
नाई-निषाद-राजभर पर कांग्रेस का फोकस! फोटो सोर्स-पत्रिका न्यूज,
UP Politics: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट तेज हो चुकी है। प्रदेश की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच सियासी हलचल लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ चुनावी मोड में नजर आने लगे हैं, वहीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी भी यूपी में लगातार सक्रियता बढ़ा रहे हैं। समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पहले से ही संगठन को मजबूत करने में जुटे हैं। इन सबके बीच कांग्रेस की रणनीति ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है।
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में अब एक साल से भी कम समय बचा है। ऐसे में कांग्रेस ने अपनी रणनीति को नई दिशा देना शुरू कर दिया है। पार्टी का पूरा फोकस अब ‘अत्यंत पिछड़ा वर्ग’ यानी EBC वोट बैंक पर दिखाई दे रहा है। हाल ही में राहुल गांधी ने अमेठी और रायबरेली के दौरे के दौरान कई जनसभाओं को संबोधित किया। इस दौरान उन्होंने मीरा पासी की प्रतिमा का अनावरण कर सामाजिक संदेश देने की कोशिश की।
सूत्रों की मानें तो कांग्रेस जून के मध्य में लखनऊ में एक बड़ी बैठक आयोजित करने की तैयारी कर रही है, जिसमें EBC समुदायों को साधने की रणनीति पर चर्चा होगी। पार्टी मान रही है कि यूपी में सत्ता की लड़ाई में यह वर्ग निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान राहुल गांधी लगातार अपनी सभाओं में “पिछड़ा, अत्यंत पिछड़ा और दलित” शब्दों पर जोर देते रहे। उन्होंने ‘जिसकी जितनी हिस्सेदारी, उसकी उतनी भागीदारी’ जैसे नारों के जरिए सामाजिक न्याय की राजनीति को धार देने की कोशिश की।
राहुल गांधी लगातार जातीय जनगणना की मांग उठाते रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस इस मुद्दे को सामाजिक प्रतिनिधित्व और राजनीतिक हिस्सेदारी से जोड़कर पिछड़े वर्गों में अपनी पैठ मजबूत करना चाहती है।
सूत्रों के अनुसार यूपी कांग्रेस अब नाई, राजभर, निषाद, कश्यप, विश्वकर्मा और अन्य अत्यंत पिछड़ी जातियों को अपने साथ जोड़ने की तैयारी में है। माना जाता है कि इन समुदायों की आबादी प्रदेश में करीब 26 फीसदी के आसपास है। वहीं उत्तर प्रदेश में कुल ओबीसी आबादी 50 फीसदी से अधिक मानी जाती है। कांग्रेस को उम्मीद है कि अगर जातीय जनगणना का मुद्दा और ज्यादा जोर पकड़ता है, तो उसे इन वर्गों का समर्थन मिल सकता है।
पिछले कुछ महीनों में कांग्रेस किसानों, वकीलों, जाटों, गुर्जरों, निषादों, पासियों, लोधियों और सवर्ण समाज के साथ लगातार बैठकें करती रही है। पार्टी का लक्ष्य केवल चुनावी गठबंधन नहीं, बल्कि जमीन पर अपना संगठन मजबूत करना भी है।
कांग्रेस नेताओं को भरोसा है कि 2024 लोकसभा चुनाव की तरह 2027 में भी विपक्षी एकजुटता का फायदा मिल सकता है। 2024 में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर चुनाव लड़ा था और भाजपा के खिलाफ संविधान बचाने का मुद्दा जोर-शोर से उठाया था।
राहुल गांधी लगातार भाजपा और केंद्र सरकार पर हमलावर बने हुए हैं। रायबरेली में आयोजित ‘बहुजन स्वाभिमान सभा’ में उन्होंने सामाजिक न्याय और संविधान के मुद्दे पर भाजपा को घेरा। उनके बयानों ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस अब आक्रामक विपक्ष की भूमिका में दिखना चाहती है, ताकि यूपी में खोया जनाधार वापस हासिल किया जा सके।
समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव पहले ही साफ कर चुके हैं कि यूपी में INDIA गठबंधन एकजुट रहेगा। हालांकि सीट बंटवारे को लेकर उन्होंने यह भी कहा कि गठबंधन का आधार “जीतने की क्षमता” होगी। ऐसे में आने वाले समय में सीट शेयरिंग को लेकर दोनों दलों के बीच तनातनी बढ़ सकती है।
कांग्रेस अब पंचायत चुनावों में भी पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मानना है कि अगर गांव स्तर पर संगठन मजबूत हुआ तो विधानसभा चुनाव में इसका फायदा मिल सकता है।
कांग्रेस महासचिव और यूपी प्रभारी अविनाश पांडे पहले ही संकेत दे चुके हैं कि पार्टी पंचायत, ब्लॉक और जिला पंचायत स्तर पर बड़ी संख्या में चुनाव लड़ने की योजना बना रही है। सूत्रों के मुताबिक पार्टी ने कई सीटों को पहले ही संभावित जीत वाली सीटों के रूप में चिन्हित कर लिया है।
2017 विधानसभा चुनाव में सपा और कांग्रेस गठबंधन उम्मीद के मुताबिक प्रदर्शन नहीं कर पाया था। लेकिन 2024 लोकसभा चुनाव में दोनों दलों की संयुक्त रणनीति सफल नजर आई। समाजवादी पार्टी ने बड़ी जीत दर्ज की, जबकि कांग्रेस भी कई सीटों पर मजबूत वापसी करती दिखाई दी।
अब दोनों दलों की नजर 2027 पर है। कांग्रेस EBC और सामाजिक न्याय की राजनीति के जरिए अपना आधार बढ़ाना चाहती है, जबकि सपा पीडीए फार्मूले के सहारे भाजपा को चुनौती देने की तैयारी में जुटी है।
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Published on:
23 May 2026 11:26 am
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