
भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेहद खास स्तुति है शिव तांडव स्तोत्र, इसे पढ़ने से टल जाता है बड़े से बड़ा संकट
लखनऊ. शिव तांडव स्तोत्र भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए बेहद खास स्तुति है। शिव तांडव स्तोत्र भोलेनाथ के परम भक्त विद्वान रावण द्वारा रचित एक स्तोत्र है। यह स्तुति छन्दात्मक है और इसमें बहुत सारे अलंकार हैं। माना जाता है कि रावण जब कैलाश लेकर चलने लगे तो शिव जी ने अंगूठे से कैलाश को दबा दिया था। फलस्वरूप कैलाश वहीं रह गया और रावण दब गया, तब रावण ने शिव जी को प्रसन्न करने के लिए जो स्तुति की, वह शिव तांडव स्तोत्र कहलाया। जहां रावण दबा था, वह स्थान राक्षस ताल के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
तांडव का अर्थ
- तांडव शब्द 'तंदुल' से बना हुआ है, जिसका अर्थ उछलना होता है।
- तांडव में ऊर्जा और शक्ति से उछलना होता है, ताकि दिमाग और मन शक्तिशाली हो सके।
- तांडव नृत्य केवल पुरुषों को ही करने की अनुमति होती है।
- महिलाओं को तांडव करना मना होता है।
किन दशाओं में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ सर्वोत्तम होता है?
- जब स्वास्थ्य की समस्याओं का कोई समाधान न निकल पा रहा हो।
- जब तंत्र मंत्र या शत्रु बाधा परेशान करे।
- जब आर्थिक या रोजगार की समस्याएं हों।
- जब जीवन में कोई विशेष उपलब्धि पानी हो।
- जब किसी भी ग्रह की कोई बुरी दशा हो।
शिव तांडव स्तोत्र पाठ की विधि
- प्रातः काल या प्रदोष काल में इसका पाठ करना सर्वोत्तम होता है|
- पहले शिव जी को प्रणाम करके उन्हें धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें|
- इसके बाद गाकर शिव तांडव स्तोत्र का पाठ करें|
- अगर नृत्य के साथ इसका पाठ करें तो सर्वोत्तम होगा|
- पाठ के बाद शिव जी का ध्यान करें और अपनी प्रार्थना करें|
कैसे रचा गया शिव तांडव स्त्रोत
रावण भगवान शिव का बहुत बड़ा भक्त था। एक बार उसने भगवान शिव से लंका चलने के लिए कहा। लेकिन भगवान शिव ने रावण के साथ जाने के लिए माना कर दिया। तब रावण ने अंहकार वश कैलाश पर्वत को उठा लिया। जिससे भगवान शिव अत्याधिक क्रोधिक हो गए और रावण के अंहकार को तोड़ने के लिए भगवान शिव ने अपने पैर का अंगूठे से कैलाश पर्वत को दबा दिया। जिसकी वजह से रावण के हाथ का अंगूठा कैलाश पर्वत के नीचे दब गया। रावण ने अपना अंगूठा निकालने का रावण ने बहुत प्रयास किया पर वह सफल न हो पाया। अंत में रावण ने भगवान शिव की प्रशंसा में शिव तांडव स्तोत्र को रच डाला और तेज - तेज भगवान शिव की स्तुति करने लगा। शिव तांडव स्तोत्र से भगवान शिव अत्याधिक प्रसन्न हो गए और उसे वरदान देकर कहा कि तुम्हारा यह स्तोत्र हमेशा अमर रहेगा और जो भी मेरी स्तुति मे इस स्तोत्र का पाठ करेगा। उसे मेरा आर्शीवाद प्राप्त होगा। इस स्तोत्र को रचने के कारण ही भगवान शिव ने लंका नरेश को रावण नाम से संबोधित किया।
शिव तांडव स्तोत्र का अर्थ
महादेव यानी भगवान शंकर को खुश करने और उनकी कृपा पाने के लिए यह स्त्रोत अचूक है।
जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले गलेवलम्ब्यलम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम्।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं चकारचण्डताण्डवं तनोतु नः शिवो शिवम् ॥1॥
जिन भगवान् शिव के विशाल सघन जटारूप वन से प्रवाहित हो गंगा जी की धारायं उनके कंठ को प्रक्षालित करती हैं, आपके गले मे बड़े बड़े सर्पों की मालाएं लटक रहीं हैं, तथा जो शिव जी डम-डम डमरू बजा कर प्रचण्ड ताण्डव करते हैं, वे महादेव हमारा कल्याण करें।
जटाकटाहसंभ्रमभ्रमन्निलिंपनिर्झरी विलोलवीचिवल्लरी विराजमानमूर्धनि।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके किशोरचंद्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं ममं ॥2॥
जिन भगवान् शिव के विशाल सघन जटा में अतिवेग से विलास पुर्वक भ्रमण कर रही देवी गंगा की लहरे उनके शीश पर लहरा रहीं हैं, जिनके मस्तक पर अग्नि की प्रचंड महा ज्वालायें धधक धधक करते हुए उज्ज्वलित हो रही हैं, उन छोटे से चन्द्रमा के रूप पर मेरा मन का अनुराग प्रतिक्षण बढता रहे।
शिव तांडव स्तोत्र
|सार्थशिवताण्डवस्तोत्रम् ||
||श्रीगणेशाय नमः ||
जटा टवी गलज्जल प्रवाह पावितस्थले, गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्ग तुङ्ग मालिकाम् |
डमड्डमड्डमड्डमन्निनाद वड्डमर्वयं, चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ||१||
जटा कटा हसंभ्रम भ्रमन्निलिम्प निर्झरी, विलो लवी चिवल्लरी विराजमान मूर्धनि |
धगद् धगद् धगज्ज्वलल् ललाट पट्ट पावके किशोर चन्द्र शेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ||२||
धरा धरेन्द्र नंदिनी विलास बन्धु बन्धुरस् फुरद् दिगन्त सन्तति प्रमोद मानमानसे |
कृपा कटाक्ष धोरणी निरुद्ध दुर्धरापदि क्वचिद् दिगम्बरे मनो विनोदमेतु वस्तुनि ||३||
जटा भुजङ्ग पिङ्गलस् फुरत्फणा मणिप्रभा कदम्ब कुङ्कुमद्रवप् रलिप्तदिग्व धूमुखे |
मदान्ध सिन्धुरस् फुरत् त्वगुत्तरीयमे दुरे मनो विनोद मद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ||४||
सहस्र लोचनप्रभृत्य शेष लेखशेखर प्रसून धूलिधोरणी विधूस राङ्घ्रि पीठभूः |
भुजङ्ग राजमालया निबद्ध जाटजूटक श्रियै चिराय जायतां चकोर बन्धुशेखरः ||५||
ललाट चत्वरज्वलद् धनञ्जयस्फुलिङ्गभा निपीत पञ्चसायकं नमन्निलिम्प नायकम् |
सुधा मयूखले खया विराजमानशेखरं महाकपालिसम्पदे शिरोज टालमस्तु नः ||६||
कराल भाल पट्टिका धगद् धगद् धगज्ज्वल द्धनञ्जयाहुती कृतप्रचण्ड पञ्चसायके |
धरा धरेन्द्र नन्दिनी कुचाग्र चित्रपत्रक प्रकल्प नैक शिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम |||७||
नवीन मेघ मण्डली निरुद् धदुर् धरस्फुरत्- कुहू निशीथि नीतमः प्रबन्ध बद्ध कन्धरः |
निलिम्प निर्झरी धरस् तनोतु कृत्ति सिन्धुरः कला निधान बन्धुरः श्रियं जगद् धुरंधरः ||८||
प्रफुल्ल नीलपङ्कज प्रपञ्च कालिम प्रभा- वलम्बि कण्ठकन्दली रुचिप्रबद्ध कन्धरम् |
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं गजच्छि दांध कच्छिदं तमंत कच्छिदं भजे ||९||
अखर्व सर्व मङ्गला कला कदंब मञ्जरी रस प्रवाह माधुरी विजृंभणा मधुव्रतम् |
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं गजान्त कान्ध कान्त कं तमन्त कान्त कं भजे ||१०||
जयत् वदभ्र विभ्रम भ्रमद् भुजङ्ग मश्वस द्विनिर्ग मत् क्रमस्फुरत् कराल भाल हव्यवाट् |
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ||११||
स्पृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर् गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः |
तृष्णारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः समप्रवृत्तिक कदा सदाशिवं भजे ||१२||
कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन् विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् |
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ||१३||
इदम् हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् |
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ||१४||
पूजा वसान समये दशवक्त्र गीतं यः शंभु पूजन परं पठति प्रदोषे |
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्र तुरङ्ग युक्तां लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शंभुः ||१५||
इति श्रीरावण- कृतम् शिव- ताण्डव- स्तोत्रम् सम्पूर्णम्
Published on:
20 Aug 2019 08:47 pm
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