
रामपुर सदर और खतौली विधानसभा सीट पर उपचुनाव हो रहे हैं। दोनों सीटों पर 5 दिसंबर को वोट डाले जाएंगे। दोनों ही सीटों की राजनीति काफी खास रही है। एक दिलचस्प पहलू ये भी है कि एक सीट पर हिन्दू तो एक पर मुस्लिम कैंडिडेट कभी चुनाव नहीं जीता है।
पहले बात खतौली विधानसभा की
खतौली में विक्रम सैनी की विधानसभा सदस्यता जाने के चले उपचुनाव हो रहा है। विक्रम सैनी को मुजफ्फरनगर दंगों के एक मामले में दो साल की सजा हुई है। 1967 में हुए परिसीमन में खतौली सीट बनी। तब से लगातार इस सीट पर चुनाव हो रहे हैं।
मुसलमान 28 फीसदी, लेकिन नहीं मिली जीत
खतौली विधानसभा की बात करें तो यहां कभी मुसलमान विधायक नहीं बन सका है। खतौली में मुसलमानों की संख्या अच्छी खासी है। मुसलमानों को हमेशा से ही खतौली में निर्णायक माना जाता है।
सीट पर करीब 28 फीसदी मुसलमान हैं, लेकिन कोई अल्पसंख्यक इस सीट से नहीं जीत पाया। खतौली सीट पर मुसलमान कैंडिडेट अक्सर चुनाव लड़े, लेकिन उनकी किस्मत नहीं चमकी।
खतौली में पहली बार हुए 1967 में चुनाव हुए थे। इस चुनाव में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सरदार सिंह विधायक बने। 1969 में वीरेंद्र वर्मा जीते। इसके बाद 1974 और 1977 में जनता दल के लक्ष्मण सिंह ने चुनाव जीता।
खतौली से 1980 में कांग्रेस के धर्मवीर सिंह विधायक बने। 1985 में लोकदल के हरेंद्र मलिक और 1989 धर्मवीर सिंह ने चुनाव जीता।
खतौली में जाट बिरादरी से ही ज्यादातर मौकों पर विधायक बनता रहा है। उसमें भी बालियानों का खास दबदबा रहा। 1991 और 93 में खतौली से भाजपा के सुधीर बालियान जीते। इसके बाद 1996, 2002 में राजपाल बालियान और 2007 में योगराज सिंह ने जीत हासिल की।
2012 में यहां से रालोद से गूजर जाति के करतार भड़ाना जीत गए। 2017 और 2022 का चुनाव विक्रम सैनी ने जीता।
खतौली से चली किसान राजनीति
खतौली विधानसभा सीट पर पहले चौधरी चरण सिंह और उनके बाद अजित सिंह के कैंडिडेट ही ज्यादा जीतते रहे। चौधरी चरण सिंह परिवार के अलावा 2007 से पहले तक महेंद्र सिंह टिकैत का गांव सिसौली भी खतौली विधानसभा में था। ऐसे में किसान राजनीतिक का बड़ा केंद्र खतौली रहा है।
रामपुर की पहले नवाबों फिर आजम के नाम से बनी पहचान
रामपुर विधानसभा को नवाबों के शहर के तौर पर भी पहचाना जाता है। यहां आजम खान की सदस्यता जाने की वजह से चुनाव हो रहा है। आजादी के बाद नवाबों ने रामपुर की सियासत में भी दबदबा बनाया। रामपुर में आजादी के बाद काफी समय तक नवाब खानदान के लोग चुने जाते रहे।
हिन्दू कैंडिडेट कभी नहीं जीता चुनाव
1952 से ही रामपुर विधानसभा के लिए चुनाव हो रहा है। खास बात ये है कि इस सीट पर कभी किसी हिन्दू कैंडिडेट ने चुनाव नहीं जीता है। हमेशा मुसलमान उम्मीदवार ही इस सीट पर जीता है।
रामपुर सदर विधानसभा में मुसलमान वोट करीब 72 फीसदी हैं, तो हिन्दू भी 28 फीसदी हैं। ऐसे में इस सीट पर ज्यादातर दल मुसलमान कैंडिडेट को ही टिकट देती रहीं। कई मौकों पर हिन्दू कैंडिडेट भी बड़े दलों से लड़े, लेकिन जीत नहीं मिल सकी।
आजम खान बनाम नवाब खानदार ही रहा रामपुर में
रामपुर में राजनीति ज्यादातर नवाब खानदार और आजम खान के इर्द गिर्द घूमती रही है। 1952 से 1977 तक रामपुर सीट पर नवाब खानदान और कांग्रेस का दबदबा रहा।
1977 में आजम खान की एंट्री रामपुर की राजनीति में हुई। अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी से पढ़े आजम खान नाम के नौजवान ने नवाबों और कांग्रेस के विरोध की राजनीति की और मजदूरों के नेता के तौर पर उभरे।
आजम खान 10 बार बने विधायक
आजम खां ने 1977 में पहली बार रामपुर विधानसभा सीट से चुनाव लडा था। इस चुनाव में आजम खान हार गए। 1980 में वह चुनाव जीते और पहली बार विधायक बने।
1980 के बाद 1996 की हार को छोड़ दिया जाए तो 2022 तक 10 बार आजम खान रामपुर से विधायक बने हैं। रामपुर सीट पर आजम के सामने किसी की नहीं चली है। आजम को सजा के बाद रामपुर में इस उपचुनाव में क्या होगा, ये देखना दिलचस्प होगा।
Updated on:
13 Nov 2022 07:30 am
Published on:
13 Nov 2022 07:28 am
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