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यूपी में ओवैसी की गठबंधन तलाश तेज, बसपा के अकेले फैसले से बढ़ी AIMIM की मुश्किल

UP politics : यूपी विधानसभा चुनाव 2027 से पहले असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM गठबंधन की तलाश में है। बसपा के अकेले चुनाव लड़ने के फैसले और सपा-कांग्रेस की दूरी के बाद ओवैसी के सामने क्या विकल्प बचे हैं, जानिए पूरी रिपोर्ट।

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लखनऊ

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Himesh Rana

Feb 18, 2026

AIMIM सांसद असदुद्दीन ओवैसी (Photo-IANS)

UP politics : उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव भले ही 2027 में होने हैं, लेकिन राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। इसी कड़ी में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम (AIMIM) भी गठबंधन की संभावनाएं तलाश रही है। हालांकि, अब तक किसी बड़े दल के साथ उनकी बातचीत बनती नजर नहीं आ रही है।

बसपा के फैसले से बदला समीकरण

मायावती ने साफ कर दिया है कि बसपा 2027 का चुनाव अकेले लड़ेगी। इस ऐलान के बाद ओवैसी की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। माना जा रहा था कि मुस्लिम-दलित समीकरण के आधार पर AIMIM और बसपा के बीच तालमेल बन सकता है, लेकिन मायावती ने गठबंधन की सभी अटकलों पर विराम लगा दिया।

सपा-कांग्रेस पहले से साथ

दूसरी ओर समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने 2024 लोकसभा चुनाव की तर्ज पर आगे भी साथ चलने के संकेत दिए हैं। ऐसे में इन दोनों दलों के साथ AIMIM की संभावनाएं भी लगभग खत्म मानी जा रही हैं।

बीजेपी खेमे में पहले से मजबूत गठबंधन

सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी पहले से सहयोगी दलों के साथ मैदान में है। बीजेपी ने अनुप्रिया पटेल की अपना दल (एस), ओम प्रकाश राजभर की सुभासपा, संजय निषाद की निषाद पार्टी और जयंत चौधरी की आरएलडी के साथ गठबंधन कर रखा है। ऐसे में ओवैसी के लिए भाजपा के साथ जाने का सवाल भी नहीं उठता है।

छोटे दल ही बचा विकल्प?

मौजूदा हालात में ओवैसी के सामने कुछ क्षेत्रीय नेताओं के साथ तालमेल की संभावना बचती है। इनमें चन्द्रप्रकाश आजाद (आजाद समाज पार्टी), पल्लवी पटेल (अपना दल कमेरावाद), स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे नाम चर्चा में हैं। 2024 लोकसभा चुनाव के दौरान इन नेताओं के साथ मिलकर एक मोर्चा बनाने की कोशिश हुई थी, लेकिन उसका बड़ा राजनीतिक असर नहीं दिखा। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या छोटे दलों के सहारे AIMIM यूपी में मजबूत बन पाएगी?

AIMIM का क्या है तर्क?

पार्टी नेताओं का कहना है कि उनका मकसद बीजेपी को रोकना है और इसके लिए विपक्षी दलों को एकजुट होना चाहिए। लेकिन फिलहाल राजनीतिक तस्वीर यही संकेत दे रही है कि 2027 के चुनाव में AIMIM को अपनी रणनीति नए सिरे से तैयार करनी पड़ सकती है।