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सदियों पुरानी है ‘लव जिहाद’ की कहानी! इंद्र की पुत्री ने दैत्यगुरु से किया था विवाह

विष्णु पुराण के मुताबिक, देवराज इंद्र की पुत्री जयंती ने दैत्यगुरु शुक्राचार्य से किया था विवाह, नाराज हुए थे स्वर्ग के राजा

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Hariom Dwivedi

Apr 01, 2016

Love Jihad

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लखनऊ. लव जिहाद का मामला सामने आते ही हो-हल्ला शुरू हो जाता है। लेकिन शायद आपको पता नहीं कि लव जिहाद आज से नहीं, बल्कि देवासुर संग्राम के समय से चला आ रहा है। विष्णु पुराण के मुताबिक, देवराज इंद्र की पुत्री ने पिता की मर्जी के खिलाफ दैत्यगुरु शुक्राचार्य से विवाह किया था।

दैत्यराज कालनेमि देवताओं संग युद्ध करते हुए बुरी तरह पराजित हुआ था। अधिकांश राक्षस युद्ध में मारे गए थे, थोड़े ही बचे थे। जो बचे थे वो दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शरण में थे। दैत्यगुरु भी देवताओं से बदला लेना चाहते थे। उन्होंने राक्षसों को भरोसा दिलाया कि वह उनकी मदद करेंगे और देवताओं से प्रतिशोध लेंगे।

भगवान शंकर से मिलने पहुंचे इंद्र और शुक्राचार्य
शुक्राचार्य संजीवनी विद्या हासिल करना चाहते थे, जिसके जरिए किसी भी मृत व्यक्ति को तुरंत जीवित किया जा सके। ऐसा करने की शक्ति सिर्फ भगवान शंकर में ही थी। भोलेनाथ का आशीर्वाद लेने के लिए दैत्यगुरु शुक्राचार्य उनसे मिलने कैलाश चल दिए। इंद्र को पता चला तो वह भी वहां शिवजी के पास मिलने पहुंचे। शिवजी आंख बंद किए ध्यान मग्न थे। चू्ंकि इंद्र को राक्षसों पर जीत के बाद घमंड था, उसी नशे में वह शिवजी के पास पहले पहुंचने के बावजूद शिवजी के पीछे पड़े आसन पर बैठे गए। वहीं, शुक्राचार्य ने पहुंचते ही भगवान शिव के चरणों में गिरकर दंडवत प्रणाम किया।

शुक्राचार्य के हाथों का स्पर्श होते ही भोलेनाथ ने आंखें खोल दीं और आने का कारण पूछा। तभी पीछे से इंद्र बोले इनसे पहले तो मैं आया था, इसलिए आप पहले मेरी मर्जी पूछिए। लेकिन शिवजी ने उनकी बात नहीं मानी और शुक्राचार्य से कारण पूछा। शुक्राचार्य ने बताया कि वह संजीवनी मंत्र चाहते हैं। इंद्र ने कहा मुझे भी यही मंत्र चाहिए।

भगवान शिव ने रखी शर्त
शिवजी ने दोनों की बात सुनते हुए कहा कि इस मंत्र के पात्र आप दोनों हैं। संजीवनी मंत्र किसे दिया जाए, इसके लिए एक दोनों को एक परीक्षा से गुजरना होगा, जो भी इसे अच्छे अंकों से पास करेगा, उसी को संजीवनी मंत्र दिया जाएगा। इंद्र हिचकिचाए, लेकिन शुक्राचार्य ने कहा कि इस मंत्र के लिए वह किसी भी परीक्षा से गुजरने को तैयार हैं।

कठिन परीक्षा से गुजरना होगा
भगवान शिव ने कहा कि संजीवनी मंत्र उसी को मिलेगा जो एक साल तक पीपल के पेड़ से उल्टा लटककर पत्तियों के धुएं को पीता रहेगा। इस दौरान वह न तो किसी से बोलेगा और न ही कुछ खाएगा और पिएगा। देवराज ने मना कर दिया, जबकि दैत्यगुरु ने इसे सहर्ष स्वीकार कर लिया। इंद्र को विश्वास था कि शुक्राचार्य भी यह परीक्षा नहीं पास कर पाएंगे और एक ही हफ्ते में उनकी जीवन लीला समाप्त हो जाएगी।

शुक्राचार्य ने शुरू की कठिन साधना
इंद्र स्वर्ग में व्यस्त हो गए, वहीं दैत्यगुरु ने अपनी माता का आशीर्वाद लेकर कठिन परीक्षा शुरू कर दी। इस बीच कालनेमि आदि राक्षसों को आदेश दिया कि वह ध्यान रखें कि उनकी साधना में कोई बाधा न आने पाये। शुक्राचार्य की कठिन साधना 1, 2, 3, 4, 5, 6... एक हफ्ते, एक महीने यूं ही चलती रही।

परेशान हुए इंद्र
शुक्राचार्य कठिन परीक्षा से गुजर रहे थे, वहीं देवराज इंद्र को चिंता बढ़ रही थीं कि अगर कहीं दैत्यगुरु ने यह परीक्षा पास कर ली तो देवताओं के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी। उन्होंने अप्सराओं को शुक्राचार्य की साधना तुड़वाने के लिए भेजना चाहा, पर शाप के डर से कोई तैयार नहीं हुआ। अंत में इंद्र की पुत्री जयंती ने फैसला किया कि वह खुद जाकर उनकी परीक्षा में बाधा पहुंचाएगी।

सन्यासिनी के वेष में पहुंची इंद्र की पुत्री
चारों तरफ राक्षसों का पहरा था। खुद राक्षसों का राजा कालनेमि पहरे पर था। शुक्राचार्य पेड़ से लटके हुए थे, नीचे पत्तियां सुलग रही थीं। धुआं उठ रहा था, जिसे शुक्राचार्य पी रहे थे। तभी इंद्र की पुत्री जयंती वहां एक सन्यासिनी के वेष में पहुंची। उसके हाथ में एक डलिया थी, जिसमें ऊपर तो फूल थे और नीचे तीखी लालमिर्च रखी थी। राक्षसों ने जयंती को रोक लिया। उसने कहा कि दैत्यगुरु शुक्राचार्य की शिष्या है और पुष्प चढ़ाकर उनकी पूजा करना चाहती है। काफी अनुनय-विनय के बाद कालनेमि ने उसे अंदर जाने दिया और कहा पूजा करके तुरंत वापस आ जाओ।

शुक्राचार्य के मुंह-नाक से निकलने लगा खून
जयंती वहां पहुंची। इधर-उधर देखा। शुक्राचार्य पेड़ से लटके थे, नीचे धुआं सुलग रहा था। उसने आव देखा न ताव डलिया से ढेर सारी लालमिर्च निकालकर आग में झोंक दिया। शुक्राचार्य जान चुके थे कि यह देवराज की पुत्री है। फिर भी कुछ नहीं बोले। मिर्च के प्रभाव से उनकी आंखों, नाक और कान से खून की फुहार निकल पड़ी। राक्षसों ने आग बुझानी चाही, पर शुक्राचार्य ने उन्हें इशारे से मना कर दिया। वह लगातार खांसते जा रहे थे, उन्हें सांस लेने में भी दिक्कत नहीं हो पा रही थी।

अपने कृत्य से पछता रही थी जयंती
आखिर जयंती थी तो एक देवकन्या ही। उससे शुक्राचार्य की ऐसी हालत नहीं देखी गई। दौड़कर खुद आग बुझाना चाही, पर राक्षसों ने उसे भगा दिया। लेकिन जयंती मन ही मन प्रायश्चित की आग में जली जा रही थी।

भगवान शिव ने दिया संजीवनी मंत्र
जयंती के ऐसे कृत्य से भगवान शंकर रुष्ट हो गए। उन्होंने तुरंत ही शुक्राचार्य की साधना रोककर उन्हें संजीवनी मंत्र प्रदान किया। आगाह किया कि इस विद्या का गलत इस्तेमाल मत करना। शिव से संजीवनी मंत्र का वरदान पाकर शुक्राचार्य ने कालनेमि को देवताओं पर हमले का आदेश दिया।

जयंती ने दिया का प्रस्ताव
युद्ध की रणनीति बन रही थी। सभा में कालनेमि और शुक्राचार्य के साथ राजदरबारी बैठे थे। तभी वहां पर जयंती आ गई। देखते ही राक्षसों ने उसे पकड़ लिया। शुक्राचार्य ने पूछा, तुम यहां क्यों आई हो। जयंती ने कहा कि मैं अपने किए अपराध से शर्मिंदा हूं और आपसे शादी कर अपने पाप का प्रायश्चित करना चाहती हूं। आपसी सहमति से दोनों ने शादी कर ली। इंद्र इस शादी के कतई खुश नहीं थे।

असुरों की हुई जीत
शुक्राचार्य का आदेश मिलते ही देवासुर संग्राम छिड़ गया। देवता जितने राक्षसों को मारते शुक्राचार्य युद्धभूमि में ही उन्हें जीवित कर देते है। आखिरकार ऐसा समय आ गया, जब देवताओं को युद्ध छोड़कर भागना पड़ा। असुर विजयी हुए।

फोटो- प्रतीकात्मक तस्वीर

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