
बादल फटने से मचती है तबाही। (फोटो डिजाइन: पत्रिका)
जब भी पहाड़ी इलाकों से 'बादल फटने' की खबर आती है, तो अपने पीछे तबाही, मलबे का ढेर और अपनों को खोने की चीख-पुकार छोड़ जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि वैज्ञानिक नजरिये से 'बादल फटना' कोई गुब्बारे की तरह बादल का अचानक फट जाना नहीं है? यह एक बहुत जटिल मौसम वैज्ञानिक घटना (Meteorological Phenomenon) है, जिसमें कुछ ही मिनटों के अंदर लाखों टन पानी एक सीमित दायरे में गिर जाता है। मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी 20 से 30 वर्ग किलोमीटर के सीमित भौगोलिक क्षेत्र में 100 मिलीमीटर (10 सेंटीमीटर) या उससे अधिक प्रति घंटा की दर से मूसलाधार बारिश होती है, तो उसे तकनीकी रूप से क्लाउडबर्स्ट या बादल फटना कहा जाता है। आइए वैज्ञानिक अनुसंधानों, भौतिकी के नियमों और भूवैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर समझते हैं कि यह कैसे होता है और इसके पीछे तबाही का असली गणित क्या है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, बादल फटने की घटना मूल रूप से गहरे, नमी से लबालब भरे क्युमुलोनिम्बस बादलों (Cumulonimbus Clouds) के अचानक ढहने (Collapse) के कारण होती है। वायुमंडल में इस स्थिति को बनाने के लिए मुख्य रूप से चार कारक जिम्मेदार होते हैं:
यह प्रक्रिया विशेष रूप से भारतीय हिमालयी क्षेत्र या पश्चिमी घाट जैसे पहाड़ी इलाकों में सबसे सक्रिय होती है। जब मैदानों या महासागरों से आने वाली गर्म और अत्यधिक नमी से भरी हवाएं आगे बढ़ती हैं, तो उनके रास्ते में ऊंचे और सीधे पहाड़ आ जाते हैं। पहाड़ों से टकराकर इन हवाओं को तेजी से ऊपर (Upward) उठना पड़ता है। ऊपर उठते ही वायुमंडलीय दबाव कम होने के कारण हवा का तेजी से रुद्धोष्म शीतलन (Adiabatic Cooling) होता है। तापमान में इस अचानक गिरावट से हवा में मौजूद नमी तेजी से संघनित (Condense) होकर बेहद घने क्युमुलोनिम्बस बादलों का रूप ले लेती है।
बादल कैसे फटने की वैज्ञानिक प्रक्रिया सिलसिलेवार समझें। (विजुअल: ChatGPT.)
घाटी वाले क्षेत्रों में जब सतह का तापमान बहुत अधिक हो जाता है, तो वहां की गर्म हवा तेजी से ऊपर की ओर भागती है। यह तीव्र संवहन (Convection) अपने साथ आसपास की भारी नमी को खींचकर वायुमंडल में काफी ऊंचाई तक ले जाता है। यह प्रक्रिया एक अंतहीन चक्र की तरह काम करती है, जिससे बादलों का आकार और घनत्व असाधारण रूप से बढ़ता चला जाता है।
क्युमुलोनिम्बस बादलों के अंदर हवा के ऊपर की ओर उठने वाली धाराओं को अपड्राफ्ट (Updrafts) कहा जाता है, ये बहुत शक्तिशाली होती हैं। कई बार ये अपड्राफ्ट बादलों के अंदर मौजूद पानी की लाखों बूंदों और बर्फ के कणों को हवा में ही रोक कर रखते हैं। इन्हें नीचे गिरने का मौका ही नहीं मिलता।
इसी दौरान बादलों के अंदर 'लैंगमुइर वर्षण प्रक्रिया' (Langmuir Precipitation Process) काम करती है, जिसमें गिरती हुई बड़ी बूंदें हवा में लटकी हुई छोटी बूंदों को अपने अंदर सोख कर और भारी हो जाती हैं। जब पानी का कुल वजन इन अपड्राफ्ट हवाओं की वहन क्षमता (Carrying Capacity) से अधिक हो जाता है, या अचानक ऊपर उठने वाली हवा रुक जाती है, तो बादल का पूरा ढांचा एक झटके में ढह जाता है। इसे विज्ञान की भाषा में डाउनड्राफ्ट (Downdraft) का हावी होना कहते हैं, जिससे लाखों टन पानी एक साथ जमीन पर गिरता है। जानिए कैसे एक सीमित दायरे में अचानक लाख टन पानी गिरकर तबाही का कारण बनता है।
जब हवा में हाई केप (CAPE - Convective Available Potential Energy) और नमी का अभिसरण (Moisture Convergence) एक साथ होता है, तो वातावरण बहुत अस्थिर हो जाता है। उदाहरण के लिए, जब मानसून की नम हवाएं उत्तर से आने वाली सूखी पश्चिमी हवाओं (Westerlies) से टकरा कर एक जगह रुक (Stall) जाती हैं, तो क्युमुलोनिम्बस बादल एक ही जगह ठहरकर भारी तबाही का कारण बनते हैं।
बादल फटने से होने वाले नुकसान को समझने के लिए सबसे पहले इसके भौतिकी और पानी के आयतन (Volume) के गणित को समझना होगा।
देश में बादल फटने की प्रमुख घटनाएं। ( विजुअल: ChatGPT)
अगर किसी 1 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में 100 मिलीमीटर (10 सेमी) बारिश होती है, तो इसका मतलब है कि उस 1 वर्ग किलोमीटर की सतह पर 1,00,000 घन मीटर (यानी लगभग 1 लाख मीट्रिक टन) पानी गिर चुका है। जब यह विशाल जलराशि चंद मिनटों में पहाड़ों की ढलान पर गिरती है, तो तबाही का आना तय है।
पहाड़ी क्षेत्रों में ढलानें बेहद तीव्र होती हैं। जब अचानक लाखों टन पानी इन ढलानों पर गिरता है, तो प्राकृतिक जलधाराएं और नदियां तुरंत ओवरफ्लो हो जाती हैं। पानी इतनी तेज गति (Kinetic Energy) से नीचे आता है कि रास्ते में आने वाले बड़े-बड़े पत्थरों (Boulders), ढीली मिट्टी और उखड़े हुए पेड़ों को अपने साथ बहा ले जाता है। यह पानी अब सामान्य पानी नहीं रह जाता, बल्कि एक गाढ़ा और भारी मलबे का तैरता हुआ दलदल (Viscous Slurry) बन जाता है, जो किसी भी पक्के कंक्रीट के ढांचे को मलबे की तरह ढहाने की ताकत रखता है।
मूसलाधार बारिश कई इलाकों के लिए आफत ले कर आती है। ( फोटो: ChatGPT)
बहरहाल, मूसलाधार बारिश के कारण पहाड़ों की ऊपरी मिट्टी कुछ ही मिनटों में पूरी तरह संतृप्त (Saturated) हो जाती है। पानी मिट्टी के कणों के बीच गहराई तक समा जाता है, जिससे मिट्टी के भीतर पोर वॉटर प्रेशर (Pore Water Pressure) अचानक बढ़ जाता है। यह बढ़ा हुआ दबाव मिट्टी के कणों को एक-दूसरे से दूर धकेलता है, जिससे पहाड़ों की आंतरिक घर्षण शक्ति (Shear Strength) और सामंजस्य खत्म हो जाता है। नतीजा यह होता है कि पूरी की पूरी पहाड़ी ढलान खिसक कर नीचे आ जाती है, जिसे हम विनाशकारी भूस्खलन कहते हैं।
Updated on:
19 Jul 2026 02:32 pm
Published on:
19 Jul 2026 01:35 pm
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