस्टर अतीक और उसके भाई अशरफ की हत्या कानून व्यवस्था पर एक बड़ा सवाल खड़ी करती है। ऐसे में वर्ष 2017 के बाद से हुई कुल 183 मुठभेड़ की जांच की मांग को लेकर एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई है।

स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन करने की मांग
सुप्रीम कोर्ट में यह जनहित याचिका एडवोकेट विशाल तिवारी ने दायर की है। जिसमें 2017 के बाद से हुई 183 मुठभेड़ों की जांच की मांग की गई है। एडवोकेट विशाल से सुप्रीम कोर्ट से इसके लिए सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र विशेषज्ञ समिति का गठन करने की मांग की है।

यूपी पुलिस ने डेयरडेविल्स बनने की कोशिश की
याचिका में कहा गया है कि उत्तर प्रदेश पुलिस ने डेयरडेविल्स बनने की कोशिश की है। इसके अलावा याचिका में कानपुर बिकरू एनकाउंटर केस 2020 जिसमें विकास दुबे और उसके सहयोगियों की जांच और सबूतों को रिकॉर्ड करने के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो को फर्जी मुठभेड़ों का पता लगाने के लिए निर्देश जारी करने की भी मांग की है।
इसके अलावा याचिका में एडवोकेट विशाल ने अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ की हत्या के बारे में भी पूछताछ करने की मांग की है, जिनकी पुलिस की मौजूदगी में हमलावरों ने गोली मारकर हत्या कर दी।

दमनकारी पुलिस बर्बरता के खिलाफ है जनहित याचिका
याचिकाकर्ता ने कहा कि उनकी जनहित याचिका कानून के शासन के उल्लंघन और उत्तर प्रदेश द्वारा की जा रही दमनकारी पुलिस बर्बरता के खिलाफ है। याचिकाकर्ता ने अदालत को अवगत कराया है कि उसने विकास दुबे के कानपुर मुठभेड़ से संबंधित एक मामले में भी अदालत का दरवाजा खटखटाया है। इसी तरह की घटना उत्तर प्रदेश पुलिस द्वारा अतीक के मामले में भी दोहराई गई, जिसमें अतीक के बेटे असद की मुठभेड़ में मौत हुई है। जबकि अतीक अहमद और उनके भाई अशरफ की निजी हमलावरों द्वारा तब हत्या कर दी गई जबकि वे पुलिस हिरासत में थे। याचिकाकर्ता अधिवक्ता विशाल तिवारी ने कोर्ट में कहा कि इस तरह की घटनाएं लोकतंत्र और कानून के शासन के लिए गंभीर खतरा हैं। इस तरह की हरकतें अराजकता की स्थापना और पुलिस राज्य का प्रथम दृष्टया विकास हैं।