
'लज्जा' उपन्यास के कारण विवादों से घिरीं बांग्लादेशी उपन्यासकार तसलीमा नसरीन भारत आने की अनुमति के कारण सुर्खियों में हैं। ( फोटो डिजाइन: पत्रिका)
Bangladeshi Novelist Taslima Nasrin 5 Controversies: एक विवादित उपन्यास 'लज्जा' लिख कर देश और दुनिया भर में विवादों में आईं मशहूर बांग्लादेशी साहित्यकार तसलीमा नसरीन अरसे से जान बचा कर छिपती-छिपाती रही हैं और उनके समर्थकों और विरोधियों के गुट अपने-अपने बयान देते रहे हैं। 'लज्जा' के उन विवादित 4 पन्नों ने उनकी पूरी जिंदगी बदल दी। अब पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी के नेतृत्व वाली नई सरकार और भारत के गृह मंत्रालय के संरक्षण के कारण तसलीमा को न केवल कोलकाता आने की अनुमति मिली है, बल्कि उन्हें जेड-कैटेगरी की सुरक्षा भी प्रदान की जा रही है।
वे उपन्यास लिखने के बाद से प्रबल विरोध के कारण भारत नहीं आ पा रही थीं, मगर अब भारत सरकार ने उन्हें भारत में आने की अनुमति दे दी है। ध्यान रहे कि तसलीमा नसरीन का जीवन और विवाद एक-दूसरे के पूरक बन गए। उनके बेबाक बयानों और आत्मकथात्मक उपन्यासों ने समय-समय पर बड़े सामाजिक और राजनीतिक तूफानों को जन्म दिया। तसलीमा नसरीन की 1 अगस्त 2026 को होने जा रही यह वापसी राजनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण है।
विवादों से घिरीं बांग्लादेशी उपन्यासकार तसलीमा नसरीन से जुड़े घटनाक्रम। ( विजुअल डिजाइन : ChatGPT)
लेखन की स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की आजादी और धार्मिक कट्टरपंथ के बीच की लड़ाई में बांग्लादेशी मूल की स्व-निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन का नाम सुर्खियों में है। उन्हें साल 2007 के नवंबर महीने में कोलकाता की सड़कों पर हुए दंगों के बाद रातों-रात सुरक्षा कारणों का हवाला देकर पश्चिम बंगाल से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था, वह पूरे 19 साल के लंबे और कष्टदायी इंतजार के बाद एक बार फिर कोलकाता की धरती पर कदम रखने जा रही हैं।
भारत सरकार के गृह मंत्रालय की ओर से उनका रेजिडेंट परमिट नवीनीकृत करने और राजनीतिक परिदृश्य में आए व्यापक बदलावों के बाद तसलीमा नसरीन की यह वापसी दक्षिण एशिया के सामाजिक और साहित्यिक गलियारों में एक नया विमर्श पैदा कर रही है। कोलकाता के सांस्कृतिक केंद्र 'रवींद्र सदन' में होने वाली एक विशेष धर्मनिरपेक्ष साहित्यिक संगोष्ठी में भाग लेने के लिए उन्हें आमंत्रित किया गया है।
तसलीमा नसरीन का 1993 में प्रकाशित उपन्यास 'लज्जा' एक तीखा, और वास्तविक तथ्यों पर आधारित 'डॉक्यु-फिक्शन' (दस्तावेजी उपन्यास) है, जो उन्होंने ने दिसंबर 1992 में भारत के अयोध्या में बाबरी ढांचा ढहाए जाने के बाद बांग्लादेश में भड़के अल्पसंख्यक विरोधी दंगों के तुरंत बाद मात्र 7 दिनों में लिखा था।
यह ढाका में रहने वाले एक मध्यमवर्गीय बंगाली हिंदू 'दत्त परिवार' की कहानी है। परिवार के मुखिया डॉ. सुदोमय दत्त एक सच्चे देशभक्त, कट्टर धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी झुकाव वाले व्यक्ति हैं। सन 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान भयानक प्रताड़ना झेलने के बावजूद वे अपना वतन छोड़ कर भारत शरणार्थी बनने से इनकार कर देते हैं। उनका बेटा सुरंजन एक आधुनिक, शिक्षित युवक है, जो यह मानता है कि बंगाली राष्ट्रवाद किसी भी धार्मिक पहचान से ऊपर है।
उपन्यास के अनुसार बाबरी ढांचा ढहने की प्रतिक्रिया में जब ढाका की सड़कों पर कट्टरपंथी भीड़ हिंदुओं के घरों, मंदिरों और दुकानों को जलाने लगती है, तो दत्त परिवार का भ्रम टूटने लगता है। उपन्यास के चरम पर, सुदोमय की युवा बेटी 'माया' का उसके अपने ही घर से अपहरण कर लिया जाता है और दंगाई उसके साथ सामूहिक बलात्कार करते हैं। खुद को एक गौरवान्वित बांग्लादेशी मानने वाला सुरंजन अंततः यह महसूस करने पर मजबूर हो जाता है कि बहुसंख्यक समाज उसे केवल एक 'काफिर' या 'हिंदू' के रूप में देखता है। उपन्यास के अंत में, मानसिक और शारीरिक रूप से टूट चुका यह परिवार भारी मन से अपने ही वतन को छोड़ कर भारत पलायन करने का फैसला करता है।
तसलीमा नसरीन के उपन्यास 'लज्जा' वो अंश जो विवादों का कारण बने। (विजुअल डिजाइन: ChatGPT.)
तसलीमा ने इस उपन्यास में रूपकों या प्रतीकों का सहारा लेने के बजाय तत्कालीन बांग्लादेशी अखबारों की कतरनों, दंगों की तारीखों, लूटे गए मंदिरों की सूचियों और वास्तविक सांख्यिकीय आंकड़ों को उपन्यास के टेक्स्ट में शामिल किया। उन्होंने सीधे तौर पर बांग्लादेश के संविधान के आठवें संशोधन (1988) की आलोचना की, जिसके तहत इस्लाम को बांग्लादेश का 'राज्य धर्म' घोषित किया गया था।
कट्टरपंथियों और तत्कालीन बेगम खालिदा जिया की सरकार की आपत्ति यह थी कि यह पुस्तक अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बांग्लादेश की छवि एक 'असहिष्णु और सांप्रदायिक राष्ट्र' के रूप में पेश करती है। साहित्यिक आलोचकों का मानना था कि 'लज्जा' ने उस समय दक्षिण एशियाई साहित्य के उस संवेदनशील हिस्से को छुआ, जिसे राजनीतिक दल अक्सर कालीन के नीचे छुपा देते थे।
'लज्जा' उपन्यास के प्रकाशन के तुरंत बाद बांग्लादेश के बहुसंख्यक धार्मिक संगठनों ने इसका पुरजोर विरोध किया। उनका आरोप था कि पुस्तक में मुस्लिम समुदाय को हिंसक और अत्याचारी के रूप में दिखाया गया है। बांग्लादेश सरकार ने जुलाई 1993 में देश में सांप्रदायिक सदभाव बनाए रखने का हवाला देते हुए 'लज्जा' उपन्यास की बिक्री और वितरण पर पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया। उसके बाद सितंबर 1993 में, सिलहट के एक चरमपंथी संगठन 'शहाबा सैनिक परिषद' ने तसलीमा नसरीन के खिलाफ पहला फतवा जारी किया, उन्हें 'मुरतद' (धर्मत्यागी) घोषित किया और उनके सिर पर 50,000 टका के इनाम की घोषणा की।
तसलीमा नसरीन मई 1994 में भारत यात्रा पर आई थीं। इस दौरान उनके कोलकाता के प्रतिष्ठित अंग्रेजी दैनिक को दिए गए एक इंटरव्यू से बवाल मचा। इस अंग्रेजी दैनिक में 9 मई 1994 को छपे इस इंटरव्यू में उनके हवाले से लिखा गया कि 'लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए पवित्र कुरान को पूरी तरह से संशोधित करना चाहिए।'
यह खबर बांग्लादेश पहुंचते ही पूरे देश में भूचाल आ गया। लाखों कट्टरपंथी प्रदर्शनकारी ढाका, चटगांव और सिलहट की सड़कों पर उतर आए। उन्होंने ढाका बंद करवाने का आह्वान किया और तसलीमा नसरीन को सरेआम फांसी देने की मांग की। हालांकि तसलीमा ने तुरंत स्पष्टीकरण जारी कर कहा कि उनके बयान को गलत तरीके से पेश किया गया था- वे कुरान में नहीं, बल्कि सातवीं सदी के शरिया कानूनों में बदलाव करने की बात कर रही थीं, जो महिलाओं के खिलाफ हैं। लेकिन तब तक स्थिति हालात बेकाबू हो चुके थे।
बांग्लादेश से निकालने के बाद जब तसलीमा भारत में शरण लेने की कोशिश कर रही थीं, तब उन्होंने अपनी बहुचर्चित आत्मकथा का तीसरा भाग 'द्विखंडितो' बंगाली में प्रकाशित किया। इस पुस्तक में उन्होंने न केवल धार्मिक रूढ़िवाद पर प्रहार किया, बल्कि कोलकाता के कई नामचीन, वामपंथी और धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों और साहित्यकारों के कथित पाखंड का पर्दाफाश करते हुए उनके साथ अपने व्यक्तिगत व यौन संबंधों का खुल कर उल्लेख कर दिया।
कोलकाता के कुछ लेखकों की शिकायत और मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर नवंबर 2003 में पश्चिम बंगाल की तत्कालीन बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया। सरकार का तर्क था कि यह पुस्तक समाज में वैमनस्य फैला सकती है।
तसलीमा नसरीन 9 अगस्त 2007 को अपने एक उपन्यास के तेलुगू अनुवाद के विमोचन के लिए आंध्र प्रदेश ( अब तेलंगाना) की राजधानी हैदराबाद के प्रेस क्लब में मौजूद थीं। कार्यक्रम के दौरान ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन के तत्कालीन तीन विधायकों (जिनमें मोअज्जम खान शामिल थे) के नेतृत्व में पार्टी कार्यकर्ताओं की एक उग्र भीड़ ने हॉल में घुस कर तसलीमा नसरीन पर सीधा हमला कर दिया। उन पर कुर्सियां, फूलदान और बैग फेंके गए। वहां मौजूद पत्रकारों ने मानव श्रृंखला बना कर तसलीमा को किसी तरह बचाया।
तथ्य और कारण: हैदराबाद की घटना की चिंगारी नवंबर तक कोलकाता पहुंच गई। उसके बाद 21 नवंबर 2007 को 'ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम' नामक संगठन ने तसलीमा नसरीन का वीजा रद्द करने और उन्हें भारत से निष्कासित करने की मांग को लेकर मध्य कोलकाता (विशेषकर पार्क सर्कस और एजेसी बोस रोड) को पूरी तरह जाम कर दिया।
कोलकाता में विरोध प्रदर्शन देखते ही देखते एक भीषण हिंसक दंगे में तब्दील हो गया। पुलिस वाहनों को आग लगा दी गई, सरकारी संपत्तियों को नष्ट किया गया और बड़े पैमाने पर पथराव हुआ। नतीजतन, पश्चिम बंगाल के इतिहास में कई दशकों बाद कानून-व्यवस्था बहाल करने के लिए सेना को बुलाना पड़ा और शहर में कर्फ्यू लगाया गया। दबाव में आकर तत्कालीन राज्य सरकार ने उसी रात तसलीमा नसरीन को गुप्त रूप से कोलकाता छोड़ने पर मजबूर कर दिया।
तसलीमा नसरीन के खिलाफ कानूनी कार्रवाइयों और उनके आधिकारिक देश निकाले का सिलसिला पूरी तरह से अदालती फाइलों और सरकारी आदेशों में दर्ज है:
-4 जून 1994: गिरफ्तारी वारंट।
-44 दिन भूमिगत।
-3 अगस्त 1994: जमानत व निर्वासन।
-2003-2005: कलकत्ता हाईकोर्ट केस।
ढाका के मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट की अदालत ने बांग्लादेश दंड संहिता की धारा 295A के तहत तसलीमा नसरीन के खिलाफ गैर-जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी किया। तसलीमा लगातार 44 दिनों तक ढाका में कई शुभचिंतकों के घरों में अंडरग्राउंड रहीं। आखिरकार यूरोपीय संघ, एमनेस्टी इंटरनेशनल और मानवाधिकार संगठनों के कड़े राजनयिक हस्तक्षेप के बाद, 3 अगस्त 1994 को उन्हें ढाका उच्च न्यायालय से सशर्त जमानत मिली। न्यायालय ने उन्हें देश छोड़ने की अनुमति दी और 10 अगस्त 1994 को वे स्वीडन के लिए रवाना हो गईं। इसके बाद बांग्लादेश सरकार ने उनका पासपोर्ट अमान्य कर दिया, जिससे उनका आधिकारिक निर्वासन शुरू हुआ।
भारत में पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से उनकी 'द्विखंडितो' पुस्तक पर लगाए गए प्रतिबंध को मानवाधिकार कार्यकर्ता सुजातो भद्र ने कलकत्ता उच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। वर्ष 2005 में न्यायमूर्ति दिलीप कुमार सेठ की तत्कालीन पीठ ने राज्य सरकार के प्रतिबंध को पूरी तरह असंवैधानिक और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन बताते हुए खारिज कर दिया। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा था कि 'केवल कानून-व्यवस्था बिगड़ने के डर से सरकार किसी लेखक की कलम पर ताला नहीं लगा सकती।'
तसलीमा नसरीन का जन्म 25 अगस्त 1962 को तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के मयमनसिंह शहर में हुआ था। उनके पिता डॉ. रजब अली एक चिकित्सक थे और उनकी मां उल्फत आरा एक धार्मिक महिला थीं। तसलीमा ने अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए चिकित्सा विज्ञान की पढ़ाई की। उन्होंने 1986 में मयमनसिंह मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस की डिग्री प्राप्त की और एक सरकारी अस्पताल में स्त्री रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्य करना शुरू किया।
तसलीमा ने चिकित्सा पेशे में रहते हुए समाज के सबसे निचले तबके की महिलाओं के दर्द, उनके शोषण और पितृसत्तात्मक समाज की क्रूरता को बहुत करीब से देखा। यही अनुभव उनके लेखन का मुख्य आधार बने। सन 1980 के दशक के उत्तरार्ध में उन्होंने कविताएं और बंगाली पत्र-पत्रिकाओं में तीखे कॉलम लिखना शुरू किया। उनके लेखों में महिलाओं के अधिकारों, लैंगिक असमानता और धार्मिक रूढ़िवादिता पर सीधा प्रहार होता था, जिसने बहुत जल्द उन्हें बांग्लादेश के प्रगतिशील खेमे में लोकप्रिय और कट्टरपंथी संगठनों की नजरों में एक विवादित चेहरा बना दिया। सन 1993 तक आते-आते अपने विवादित लेखन की वजह से बढ़ते दबाव के कारण उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दियाऔर पूरी तरह साहित्य को समर्पित हो गईं।
तसलीमा नसरीन के भारत आगमन और निष्कासन की समयरेखा बेहद जटिल और राजनीतिक उतार-चढ़ाव से भरी रही है। यूरोप (स्वीडन, जर्मनी, फ्रांस) में लगभग एक दशक बिताने के बाद, तसलीमा की हमेशा से यह इच्छा थी कि वे कोलकाता में रहें, क्योंकि वहां की भाषा बंगाली है, जो उनकी मातृभाषा है।
2004-2007 (कोलकाता निवास): तसलीमा नसरीन 2004 में दीर्घकालिक पर्यटक वीजा पर भारत आईं और उन्होंने कोलकाता के राउडन स्ट्रीट के पास एक अपार्टमेंट को अपना आशियाना बनाया। यही वह समय था जब वे सक्रिय रूप से भारत के साहित्यिक परिदृश्य का हिस्सा बनीं।
नवंबर 2007 (कोलकाता से निष्कासन): पश्चिम बंगाल पुलिस ने 21 नवंबर 2007 को कोलकाता में हुए दंगों के बाद, 22 नवंबर की तड़के सुबह सुरक्षा का हवाला देकर उन्हें चुपचाप एक फ्लाइट से जयपुर (राजस्थान) भेज दिया। जयपुर में भी स्थानीय संगठनों के विरोध के कारण उन्हें दो दिनों के भीतर दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया।
दिल्ली में तसलीमा नसरीन को सात महीनों से अधिक समय तक गृह मंत्रालय के एक अज्ञात 'सेफ हाउस' (चित्तरंजन पार्क के पास) में लगभग नजरबंद रखा गया। उन्हें किसी से मिलने या बाहर जाने की अनुमति नहीं थी। उनके गिरते स्वास्थ्य और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण, 19 मार्च 2008 को वे भारत छोड़ कर पुनः यूरोप (स्वीडन) चली गईं। यही वह समय था जब वे आधिकारिक तौर पर दीर्घकालिक निवास के रूप में पिछली बार भारत में थीं। हालांकि, बाद के वर्षों (2011 के बाद) में उन्हें भारत सरकार ने हर साल 'रेजिडेंट परमिट' की अवधि बढ़ाने की अनुमति मिलती रही, जिसके कारण वे दिल्ली में अत्यंत सुरक्षित और नियंत्रित माहौल में आती-जाती रहीं, लेकिन कोलकाता की धरती पर उनके प्रवेश पर अघोषित पाबंदी लगी रही।
'तसलीमा नसरीन एक अपराधी हैं जिन्होंने इस्लाम और हमारे पैगंबर के खिलाफ जहर उगला है। वामपंथी सरकार उन्हें इस शहर में पनाह देकर मुसलमानों के जख्मों पर नमक छिड़क रही है। जब तक वे भारत छोड़ कर नहीं जातीं, कोलकाता की सड़कों पर चक्का जाम रहेगा।' -मुफ्ती ताजुद्दीन कासमी ,तत्कालीन अध्यक्ष, ऑल इंडिया माइनॉरिटी फोरम ( 21 नवंबर 2007, कोलकाता की रैली में)
'एक सरकार के रूप में हमारी पहली जिम्मेदारी राज्य के करोड़ों नागरिकों की जान-माल की रक्षा करना है। यदि किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति के कारण शहर में दंगे होते हैं और सेना बुलानी पड़ती है, तो हमें कठोर और कड़वे प्रशासनिक निर्णय लेने ही होंगे। हमने तसलीमा को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया है।'
-बुद्धदेव भट्टाचार्य, तत्कालीन मुख्यमंत्री ने, पश्चिम बंगाल 22 नवंबर 2007 को राज्य विधानसभा में कहा।
'कोलकाता मेरी आत्मा थी। वहां के लोग मेरी भाषा बोलते थे, वहां का साहित्य मेरा अपना था। लेकिन तथाकथित धर्मनिरपेक्ष और वामपंथी सरकार ने चंद वोटों के तुष्टीकरण के लिए एक अकेली, निहत्थी लेखिका को आधी रात को अपराधियों की तरह शहर से खदेड़ दिया। यह लोकतंत्र के चेहरे पर सबसे बड़ा तमाचा था।'
-तसलीमा नसरीन, सन 2012 में प्रकाशित आत्मकथा 'निर्वासन' से।
तसलीमा नसरीन ने हाल ही में अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर एक अत्यंत भावुक संदेश शेयर करते हुए लिखा: 'लगभग दो दशकों के बाद, एक ऐसे बंगाल में वापसी जहां मेरी अभिव्यक्ति को दबाया नहीं जाएगा।'
प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया और एडिटर्स गिल्ड के वरिष्ठ विश्लेषकों का मानना है कि तसलीमा की यह वापसी केवल एक लेखिका की घर वापसी नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में 'राइट टू ऑफेंड' (आहत करने का अधिकार) और लेखक की संप्रभुता की एक बहुत बड़ी वैचारिक जीत है। हालांकि, कोलकाता पुलिस और खुफिया ब्यूरो के लिए 1 अगस्त का यह दिन सुरक्षा के लिहाज से एक अग्निपरीक्षा की तरह होगा।
Updated on:
15 Jul 2026 05:51 pm
Published on:
15 Jul 2026 05:51 pm
