इंद्र स्वर्ग में व्यस्त हो गए, वहीं दैत्यगुरु ने अपनी माता का आशीर्वाद लेकर कठिन परीक्षा शुरू कर दी। इस बीच कालनेमि आदि राक्षसों को आदेश दिया कि वह ध्यान रखें कि उनकी साधना में कोई बाधा न आने पाये। शुक्राचार्य की कठिन साधना 1, 2, 3, 4, 5, 6... एक हफ्ते, एक महीने यूं ही चलती रही।