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रामपुर उपचुनाव: 50% मुस्लिम CM योगी से खुश, आजम खान को अपना गढ़ बचाना हुआ मुश्किल

रामपुर उपचुनाव के लिए सिर्फ एक दिन बचा है। मुस्लिम बहुल इस सीट पर सपा और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर है। आजम अपने गढ़ को डंके की चोट पर जीतने का दावा कर रहे हैं, वहीं बीजेपी लोकसभा उपचुनाव की तरह फिर से मुस्लिम वोटरों में सेंधमारी करके बड़ा उलटफेर करने के फिराक में है।

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लखनऊ

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Vikash Singh

Dec 04, 2022

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समय: सुबह के 9 बजे, जगह: रामपुर जिले का सिविल लाइन्स चौराहा। मुरादाबाद से चलने वाली रोडवेज बस से हम इसी चौराहे पर उतरे। उतरने के बाद हमने होटल के लिए इधर-उधर देखना शुरू किया। चौराहे के सामने एक चाय की दुकान दिखी। हम उनके पास गए और उनका नाम पूछा।

अभी वो कुछ कहते, इससे पहले हमने दूसरा सवाल दागते हुए आस-पास किसी होटल की इन्क्वायरी कर डाली। उम्र में 40 साल के लग रहे चाय वाले चचा ने कुल्हड़ में चाय छानते हुए बताया कि मेरा नाम रफीक खान है।

बात को आगे बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि लगता है आप लोग बहुत दूर से आ रहे हैं। पहले चाय पी लें फिर होटल के बारे में बताता हूं। रामपुर विधान सभा उपचुनाव की कवरेज यात्रा हमारी यहीं से शुरू होती है।

रामपुर सदर विधानसभा उपचुनाव के प्रचार का कल लास्ट डेट था। चाय की दुकान पर बैठे लोग अपने-अपने कैंडिडेट को जिताने के लिए बनने वाली हर रणनीति पर चर्चा कर रहे हैं। चाय पीते हुए 45 साल के सनाउल्लाह ने अपने पास बैठे नफीस से कहा कि इस बार सपा और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है।

इस सीट पर समाजवादी पार्टी से आसिम राजा और भारतीय जनता पार्टी यानी बीजेपी से आकाश सक्सेना चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं।

अगर यूपी में आपको स्थानीय मुद्दों और राजनीति के बारे में जानकारी हासिल करनी हो तो चाय और पान की दुकान से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती है। यही सोचकर हम भी दुकान पर बैठे रहे, लोगों को सुनते रहे, देखते रहे उनको ऑब्जर्व करते रहे।

इसके बाद हमने एक-एक करके लोगों से स्थानीय मुद्दों, पॉलिटिक्स, वोटिंग ट्रेंड, जातिगत समीकरण पर बातचीत करनी शुरू कर की। आइए नीचे कहानी में उतरते हुए जानते हैं कि लोगों ने बातचीत और नीचे अटैच्ड फेसबुक लाइव में क्या कहा…

हारे हुए कैंडिडेट से लोग खफा, लोकसभा उपचुनाव में 40 हजार वोट से हारे थे आसिम

हमने जब वहां मौजूद लोगों से बात करनी शुरू की तो उस समय कुल 10 लोग मौजूद थे बाद में यह नंबर बढ़कर 40 हो गया। एक-एक करके हमने बात करनी शुरू की उनसे पूछा कि आसिम राजा और आकाश सक्सेना के बीच कौन जीतेगा? पास ही में बेंच पर बैठे रउफ ने तपाक से जवाब दिया कि हम बीजेपी के साथ हैं।

मुस्लिम वोटरों का बीजेपी के पक्ष में इस तरह से खुल कर बोलना हैरत में डालता है। सपा और आजम को इस बात का यकीन है कि मुस्लिम वोटर कभी आजम और सपा का साथ नहीं छोड़ेंगे, लेकिन ग्राउंड पर लोगों से बात करने के बाद हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

सपा के कैंडिडेट आसिम राजा से लोग खफा हैं। आसिम रामपुर लोकसभा उपचुनाव लड़े थे और बीजेपी के घनश्याम लोधी से 40 हजार वोट के बड़े मार्जिन से हार गए थे। लोगों की नाराजगी इसी बात को लेकर है कि एक हारे हुए कैंडिडेट को दोबारा टिकट देना बाकि नेताओं और कार्यकर्ताओं के साथ नाइंसाफी है।

1952 में बनी सीट, 3 लाख 80 हजार हैं वोटर, अब तक आजम 10 बार बने विधायक

रामपुर सदर की सीट 1952 में बनी थी, तब से लेकर अब तक आजम खान 10 बार विधायक रह चुके हैं। इसीलिए यह सीट आजम खान की गढ़ कही जाती है। आजम के विधानसभा क्षेत्र रामपुर सदर में कुल 3 लाख 80 हजार के करीब वोटर हैं। जिसमें मुस्लिम वोटर बहुसंख्यक और निर्णायक की भूमिक में है। इसी के दम पर आजम अपनी चुनावी रैलियों में इस बात का जिक्र करते हैं कि हम रामपुर न कभी हारे थे, न कभी हारेंगे।

लोग एक बार बीजेपी को देना चाहते हैं मौका, फ्री राशन स्कीम ने वोटरों को रिझाया

बॉबी रामपुर शहर के रहने वाले हैं। किसी काम से वो स्टेशन जा रहे थे। मीडिया और भीड़ को देखकर रुक गए औ हमारे पास आकार खड़े हो गए। हमने उनसे यहां के पॉलिटिक्स के बारे में बात करनी शुरू की तो उन्होंने एकदम क्लियर कट शब्दों में कहा कि यहां की जनता बदलाव चाहती है।

हमने आजम खान के काम करने के स्टाइल और विकास को देख लिया है। इस बार बीजेपी को यहां से मौका देना चाहते हैं। जनता यह भी समझ जाएगी कि वो जितना दावे कर रहे थे क्या उतना काम कर पा रहे हैं या नहीं।

हमने उनसे दूसरा सवाल किया कि फ्री राशन स्कीम से क्या वोटिंग पर असर पड़ता है? मतलब क्या माहौल पक्ष में बनता है? इसपर उन्होंने बेबाकी से बोलते हुए कहा कि जब फ्री का राशन मिलता है तो गरीबों को कहीं न कहीं इसका फायदा मिलता है।

जब किसी को फायदा मिलेगा और उसका पैसा बचेगा तो लाजमी सी बात है कि उसका असर वोट पर पड़ता ही है। ज्यादातर वोटरों का झुकाव फायदा देने वाली पार्टी की तरफ हो जाता है।

परेशानियों से बचना है तो आजम खान को जुबान पर लगाना पड़ेगा: तौसीफ

मोहम्मद तौसीफ ने कहा कि आजम खान कभी-कभी ज्यादा बोल जाते हैं। नेताओं को अपनी भाषा को सयंमित और जुबान को संभाल कर बोलना चाहिए। इन्हीं के बिगड़े बोल ने इनको 3 साल की जेल करा दी और विधायकी की सदस्यता भी रद्द हो गई।


तौसीफ आजम के उस बयान का जिक्र कर रहे थे जिसमें उनकी विधायकी चली गई। घटना अप्रैल 2019 की है जब लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान आजम ने यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ, पीएम नरेंद्र मोदी और रामपुर के तत्कालीन डीएम आंजनेय कुमार सिंह के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया था।

पॉलिटिक्स में आने वाली जेनेरशन इन जैसे सीनियर नेताओं को सुन और देखकर ही सीखती है। अगर इनके ऐसे बोल रहेंगे फिर आने वाली पीढ़ी के लोग क्या सिख पाएंगे। पॉलिटिक्स में कभी बिलो द बेल्ट जाकर नहीं बोलना चाहिए। ये ऐसे बोल बोलते हैं कि बाद में खुद के स्पीच सुन नहीं पाते होंगे।

साइलेंट वोटर्स ने बढ़ाई आजम की मुश्किलें, दूसरा धड़ा नहीं आ रहा खुल के विरोध में

रामपुर में साइलेंट वोटरों की कमी नहीं है। वो अपना पॉलिटिकल स्टैंड खुलकर नहीं रख रहे हैं। इसलिए कभी-कभी राजनीतिक पंडितों का भी गुणा गणित भी बिगड़ जाता है। और नतीजे ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल के खिलाफ चले जाते हैं। इस चुनाव में साइलेंट वोटर अगर बीजेपी के पक्ष में चले गए तो सपा और आजम दोनों की मुश्किलें बढ़ जाएंगी।

आजम पर लगे सभी आरोप सही नहीं, वो इतने गरीब नहीं कि बकरी और भैंस चोरी करेंगे

सिविल लाइन के रहने वाले नाजिर ने कहा कि हो सकता है कि आजम खान पर लगे अधिकतर आरोप सहीं हों, लेकिन वो इतने गरीब नहीं हैं कि किसी की बकरी और भैंस चोरी करेंगे। ऐसे आरोप और मुकदमे तो जानबूझकर परेशान करने के लिए लगाए जाते हैं।

मोहम्मद अली जौहर यूनिवर्सिटी के कैंपस की जमीन को लोगों ने बेचा था। बाद में बीजेपी के नेताओं ने लोगों को बहकावे में लेकर कहा कि तुम मुकदमा लिखवाओ हम तुम्हारी जमीन तुमको वापस करवाएंगे। लोग लालच में आ गए और उन्होंने मुकदमा लिखवा दिया।

वंशवाद की राजनीती से पाना होगा मुक्ति, अब्दुल्ला संभालेंगे आजम की विरासत

उम्र लगभग 55 साल, लंबी सफेद दाढ़ी, बेंच पर बैठे एक चचा पान मसाला चबा रहे थे। लोगों से बात करते-करते हम उनके पास पहुंचे। नाम पूछने पर उन्होंने आरिफ बताया। चुनावी हालात पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि मुकाबला कांटे का है। जीत का ऊंट किस करवट बैठेगा इसको अभी से गेस नहीं किया जा सकता है। वोट पड़ने में अभी 2 दिन बाकि है।

हमने चाचा से पूछा कि क्या वंशवाद की राजनीती को रामपुर स्वीकार करेगा? अब्दुल्ला आजम पिता आजम खान की विरासत को संभाल पाएंगे? इसका जवाब दते हुए उन्होने बताया कि वंशवाद की राजनीती ही क्षेत्रीय नेताओं के गढ़ को ध्वस्त कर रही है। यही हाल क्षेत्रीय पार्टियों पर भी लागू होता है।

बीजेपी को इसी का फायदा मिल जाता है। और इस मुद्दे पर वो इनपर खुलकर हमले करती है। क्या आजम को अपने करीबी के अलावा रामपुर में और किसी का चेहरा नहीं दिखा।

आजम खां के करीबी हुए भाजपाई, रालोद और कांग्रेस से रूठे भी बीजेपी से जुड़े

विधानसभा चुनाव 2022 में भले ही सभी विरोधी दल बीजेपी के खिलाफ एकजुट थे, लेकिन अब मैटर उलट गया है। अब आजम खां के करीबी ही सपा के कैंडिडेट के विरोध में खड़े हो गए हैं। रामपुर में आजम खां के मीडिया प्रभारी रहे फसाहत अली खां शानू के साथ ही पार्टी अन्य दो और नेताओं ने भाजपा की शरण ली है।

इसके साथ ही कांग्रेस के बड़े नेता नवेद मिंया और राष्ट्रीय लोकदल के पूर्व जिलाध्यक्ष भी बीजेपी कैंडिडेट आकाश सक्सेना के सपोर्ट में खड़े हो गए हैं।