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मायावती को मात देने के लिए भाजपा ने खेला बड़ा गेम, इस चेहरे को लाकर बढ़ा दी चिंता

रामसकल की दलित समुदाय में अच्छी पकड़ है, वे दलित उत्थान के लिए कई काम किए हैं।  

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 Ramsakal

मायावती को मात देने के लिए भाजपा ने खेला बड़ा गेम, इस चेहरे को लाकर बढ़ा दी चिंता

लखनऊ. 2019 लोकसभा चुनाव के लिए भाजपा अपनी शतरंजी चालें चलनी शुरू कर दी है। दलित वोटों को अपने पक्ष में लाने के लिए पार्टी एक के बाद एक चालें चल रही है। पहले दलित वर्ग के रामनाथ कोविंद को देश का राष्ट्रपति बनवाया और अब दलित वर्ग के ही रामसकल को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने राज्यसभा के लिए चार लोगों को मनोनीत किया है, जिसमें यूपी के मिर्जापुर जिले के रामसकल भी शामिल हैं। रामसकल रॉबर्टगंज से तीन बार सांसद रह चुके हैं। वे दलित समुदाय से तो आते ही हैं साथ उनकी पहचान एक किसान नेता के तौर पर भी है, उन्होंने दलित समुदाय के बेहतरी के लिए कई काम किए हैं। उनकी अपनी जाति विरादरी में भी काफी अच्छी पकड़ है। भाजपा अपनी इस चाल से मायावती और अखिलेश यादव की चिंता बढ़ा दी है।

यह चिंता से उबरने की कोशिश
हाल ही में हुए गोरखपुर, फूलपुर और कैराना लोकसभा उप चुनावों में हार के बाद भाजपा की चिंता और बढ़ गई है। इसलिए भाजपा अपनी रणनीति में बदलाव कर रही है। वह हर कदम को काफी सोच समझ कर रख रही है। उसका हर कदम अब लोकसभा २०१९ चुनाव को लेकर उठाया जाता है। अब रामसकल को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया है तो बीजेपी इनके माध्यम से दलित वोटों को अपनी ओर खींचने के लिए पूरी कोशिश करेगी। यूपी में भाजपा ने 2014 के लोकसभा और 2017 के यूपी विधानसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन किया था। अब बीजेपी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने प्रदर्शन को बरकरार रखने का है।

अपनों की नाराजगी भी है कारण
सूत्रों की मानें तो इस बार यूपी में बीजेपी के कई ऐसे दलित सांसद हैं जो पाला बदल कर बीएसपी का रूख कर सकते हैं। पिछले दिनों कई दलित सांसदों सावित्री बाई फूल और छोटेलाल खरवार आदि ने अपनी नाराजगी भी जताई थी। इसको लेकर बीजेपी अभी से सतर्क है। वह दलित वोटों को अपने हाथ से खिसकने नहीं देना चाहती है वह चाहती है २०१४ का प्रदर्शन फिर से दोहराया जाए और इसी के तहत वह रणनीति बना रही है।

इसलिए खेला है दलित कार्ड
पार्टी ने इसी नाराजगी को खत्म करने के लिए दलित कार्ड खेला है। पार्टी को लगता है कि अगर नए दलित चेहरों को सामने लाने के साथ-साथ पुराने जमीनी दलित समुदाय के चेहरों को संगठन और सरकार में महत्व दिया जाए तो दलित वोट बैंक को खिसकने से रोका जा सकता है और रामसकल को राज्यसभा भेजने का फैसला उसी रणनीति का हिस्सा है।

25 प्रतिशत है दलित वोट
यूपी में करीब 25 प्रतिशत दलित वोट हैं। सूबे में दलित वोट सबसे अधिक हैं। लोकसभा 2014 और विधानसभा2017 के चुनावों में दलित वर्ग का भाजपा को जोरदार समर्थन मिला था। भाजपा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था तो उसके पीछे भी भाजपा की यूपी में दलित समुदाय में यह संदेश देने की कोशिश थी कि वह दलितों की हितैसी है और लोकसभा चुनाव में वह फिर से दलित समुदाय को अपने साथ जोडऩे की कोशिश कर रही है।

विरोधियों को मात देने के लिए चली यह चाल
भाजपा अब जो भी रणनीति बनाए इसका रिजल्ट तो लोकसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद ही पता चलेगा। पिछले चार सालों में बहुत हद तक बदलाव भी देखने को मिला है। देश में अलग-अलग जगहों पर दलित समुदाय के खिलाफ हिंसा की घटनाएं हुईं जिसको लेकर विपक्षी दलों ने बीजेपी औऱ आरएसएस को दलित विरोधी बताने की कोशिश की है। कांग्रेस से लेकर बीएसपी तक सबने बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया है। अब रामसकल जैसे दलित चेहरे को सामने लाकर विपक्षी दलों की इसी कोशिश को बीजेपी विफल करना चाहती है।

क्यों रामसकल ही

रामसकल आरएसएस के जिला प्रचारक रह चुके हैं। वे जमीनी स्तर के संघ और बीजेपी के कार्यकर्ता रहे हैं। बीजेपी में आने से पहले वो संघ के जिला प्रचारक के तौर पर काम कर रहे थे। दलित समुदाय के भीतर अपनी पैठ रखने वाले रामसकल की छवि एक जमीनी कार्यकर्ता की रही है, लेकिन, संघ में बेहतर छवि वाले इस दलित समुदाय के नेता को बीजेपी में शामिल कर सक्रिय राजनीति में उतार दिया गया। सक्रिय राजनीति में कदम रखने के बाद रामसकल ने रॉबर्ट्सगंज से लगातार तीन चुनावों में जीत दर्ज की। पहली बार वे 1996 में सांसद बने, उसके बाद 1998 और 1999 के लोकसभा चुनाव में भी वे जीते और सांसद पहुंचे, लेकिन, 2004 में पार्टी ने उन्हें टिकट नहींं दिया। टिकट नहीं मिलने से वे सक्रिय राजनीति से दूर हो गए, लेकिन अपनी सादगी वाली जिंदगी और समाज सेवा के काम को उन्होंने जारी रखा। से हमेशा किसानों, मजदूरों और दलितों के हितों की बात करते रहे हैं और इस तबके के विकास और कल्याण के लिए तत्पर रहे हैं। उनकी पहचान एक किसान और दलित नेता के तौर पर रही है। अब एक बार फिर से उन्हें मनोनीत करने का फैसला कर मोदी सरकार ने यूपी में दलित कार्ड खेला है।