लखनऊ। नवाबी नगरी का मिजाज़ ही कुछ ऐसा है कि जो यहां आता है वे उसी के रंग में ढह जाता है। ऐसे में भला समाजवादी परिवार कैसे बचता ! दरअसल बीत कुछ माह में हुए विवादों का लखनऊ के इतिहास से पुराना नाता रहा है। ऐसे ही कुछ सदियों पहले हुआ था नवाब आसफुद्दौला के साथ भी। दरअसल शुजाउद्दौला से लेकर उनके बेटे आसफुद्दौला, के जीवन में हुई कुछ घटनाएं समाजवादी पार्टी में हुए घमासान से मेल खाती हैं।
एक ओर आसफुद्दौला ने पिता की इच्छा के बिना प्रदेश की राजधानी फैजाबाद से लखनऊ कर दी, तो वही अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह को अवध (लखनऊ) से बाहर कर दिया।
लखनऊ के इतिहास में एक मिलती जुलती कहानी
लखनऊ के इतिहास से कई कहिनियां जुडी हैं और उनमे से एक में इसका ज़िक्र भी है। नवाब सआदत अली खां द्वारा 1730 में फैजाबाद को प्रदेश की राजधानी के तौर पर स्थापित करने की बात कही लेकिन उसे राजधानी के रूप में पहचान मिलने के लिए तीसरे नवाब शुजाउद्दौला (1753-1775) के दौर तक इंतजार करना पड़ा।
उस दौरान ईस्ट इंडिया कंपनी भारत में अपने पैर जमा रही थी जो कि नवाबों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई थी। फिर भी शुजाउद्दौला ने 1760 में फैजाबाद को बाकायदा प्रदेश की राजधानी बनाया और राजधानी को चमकाने का कार्य शुरू कर दिया।
सत्ता में आते ही आसफुद्दौला ने बदली राजधानी

पंद्रह साल बाद ही 1775 में उनके बेटे आसफुद्दौला नए नवाब बने। गद्दी पर बैठते ही उन्हें अपने पिता का फैजाबाद से जरूरत से ज्यादा मोह का कोई औचित्य नजर नहीं आया। उन्होंने 'बहू बेगम' के नाम से मशहूर अपनी मां की नाराजगी के बाद भी लखनऊ को नयी राजधानी के रूप में पहचान दी।
आसफुद्दौला को कहा गया था नालायक बेटे इस के बाद आसफुद्दौला पर आरोपों का दौर शुरू हुआ। जानकार बताते हैं कि आरोप यहाँ तक की लगे कि आसफुद्दौला शुजाउद्दौला के नालायक बेटे है जो अपने पिता द्वारा बसाया हरा-भरा शहर फैजाबाद उजाड़ने से पीछे नहीं हट रहा।
इतिहासकारों के मुताबिक़ 26 जनवरी 1775 को फैजाबाद स्थित गुलाबबाड़ी में शुजाउद्दौला को दफ़नाने के वक़्त भी आसफुद्दौला ने कहा था 'बू-ए-वफा नमीं आयद पिदर-ए-मोहतरम' जिसका मतलब था कि पिताश्री, जिस मिट्टी में आप दफन होने जा रहे हैं, उसमें वफा की खुशबू नहीं है।