13 जनवरी 2026,

मंगलवार

Patrika LogoSwitch to English
home_icon

होम

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

दिल को छू लेंगी लखनऊ की ये इमारतें, आप भी कर बैठेंगे इश्क

नवाबों का शहर लखनऊ किसी पहचान का मोहताज़ नहीं है।

5 min read
Google source verification

लखनऊ

image

Akansha Singh

Oct 03, 2017

LUCKNOW

लखनऊ. नवाबों का शहर लखनऊ किसी पहचान का मोहताज़ नहीं है। यहां की तहज़ीब, अंग्रेजों और मुगलों के ज़माने की इमारतें, लज़ीज़ खानपान, छोटी बड़ी गलियां, पहनावा आदि ने अपनी अलग पहचान बनाई है। गोमती के किनारे बसा लखनऊ शहर अपने उद्यानों, बागीचों और अनोखी वास्‍तुकलात्‍मक इमारतों के लिए जाना जाता है। बच्चे हों या बूढ़े घूमने-मौजमस्ती करने के मामले में सभी यहां अपने मन के मुताबिक घूम सकते हैं और मौजमस्ती कर सकते हैं। टूरिस्ट प्लेस के तौर पर देखा जाए तो लखनऊ की अपनी अलग ही शान है। आज भी यहां पुराने ज़माने की गगनचुम्बी इमारतें लखनऊ की शान-ओ-शौकत बढ़ा रही हैं और यही इमारतें लखनऊ की शान हैं। मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं कि क्योंकि यहां वे इमारतें हैं जो लखनऊ की शान हैं, जहां घूमने दिल खुश हो जाता है।

बड़ा इमामबाड़ा


बड़ा इमामबाड़ा , एक विशेष धार्मिक स्‍थल है। इसे आसिफ इमामबाड़ा के नाम से भी जाना जाता है क्‍योंकि इसे 1783 में लखनऊ के नबाव आसफ-उद-दौला द्वारा बनवाया गया था। इमामबाड़ा, लखनऊ की सबसे उत्‍कृष्‍ट इमारतों में से एक है। एक परिसर में एक श्राइन, एक भूलभूलैया - यानि भंवरजाल, एक बावड़ी या सीढियोंदार कुआं और नबाव की कब्र भी है जो एक मंडपनुमा आकृति से सुसज्जित है।

इमामबाड़ा की वास्‍तुकला, ठेठ मुगल शैली को प्रदर्शित करती है जो पाकिस्‍तान में लाहौर की बादशाही मस्जिद से काफी मिलती जुलती है और इसे दुनिया की सबसे बड़ी पाचंवी मस्जिद माना जाता है।

इस इमारत की डिजायन की मुख्‍य विशेषता यह है कि इसमें कहीं भी लोहे का इस्‍तेमाल नहीं किया गया है और न ही किसी यूरोपीय शैली की वास्‍तुकला को शामिल किया गया है। इस इमारत का मुख्‍य हॉल 50x16x15 मीटर का है जहां छत पर कोई भी सपोर्ट नहीं लगाया गया है। बड़ा इमामबाड़ा को यहां की भूलभूलैया के लिए जाना जाता है जहां कई भ्रामक रास्‍ते हैं जो एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और इनमें कुल 489 दरवाजे हैं। यह माना जाता है कि यहां एक लम्‍बा रास्‍ता भी था जो गोमती नदी की ओर जाता था, वर्तमान में इस रास्‍ते को बंद कर दिया गया है।

ब्रिटिश रेजीडेंसी

रेजीडेंसी, लखनऊ के सबसे महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक स्‍थलों में से एक है। इसका निर्माण नवाब आसफ-उद- दौला ने 1775 में शुरू किया करवाया था और 1800 ई. में इसे नवाब सादत अली खान के द्वारा पूरा करवाया गया। रेजीडेंसी के नाम से ही स्‍पष्‍ट है कि यह एक निवासस्‍थान है, यहां ब्रिटिश निवासी जनरल का निवास स्‍थान था, जो नवाबों की अदालत में ब्रिटिश सरकार का प्रतिनिधित्‍व किया करते थे।

इस पूरे परिसर ने भारत की आजादी की पहली लड़ाई में लखनऊ के प्रसिद्ध घेराबंदी में एक महत्‍वपूर्ण भूमिका निभाई थी। रेजीडेंसी का एक प्रमुख हिस्‍सा अंग्रेजी बलों और भारतीय विद्रोहियों के बीच की लड़ाई में नष्‍ट हो गया था। युद्ध के बाद इसे जस का तस छोड़ दिया गया।

रेजीडेंसी की टूटी-फूटी दीवारों में आज भी तोप के गोलों के निशान बने हुए हैं। इस परिसर में एक खंडहर चर्च भी है जहां एक कब्रिस्‍तान है जिसमें लगभग 2000 अंग्रेज सैनिकों, आदमियों, औरतों और बच्‍चों की कब्र बनी हुई हैं। रेजीडेंसी परिसर में 1857 मेमोरियल म्‍यूजियम भी स्‍थापित किया गया है जहां 1857 में हुई भारत की आजादी की पहली क्रांति को बखूबी चित्रित किया गया है।

रूमी दरवाजा

रूमी दरवाजा को तुर्कीश द्वार के नाम से भी जाना जाता है, जो 13 वीं शताब्‍दी के महान सूफी फकीर, जलाल-अद-दीन मुहम्‍मद रूमी के नाम पर पड़ा था। इस 60 फुट ऊंचे दरवाजे को सन् 1784 में नवाब आसफ-उद-दौला के द्वारा बनवाया गया था। यह द्वार अवधी शैली का एक नायाब नमूना है और इसे लखनऊ शहर के लिए प्रवेश द्वार के रूप में जाना जाता है।

इस गेट के ऊपर नवाबों के युग में एक लैम्‍प रखी गई थी, जो उस युग में रात के अंधेरे में रोशनी प्रदान करती थी। यह जगह और भी लुभावनी हो जाती है जब इस द्वार पर बनी मेहराबों के पास में लगे सुंदर से फव्‍वारों से कली के आकार में पानी गिरता है।

इसकी प्रसिद्धी का मुख्य श्रेय रसेल को जाना चाहिए। रसेल न्‍यूयार्क टाइम्‍स के संवाददाता थे और उन्‍होंने 1858 में लखनऊ की छावनी को ब्रिटिश सेना के प्रविष्टि कवर पर छापा। उन्‍होंने अपनी रिर्पोट में कहा था कि रूमी दरवाजा से छत्‍तर मंजिल तक का रास्‍ता सबसे खूबसूरत और शानदार है जो लंदन, रोम, पेरिस और कांस्‍टेंटिनोपल से भी बेहतर दिखता है।

छत्तरपुर मंज़िल

छत्‍तर मंजिल को छाता पैलेस भी कहा जाता है क्‍योंकि इसकी गुंबद छातानुमा आकार की है। इस पैलेस का इतिहास चारों तरफ फैला हुआ है, इस महल को कई शासकों ने अलग - अलग समय पर बनवाया। इसे सबसे पहले जनरल क्‍लाउड मार्टिन के द्वारा बनवाया 1781 में उनके निवास स्‍थान के रूप में बनवाया गया था, जो गोमती नदी के तट पर स्थित था। बाद में इसे नवाब सादत अली खान के द्वारा खरीद लिया गया था।

इसके पश्‍चात् नवाब गाजी उद्दीन हैदर ने इसके निर्माण पर कार्य शुरू किया, लेकिन इसे उनके उत्‍तराधिकारी नवाब नसीर उद्दीन हैदर के द्वारा पूरा बनवाया गया। वर्तमान समय में यह महल केन्‍द्रीय औषधि अनुसंधान संस्‍थान ( सीडीआरआई ) के कार्यालय के रूप में जाना जाता है।

यह पैलेस पहले अवध के नवाब और उनकी बेगमों का निवास स्‍थान हुआ करता था और बाद में 1857 की क्रांति, भारत की आजादी के प्रथम युद्ध में स्‍वतंत्रता सेनानियों की बैठक का एक केन्‍द्र बिन्‍दु भी बन गया था। इस दिलचस्‍प और अनूठी, ऐतिहासिक इमारत के भूमिगत हिस्‍से को तह़खाना कहा जाता है।

इन तह़खानों को गोमती नदी के पानी में बनाया गया है जिसके कारण यह भंयकर गर्मियों के दौरान भी ठंडाते हैं। यह पैलेस पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है और साथ ही साथ कई प्रमुख फोटोग्राफर जैसे - सैमुअल बॉर्न, डारोगाह उब्‍बास अली, फेलिस बीओट और थॉमस रस्‍ट भी इन जगहों पर की गई फोटोग्राफी के लिए ही प्रसिद्ध हुए थे।

कैसरबाग़ पैलेस

कैसरबाग पैलेस को 1847 में अवध के नवाब वाजिद अली शाह के द्वारा बनवाया गया था। यह महल नवाब का ड्रीम प्रोजेक्‍ट था और वह इसे दुनिया का आठवां आश्‍चर्य बनाना चाहते थे। छत्‍तर मंजिल के पूर्वी भाग में स्थित, कैसरबाग पैलेस तरवली कोठी, रोशन-उद-दौला कोठी और चौलखी कोठी के पास स्थित है।

ब्रिटिश सरकार ने इस महल को उस दौरान नुकसान पहुंचाया जब उन्‍हे लगने लगा कि यह बागी, नवाबों के बीच अपनी पकड़ बनाता जा रहा है और स ाजिश रच रहा है, इसके बाद वाजिद अली शाह अपनी पत्‍नी के साथ कल्‍कत्‍ता को निर्वासित हो गए थे। नतीजतन, इस परिसर का एक बड़ा हिस्‍सा जिसमें कोर्ट, नवाब की कब्र और नवाब का निवास स्‍थान शामिल था, सभी को ध्‍वस्‍त कर दिया गया।

इस महल में शानदार खंभे और रेलिंग, हिंदू मंडप, सुंदर और मनमोहक मीनारें बनी हुई हैं। महल के मुकुट और मूर्तियों से स्‍पष्‍ट बयां होता है कि महल मुगल शैली और यूरोपीय शैली का मिश्रण है। युग की परंपराओं के अनुसार, इस महल में शाही महिलाओं के लिए अलग चैम्‍बर है। राजसी 12 दरवाजों वाली इमारत, महल के बीचों - बीच में खड़ी है।