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2200 करोड़ के यूपीपीसीएल पीएफ घोटाले में 3 IAS अफसर का भी आया नाम, CBI ने माँगी जाँच की अनुमति

यूपीपीसीएल पीएफ घोटाले में डेढ़ साल की जाँच के दौरान सीबाआइ ने यह पाया कि पीएफ घोटाले में तीन आइएएस अफसर की भी भूमिका है। जिसके बाद सीबीआई ने प्रदेश सरकार से तीन वरिष्ठ आईएएस अफसरों संजय अग्रवाल, आलोक कुमार प्रथम व अर्पणा यू की भूमिका की जांच के लिए अनुमति मांगी है।

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3 आइएएस अफसर के खिलाफ सीबीआइ ने मांगी जाँच की अनुमति

3 आइएएस अफसर के खिलाफ सीबीआइ ने मांगी जाँच की अनुमति

उत्तर प्रदेश पॉवर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (यूपीपीसीएल) में हुए 2200 करोड़ रुपये के पीएफ घोटाले की जांच कर रही सीबीआई ने प्रदेश सरकार से तीन वरिष्ठ आईएएस अफसरों संजय अग्रवाल, आलोक कुमार प्रथम व अर्पणा यू की भूमिका की जांच के लिए अनुमति मांगी है। अनुमति मिलने के बाद सीबीआई तीनों से पूछताछ कर सकेगी। तीनों अफसर घोटाले की अवधि में यूपीपीसीएल में तैनात रहे हैं। आपको बता दें कि इस घोटाले का खुलासा मार्च 2019 में उस वक्त हुआ था जब यूपीपीसीएल के तत्कालीन चेयरमैन आलोक कुमार को एक गुमनाम चिट्ठी मिली थी। इस चिट्टी में इस घोटाले का ज़िक्र किया गया था। घोटाले के खुलासे के बाद यूपी की सियासत में हड़कंप मच गया था। आलम ये था कि खुद सीएम योगी आदित्यनाथ को इस मामले की सीबीआइ जाँच की सिफारिश करनी पड़ी थी।

आइएएस अफसर से पूछताछ से पहले लेनी होती है अनुमति

अब करीब डेढ़ साल की जाँच के दौरान सीबाआइ ने यह पाया कि पीएफ घोटाले में तीन आइएएस अफसर की भी भूमिका है। लेकिन भ्रष्टाचार निवारक अधिनियम 1988 की धारा 17-A के मुताबिक किसी भी लोकसेवक द्वारा सरकारी कार्य या कर्तव्यों के निर्वहन के तहत लिए गए निर्णय या अनुशंसा के संबंध में हुए कथ‌ित अपराध के मामले में संबंधित सरकार की पूर्व अनुमति के बिना, अधिनियम के तहत किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा पूछताछ या जांच नहीं की जा सकती है। लिहाजा, सीबाआइ ने इन तीनों आइएएस अफसर संजय अग्रवाल, आलोक कुमार और अपर्णा यू के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति माँगी है।

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6 मार्च 2020 को दर्ज हुई थी FIR

दरअसल, सीबीआई ने छह मार्च 2020 को इस मामले में आईपीसी की धारा 409, 420, 467, 468 और 471 के तहत एफआईआर दर्ज की थी। यह एफआईआर लखनऊ के हजरतगंज थाने में 2 नवंबर 2019 को दर्ज कराई गई एफआईआर पर आधारित है। प्रदेश सरकार ने इस मामले की जांच पुलिस की आर्थिक अपराध अनुसंधान संगठन (ईओडब्ल्यू) को सौंप दी थी। ईओडब्ल्यू ने घोटाले में यूपीपीसीएल के तत्कालीन एमडी एपी मिश्रा, तत्कालीन निदेशक (वित्त) सुधांशु द्विवेदी, कर्मचारी भविष्य निधि ट्रस्ट के तत्कालीन सचिव प्रवीण कुमार गुप्ता व डीएचएफएल के क्षेत्रीय प्रबंधक अमित प्रकाश समेत 17 लोगों को गिरफ्तार किया था। इसमें दो चार्टर्ड एकाउंटेंट भी शामिल थे।

पीएफ का पैसा डीएचएफएल में निवेश

यूपीपीसीएल के इन वरिष्ठ अधिकारियों पर आरोप लगाया गया कि उन्होंने कर्मचारियों के पीएफ के पैसे को निजी कंपनी डीएचएफएल में निवेश कर दिया था। वर्ष 2017 के बाद यूपीपीसीएल ने पीएफ के लगभग 4100 करोड़ रुपये डीएचएफएल में निवेश किया, जिसमें से यूपीपीसीएल को केवल 1855 करोड़ रुपये ही वापस मिले। दिसंबर 2020 में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने भी इस मामले में केस दर्ज कर जांच शुरू की।

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EOW की जाँच में मिल गयी थी क्लीन चिट

ईओडब्ल्यू की जांच में यूपीपीसीएल के अन्य तत्कालीन अधिकारियों को क्लीन चिट दे दी गई थी। बाद में जांच सीबीआई के हाथ में जाने के बाद मामला एक बार फिर खुल गया। सीबीआई ने वर्ष 1984 बैच के आईएएस एवं यूपीपीसीएल के तत्कालीन अध्यक्ष व ऊर्जा विभाग के अपर प्रमुख सचिव रहे संजय अग्रवाल, वर्ष 1988 बैच के आईएएस एवं यूपीपीसीएल के तत्कालीन अध्यक्ष व ऊर्जा विभाग के प्रमुख सचिव रहे आलोक कुमार प्रथम तथा वर्ष 2001 बैच की आईएएस एवं यूपीपीसीएल की तत्कालीन सचिव अर्पणा यू की भूमिका की जांच शुरू करने के लिए अनुमति मांगी है। अनुमति मिलने के बाद सीबीआई इन अफसरों से पूछताछ भी कर सकेगी। इसमें संजय अग्रवाल व आलोक कुमार प्रथम इस समय केंद्र सरकार में प्रति नियुक्ति पर कार्यरत हैं, जबकि अर्पणा यू प्रदेश के चिकित्सा, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग की सचिव हैं।