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कहानी उस चुनाव की, जब एक तवायफ की दिवानगी में लोगों ने चुनाव लड़ने से किया था इनकार

Nikay Chunav: 1920 के दिलरुबा जान और हकीम शम्सुद्दीन के चुनाव का किस्सा आज भी लोगों को ऐसे याद है, जैसे वह कल की ही बात हो।

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लखनऊ

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Prashant Tiwari

Apr 28, 2023

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पुराने लखनऊ की एक तस्वीर

इस वक्त उत्तर प्रदेश में निकाय चुनाव चल रहा है, ऐसे में चुनाव से जुड़ी किस्से कहानियां भी सामने आने लगी है। ऐसी ही एक कहानी लखनऊ की है। इस शहर के लोग एक तवायफ के इस कदर दिवाने थे कि उनके चुनाव लड़ने की खबर सुनकर कोई मैदान में ही नहीं उतरा। काफी ढूढ़ने के बाद एक हकीम साहब ने चुनाव लड़ने के लिए हामी भरी। इसके बाद दोनों के बीच जो मुकाबला हुआ उसे लोग आज भी याद करते हैं।

1920 के चुनाव में हुआ था ये दिलचस्प मुकाबला
दरअसल, यह वाक्या 1920 के लखनऊ नगर पालिका बोर्ड के चुनाव का है। उस वक्त शहर में बहुत सारे कोठे थे। लेकिन शहर के चौक इलाके के एक कोठे में दिलरूबा जान रहती थी। उनके दिवाने सिर्फ चौक में ही नहीं पूरे लखनऊ शहर में थे, जब 1920 में चुनाव का ऐलान हुआ तो दिलरूबा जान ने चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। इसके बाद क्या था? उनके दिवानों ने चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया और एक वक्त ऐसा लगने लगा कि वह मुकाबला किए बिना चुनाव जीत जाएंगी, लेकिन ऐसा हुआ नहीं।

हकीम साहब उतरे चुनाव में
नगर पालिका के चुनाव में जब शहर के कई लोगों ने चुनाव लड़ने से मना कर दिया। तब अकबरी गेट के पास रहने वाले हकीम शम्सुद्दीन को उनके दोस्तों ने चुनाव लड़ा दिया। अब हकीम साहब के सामने एक मसला ये था कि उन्हें उनके परिवार, दोस्तों, रिश्तेदारों और इक्क-दुक्का मरीजों को छोड़कर कोई जानता ही नहीं था।

वहीं, दिलरुबा जान को पूरा शहर जानता था। इस बात से परेशान होकर वह अपने दोस्तों से कहते मुझे कहां फंसा दिया, मैं कैसे जीतूंगा? इस बात पर उनके दोस्त उनका हौंसला बढ़ाते और जब चुनाव के नतीजे आए तो सब लोग चौंक गए।

शेरों-शायरी से हुआ था चुनाव प्रचार
चुनाव के लिए दोनों लोगों ने पर्चे भर दिए। अब वक्त प्रचार करने का था, इस समय की तरह तो उस वक्त सुविधांए तो थी नहीं, तब हकिम साहब के समर्थक दिवारों पर शायरी लिखकर दिलरुबा जान पर निशाना साधते और अपने दोस्त के लिए वोट मांगते। शहर के पुराने लोग बताते है कि शायरी कुछ इस तरह से थी-

हिदायत चौक के हर वोटरे-ए-शौकिन को,
दिल दीजिए दिलरुबा को वोट शम्सुद्दीन को

शहर के दिवारों पर इस तरह के प्रचार की बात जब दिलरुबा को लगी तो उन्होंने इसके बदले में शहरों के दिवारों पर लिखवाया कि-
हिदायत चौक के हर वोटरे-ए-शौकिन को,
वोट देना दिलरुबा को नब्ज शम्सुद्दीन को

शहर में मरीज ज्यादा हैं
इस तरह के प्रचार के बाद आखिरकार चुनाव का दिन आ गया और लोगों ने जमकर वोट किया। लोग बताते है कि दोनों के बीच कांटे की लड़ाई थी। चुनाव के बाद दोनों के समर्थक अपनी जीत का दावा करने लगे। आखिरकार रिजल्ट का दिन आया, मीठी तकरार के बीच हकीम साहब बड़ी मुश्किल से चुनाव जीत गए।
अपनी हार की खबर सुनने के बाद दिलरुबा जान ने बस इतना कहा कि आज पता चल गया शहर में मरीज ज्यादा है। इस किस्से को 2015 में इतिहासकार योगेश प्रविन ने अपने किताब तवायफ के विमोचन पर किया था। अभी हाल में ही इस कहानी की पटकथा एसके गोपाल ने लिखी है, जिसे वह जल्द ही नाटक के रुप में लाने पर विचार कर रहे हैं।