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लखनऊ का जीपीओ कभी था रिंग थियेटर, यहां काकोरी कांड के क्रांतिकारियों को सुनाई गई थी फांसी

देश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले क्रांतिकारियों का अंदाज भी निराला था।

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लखनऊ

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Laxmi Narayan

Jan 23, 2018

gpo lucknow

लखनऊ। देश की आज़ादी की लड़ाई में हिस्सा लेने वाले क्रांतिकारियों का अंदाज भी निराला था। मुट्ठी भर क्रांतिकारियों का संगठन उस ब्रिटिश हुकूमत को अपने अंदाज में चुनौती देता था, जिसके राज में सूर्य कभी अस्त नहीं होता था और जिनकी सेना दुनिया में सबसे सशक्त मानी जाती थी । इतना ही नहीं, इन क्रांतिकारियों का खौफ भी अंग्रेजी सरकार के अफसरों के दिलों में काफी गहरे तक बैठ गया था। लखनऊ के काकोरी में ट्रेन डकैती के बाद पकडे गए क्रांतिकारियों के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए अंग्रेज सरकार ने लखनऊ के रिंग थियेटर में स्पेशल कोर्ट लगाई थी। दरअसल क्रांतिकारियों के खिलाफ चलने वाले मुकदमे में क्रांतिकारियों के समर्थन में विद्रोह या हमला होने की आशंका में अंगेजों ने रिंग थियेटर में स्पेशल कोर्ट लगाई थी जिसे आज जीपीओ के नाम से जाना जाता है। यह रिंग थियेटर दरअसल अंग्रेजों के समय में मनोरंजन का केंद्र था जहां अंग्रेज अफसर और उनके परिवार के लोग मनोरंजन के लिए जुटते थे। इस स्थान को अपेक्षाकृत अधिक सुरक्षित माना जाता था।

चार क्रांतिकारियों को हुई थी फांसी

9 अगस्त 1925 को क्रांतिकारियों ने काकोरी में ट्रेन में डकैती डालकर सरकारी खजाना लूटा था। इस घटना को ब्रिटिश सरकार ने अपने खिलाफ बगावत माना था। घटना के बाद देशभर में कुल 40 क्रांतिकारी गिरफ्तार किये गए थे। लखनऊ के रिंग थियेटर में इस घटना का मुकदमा 10 महीने तक चला था। इस मुक़दमे में राम प्रसाद बिस्मिल, राजेंद्र नाथ लाहिड़ी, ठाकुर रोशन सिंह और अशफाक उल्ला खान को फांसी की सजा सुनाई गई थी। शचीन्द्रनाथ सान्याल को कालापानी और मन्मथनाथ गुप्त को 14 साल के कारावास की सजा सुनाई गई। योगेश चंद्र चटर्जी, मुकंदीलाल, गोविन्द चरणकर, राजकुमार सिंह और रामकृष्ण खत्री को 10-10 साल की सजा सुनाई गई। विष्णुशरण दुब्लिश और सुरेश चंद्र भट्टाचार्य को 7-7 साल की और भूपेंद्र नाथ, राम दुलारे त्रिवेदी व प्रेम किशन खन्ना को पांच-पांच साल की सजा सुनाई गई थी।

अलग-अलग शहरों में फांसी

क्रांतिकारियों को फांसी की सजा सुनाये जाने के बाद लोग आंदोलित हो उठे थे। जनता आंदोलन पर उतारू हो गई। क्रांतिकारियों को अलग-अलग फांसी की योजना बनाई गई। पंडित राम प्रसाद बिस्मिल को गोरखपुर जेल में फांसी दी गई। ठाकुर रोशन सिंह को इलाहाबाद, अशफाक उल्ला खान को फैजाबाद और राजेंद्र नाथ लाहिड़ी को गोंडा में फांसी दी गई। काकोरी कांड की इस छोटी से दिखने वाली डकैती ने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार के नींव हिलाकर रख दी थी। इस घटना के बाद क्रांतिकारियों के कई संगठनों ने आने वाले दिनों में अलग-अलग तरीकों से सरकार के खिलाफ सशस्त्र आंदोलन का रास्ता अख्तियार किया और आखिरकार लम्बे समय तक चले आंदोलनों और विद्रोहों के कारण आखिरकार अंग्रेजों को देश भारत छोड़कर जाना पड़ा था।