
रेप पीड़िता के बूढ़े मां-बाप ने बताया कि उन दरिंदों ने उनकी बेटी को ऐसे जख्म दिए कि उसे देखकर पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर तक बेहोश हो गया था। (प्रतीकात्मक तस्वीर: एडिट सौरभ कुमार)
रेप के बाद जिंदगी सीरीज की ये कहानी उन बूढ़े मां-बाप की है जिन्होंने 11 साल पहले अपनी बेटी को खो दिया। मां घर में रहती है और बाप सेक्यूरिटी गॉर्ड की रात में नौकरी करते हैं। उनकी एक और बेटी और एक बेटा हैं। घटना को 11 साल बीतने के बावजूद भी बूढ़े मां-बाप न्याय के लिए कोर्ट के चक्कर काट रहे हैं। उनकी आंखों में सिर्फ एक ही ख्वाहिश है कि बेटी से रेप करने वाले दरिंदो को फांसी के फंदे तक पहुंचाना।
9 फरवरी 2012, ब*#*# अपनी दोस्तों के साथ घर जा रही…
ब*#*# (बदला हुआ नाम) अपने 4 दोस्तों के साथ दफ्तर से वापस लौट रही थी। तभी पीछे से एक गाड़ी आई, किसी ने ब*#*# का हाथ खींचा और जबरदस्ती गाड़ी में बैठा लिया। दोस्तों ने ब*#*# को खींचने की कोशिश की लेकिन वो लड़के उन्हें धक्का देकर फरार हो गए।
पुलिस चाहती तो आज मेरी बेटी जिंदा होती
उसके दोस्तों ने पुलिस को फोन करके बताया। लेकिन पुलिस वक्त पर नहीं आई। हम लोग थाने गए तो पुलिस ने FIR दर्ज नहीं किया। 24 घंटे बीतने का इंतजार किया। मेरी बेटी के केस में पुलिस और प्रशासन दोनों ने लापरवाही की। घटना के समय अगर पुलिस ने सही तरीके से काम किया होता तो आज मेरी बेटी जिंदा होती।
थाना जाम करने पर हुई कार्रवाई
ब*#*# के पापा के साथ कॉलोनी के कई लोग रिपोर्ट दर्ज किरवाने थाने गए लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट नहीं दर्ज की। थाने के बाहर ही कॉलोनी वालों ने जाम लगा दिया। किसी अधिकारी से फोन करवाया गया तब जाकर पुलिस ने FIR दर्ज की। लेकिन उसके बाद भी ढंग से कार्रवाई नहीं हुई।
घटना के 4 दिन बाद मिली बेटी की लाश
हम गरीब लोग है इसलिए हमारी कोई सुनवाई नहीं हुई। पुलिस ने सही समय पर कोई जांच ही नहीं की। घटना के चार दिन बाद पुलिस का फोन आया। उन्होंने कहा एक लड़की की लाश मिली है। आइए देख लीजिए कहीं आपकी बेटी तो नहीं।
वो मेरी बेटी ही थी। उसका चेहरा पहचान में नहीं आ रहा था। उन लड़कों ने मेरी 19 साल की बच्ची के साथ गलत काम किया। उसके पूरे शरीर में जख्म दिए। बेटी के जख्म देखकर पोस्टमार्टम करने वाला डॉक्टर तक बेहोश हो गया था। दरिंदों ने गलत काम करके मेरी बेटी की आंखों में तेजाब डाल दिया। शरीर का एक-एक अंग खराब कर दिया था। यहां तक की शराब की टूटी बोतल उसके प्राइवेट पार्ट में डाल दिया। इसी बात का दुख है कि उन लड़कों ने मेरी बेटी को इतनी बर्बरता से मार दिया। जिंदा रहती तो आज हमारे पास, हमारी आंखों के सामने होती।
कॉलोनी के लोगों का मिला साथ
ब*#*# की दोस्तों ने आरोपियों को पहचान लिया था। वो हमारे कॉलोनी से थोड़ा दूर पीछे वाली गली में ही रहते थे। आरोपियों की फैमिली को जब उनके बेटों की करतूत के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने रातों-रात घर छोड़ दिया। घर का पूरा सामान छोड़कर भाग गए।
हमारे कॉलोनी के लोग बहुत अच्छे हैं। उन्होंने पूरे मामले में हमारा बहुत साथ दिया। कॉलोनी वालों ने गुस्से में आकर आरोपियों के घर जला दिया। आज भी कुछ बात होती है तो हमेशा साथ खड़े रहते हैं। कोर्ट में जाने के लिए भी तैयार हो जाते हैं। घटना के वक्त भी कॉलोनी वालों ने हमारा पूरा सपोर्ट किया।
11 साल से इंसाफ के लिए लड़ रहे हैं
ब*#*# के पापा ने कहा कि हम 11 साल से इंसाफ के लिए कोर्ट के चक्कर और धक्के खा रहे हैं। हम उन लड़कों को फांसी की सजा दिलवाना चाहते हैं। 8 साल बीत चुके है लेकिन अभी तक कोई फैसला नहीं आया। तारीखें आती है, बहसें होती है और फिर नई तारीख दे दी जाती है।
इससे पहले घटना के तीन साल बाद यानी 2014 में लोवर और हाई कोर्ट की तरफ से उन लड़कों को फांसी की सजा सुना दी गई थी। लेकिन अब मामला सुप्रीम कोर्ट में चल रहा है। लोवर कोर्ट में भी फैसला नहीं आ रहा था। सिर्फ बहस और एक नई तारीख दे दी जाती थी। फिर हमारे कॉलोनी के लोगों ने कोर्ट के गेट का घेराव किया। धरना-प्रदर्शन किया। तब जाकर फैसला सुनाया गया था।
लंबी कानूनी प्रक्रिया से परेशान हैं
खराब कानून व्यवस्था की परेशानियों से 11 साल से जूझ रहे हैं। जब सारे सबूत मुजरिम के खिलाफ हैं तो इतना टाइम नहीं लगना चाहिए। इतना लंबा समय लेंगे तो पीड़ित तो मर ही जाएगा और आरोपियों के भागने का भी डर रहता है।
पीड़िता की मां ने कोर्ट में हो रहे भेदभाव के बारे में बताते हुए कहा, कोर्ट में जब पेशी होती थी तो मुजरिमों को कुर्सी में बैठाते थे। लेकिन हम लोगों को कोने में खड़ा रखते थे। कोर्ट में एक दिन कोई मैडम आईं थीं। उन्होंने देखा तो कहा कि मुजरिमों के लिए कुर्सी लगा रखे हो और बुजुर्ग मां-बाप को खड़ा किए हो। तब जाकर उन्होंने हम लोगों को बैठाना शुरू किया।
गलती ना होने के बावजूद भी खानदान वाले साथ छोड़ दिए
हमारे खानदान के लोग सब आस-पास रहते है। लेकिन कभी कोई पूछने तक नहीं आता। ना कोर्ट-कचहरी के कामों में साथ देते, ना ही ज्यादा हमारे घर आते हैं। जरूरत के समय तो किसी के भी रिश्तेदार काम नहीं आते। सिर्फ नाम के रहते हैं। साथ देने के वक्त कोई अपना नहीं खड़ा होता है। दूसरे काम आ जाते है लेकिन अपने मुंह फेर लेते हैं।
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Updated on:
11 Feb 2024 07:10 am
Published on:
11 Feb 2024 07:09 am
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