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Ontong Java Plateau: प्रशांत महासागर के नीचे क्यों हुआ दुनिया का सबसे भयंकर विस्फोट, जानिए कैसे बदला पृथ्वी का भूगोल!

Supervolcano विस्फोट ने प्रशांत महासागर के नीचे स्थित पूरी ओशन प्लेट का रसायन बदल दिया है। वैज्ञानिकों ने सिस्मिक वेव्ज के जरिये समुद्र के नीचे छिपे डाइक नेटवर्क की खोज की है, जो पृथ्वी के इतिहास की सबसे बड़ी भूगर्भीय घटना है।
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भारत

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MI Zahir

Jul 19, 2026

Mega-volcanic eruption in the Pacific Ocean News.

प्रशांत महासागर के अंदर महा-ज्वालामुखी विस्फोट। (फोटो: Google Gemini AI.)

Oceanic Plate : दुनिया भर के भूवैज्ञानिक (Geologists) हमेशा से यह जानने के लिए उत्सुक रहे हैं कि करोड़ों साल पहले जब पृथ्वी बन रही थी और इस पर विशालकाय डायनासोर घूमते थे, तब इसके गर्भ में क्या चल रहा था। हाल ही में जापान के ओकायामा विज्ञान विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने एक ऐसा खुलासा किया है जिसने विज्ञान जगत को हैरान कर दिया है। वैज्ञानिकों के शोध के अनुसार आज से लगभग 11 से 12 करोड़ साल (110-120 मिलियन वर्ष) पहले प्रशांत महासागर के अंदर एक ऐसा महा-ज्वालामुखी विस्फोट हुआ था, जिसने न केवल समुद्र के अंदर एक विशाल पठार बना, बल्कि उसके नीचे स्थित पूरी महासागरीय प्लेट (Oceanic Plate) के आंतरिक ढांचे और उसकी रासायनिक संरचना हमेशा के लिए बदल गई। इस ऐतिहासिक और अभूतपूर्व शोध को मशहूर वैज्ञानिक पत्रिका 'जियोफिजिकल रिसर्च लेटर्स'में प्रकाशित किया गया है। आइए इस पूरे वैज्ञानिक घटनाक्रम के पीछे के विज्ञान और पृथ्वी पर पड़े इसके प्रभावों को विस्तार से समझते हैं।

प्रशांत महासागर के नीचे विस्फोट,ओंन्टोंग जावा पठार और भूकंपीय ​तरंगों की खोज की प्रक्रिया। ( फोटो: Google Gemini)

ओन्टोंग जावा पठार (OJP) क्या है और यह कहां स्थित है?

इस रिसर्च को समझने के लिए सबसे पहले हमें ओन्टोंग जावा पठार (Ontong Java Plateau - OJP) को समझना होगा।

ओन्टोंग जावा पठार : स्थान और आकार

यह विशाल पठार पश्चिमी प्रशांत महासागर के तल में डूबा हुआ है। यह साइज में इतना बड़ा है कि इसे दुनिया का सबसे बड़ा महासागरीय पठार (Large Igneous Province) माना जाता है। इसका क्षेत्रफल अलास्का या पूरे पश्चिमी यूरोप जितना बड़ा है।

ओन्टोंग जावा पठार के निर्माण का इतिहास

वैज्ञानिकों के अनुसार, आज से करीब 12 करोड़ साल पहले इस क्षेत्र में असाधारण और लगातार ज्वालामुखी विस्फोट हुए थे। समुद्र के अंदर हुए इन विस्फोटों से इतना ​अधिक लावा निकला कि उसने समुद्र के तल पर हजारों मीटर मोटी चट्टानी परत बन गई, जिसे आज हम ओन्टोंग जावा पठार के नाम से जानते हैं।

सबसे भीषण और सबसे बड़ी ज्वालामुखी घटनाओं में से एक

क्या आप जानते हैं कि यह ज्वालामुखी घटना पृथ्वी के पूरे इतिहास की सबसे भीषण और सबसे बड़ी ज्वालामुखी घटनाओं में से एक मानी जाती है। इससे निकली गैसों और लावे ने उस समय पृथ्वी की जलवायु को पूरी तरह बदल दिया था और बड़े पैमाने पर जीवों के विलुप्त होने (Mass Extinction) का कारण बनी थी।

प्रशांत महासागर में सबसे बड़ा ज्वालामुखी विस्फोट होने की प्रक्रिया। (फोटो डिजाइन: पत्रिका.)

शोधकर्ताओं की टीम और उनकी नई खोज

रिसर्च के अनुसार इस रहस्यमयी संरचना का पता लगाने के लिए ओकायामा विज्ञान विश्वविद्यालय की मुख्य व्याख्याता अज़ुसा शितो के नेतृत्व में एक विशेष टीम बनाई गई। इस टीम में टोक्यो विज्ञान संस्थान के एसोसिएट प्रोफेसर अकीरा इशीकावा और हिरोशिमा विश्वविद्यालय की प्रोफेसर मासाको योशिकावा जैसे दिग्गज वैज्ञानिक शामिल थे।

पठार के नीचे की कोई साधारण प्लेट नहीं

इस टीम ने अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग कर के ओन्टोंग जावा पठार के ठीक नीचे, यानि समुद्र तल से कई किलोमीटर गहराई में स्थित महासागरीय प्लेट का अध्ययन किया। सामान्य तौर पर माना जाता है कि समुद्र के नीचे की प्लेटें सपाट और एक जैसी सीधी परतों वाली होती हैं। लेकिन इस पठार के नीचे जब वैज्ञानिकों ने झांका, तो उन्हें कुछ ऐसा मिला जिसकी उन्होंने उम्मीद भी नहीं की थी। उन्हें पता चला कि इसके नीचे की प्लेट कोई साधारण प्लेट नहीं है, बल्कि इसके भीतर एक जटिल भूलभुलैया जैसी संरचना बनी हुई है।

भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) ने खोला पाताल का राज

अब सवाल यह उठता है कि समुद्र के नीचे कई किलोमीटर गहराई में स्थित चट्टानों के बारे में वैज्ञानिकों को कैसे पता चला? इसके लिए वैज्ञानिकों ने भूकंपीय तरंगों (Seismic Waves) का सहारा लिया। यह तकनीक कुछ वैसी ही है जैसे डॉक्टर हमारे शरीर के अंदरूनी हिस्सों को देखने के लिए 'अल्ट्रासाउंड' या 'एक्स-रे' का उपयोग करते हैं।

पृथ्वी में भूकंप आने या छोटे विस्फोट से तरंगें निकलती हैं

रिसर्च के मुताबिक जब पृथ्वी में भूकंप आते हैं या छोटे विस्फोट होते हैं, तो उनसे तरंगें निकलती हैं जो जमीन के अंदर यात्रा करती हैं। वैज्ञानिकों ने विशेष रूप से दो प्रकार की उच्च-आवृत्ति (high-frequency) वाली तरंगों का अध्ययन किया, जिन्हें 'पो' (Po) और 'सो' (So) तरंगें कहा जाता है।

इन तरंगों का अजीब व्यवहार

सामान्य प्लेटों में: जब ये तरंगें किसी सामान्य महासागरीय प्लेट से गुजरती हैं, तो वे उसकी क्षैतिज (horizontal) परतों से टकराकर बार-बार बिखरती हैं और बिना कमजोर पड़े हजारों किलोमीटर का सफर तय कर लेती हैं।

भूकंप आने और प्लेटें खिसकने की प्रक्रिया। (फोटो डिजाइन: पत्रिका.)

ओन्टोंग जावा पठार के नीचे 'सो' तरंगें कमजोर हो गईं

वैज्ञानिकों ने देखा कि यहां से गुजरने वाली तरंगों ने बहुत ही अजीब व्यवहार किया। 'पो' तरंगें तो आसानी से आगे बढ़ गईं, लेकिन 'सो' तरंगें अचानक बहुत ज्यादा कमजोर (attenuate) हो गईं। इस असमानता ने वैज्ञानिकों के कान खड़े कर दिए। इससे यह साफ हो गया कि इस पठार के नीचे कुछ ऐसा है जो सामान्य प्लेटों में नहीं होता।

प्लेट के अंदर 'डाइक' (Dike) का जादुई नेटवर्क

भूकंपीय तरंगों के इस अजीब व्यवहार को समझने के लिए वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर पर 'वेवफॉर्म मॉडलिंग' (Waveform Modeling) का इस्तेमाल किया। इससे जो तस्वीर उभर कर सामने आई, उससे वैज्ञानिक हैरान रह गए।

क्या होता है 'डाइक' या 'डाइक झुंड'

पठार के नीचे की प्लेट में क्षैतिज परतें तो थीं, लेकिन उन्हें जगह-जगह से खड़ी (vertical) दीवारों जैसी संरचनाओं ने काट रखा था। भूविज्ञान की भाषा में इन खड़ी संरचनाओं को 'डाइक' (Dikes) या 'डाइक झुंड' (Dike Swarms) कहा जाता है।

आखिर ये डाइक कैसे बने?

रिसर्च के अनुसार करोड़ों साल पहले जब मेंटल (पृथ्वी की अंदरूनी परत) से पिघला हुआ गर्म मैग्मा ऊपर की ओर आ रहा था, तो उसने ऊपर मौजूद महासागरीय प्लेट को सीधे फाड़ दिया। मैग्मा ने प्लेट के भीतर ऊपर की ओर जाने के लिए ऊर्ध्वाधर (vertical) रास्ते या चैनल बना लिए। जब ज्वालामुखी शांत हुआ, तो इन रास्तों में भरा हुआ मैग्मा वहीं जमकर ठोस चट्टान बन गया।

भूकंपीय तरंगें इस जाल से गुजरीं, तो वे कट कर कमजोर हो गईं

आज हालत यह है कि ओन्टोंग जावा पठार के नीचे इन मैग्मा चैनलों (डाइक्स) का एक विशाल भूमिगत नेटवर्क या जाल फैला हुआ है। यही कारण था कि जब भूकंपीय तरंगें इस जाल से गुजरीं, तो वे कट गईं और कमजोर हो गईं।

रासायनिक रूपांतरण: मैग्मा ने बदल दिया प्लेट का 'डीएनए'

इस शोध की सबसे बड़ी और चौंकाने वाली खोज यह है कि इस ज्वालामुखी घटना ने प्लेट को केवल शारीरिक या भौतिक रूप से ही नहीं तोड़ा, बल्कि उसका रासायनिक रूपांतरण (Chemical Modification) भी कर दिया।

पठार के नीचे से गुजरने वाली भूकंपीय तरंगों की गति असामान्य रूप से धीमी

वैज्ञानिकों ने रिसर्च के दौरान पाया कि पठार के नीचे से गुजरने वाली भूकंपीय तरंगों की गति असामान्य रूप से धीमी थी। चट्टानों के भीतर तरंगों की गति तभी धीमी होती है जब चट्टानें या तो बहुत गर्म हों, टूटी-फूटी हों, या फिर उनकी रासायनिक संरचना बदल चुकी हो। चूंकि यह घटना करोड़ों साल पुरानी है, इसलिए चट्टानें अब ठंडी हो चुकी हैं। इसका सीधा मतलब यह था कि मैग्मा ने वहां की चट्टानों के रसायन को बदल दिया था।इस प्रक्रिया को विज्ञान में 'पुनः निषेचन' या 'रेफर्टिलाइजेशन' (Refertilization) कहा जाता है।

आखिर क्या होता है 'रेफर्टिलाइजेशन' (Refertilization)?

साइंस के मुताबिक पृथ्वी का मेंटल मुख्य रूप से पेरिडोटाइट (Peridotite) नाम की चट्टान से बना होता है। जब कभी यह चट्टान आंशिक रूप से पिघलती है, तो इसके भीतर के कई महत्वपूर्ण रासायनिक तत्व पिघले हुए लावे के साथ बाहर निकल जाते हैं, जिससे यह चट्टान 'कमजोर' या तत्वों से विहीन हो जाती है।

मैग्मा ने खोए हुए तत्वों को दुबारा चट्टानों में भर दिया

रिसर्च के अनुसार ओन्टोंग जावा पठार के मामले में उल्टा हुआ। गहराई से उठने वाले नए, पोषक तत्वों से भरपूर और गर्म मैग्मा ने इन कमजोर चट्टानों के साथ रासायनिक क्रिया की। मैग्मा ने उन खोए हुए तत्वों को दुबारा इन चट्टानों में भर दिया। इस वजह से चट्टानों के खनिज और उनके भौतिक गुण पूरी तरह बदल गए।

इस तबाही का असली जनक आखिर कौन था

वैज्ञानिकों का मानना है कि इस असाधारण ज्वालामुखी विस्फोट के पीछे पृथ्वी की गहराई से उठने वाला एक 'थर्मोकेमिकल प्लूम' (Thermochemical Plume) था।

मेंटल प्लूम क्या होता है?

पृथ्वी के कोर (केंद्र) के पास से गर्म पिघले हुए पदार्थ का एक विशाल स्तंभ या फव्वारा जब ऊपर की ओर उठता है, तो उसे मेंटल प्लूम कहते हैं।

थर्मोकैमिकल प्लूम क्यों अलग है?

रिसर्च के अनुसार थर्मोकैमिकल प्लूम केवल गर्म ही नहीं था, बल्कि रासायनिक रूप से अपने आस-पास के मेंटल से बिल्कुल अलग था। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस प्लूम के भीतर पृथ्वी की प्राचीन महासागरीय क्रस्ट (तटरेखा) के पुनर्चक्रित (recycled) हिस्से मौजूद थे, जो लाखों साल पहले पृथ्वी की गहराई में धंस गए थे। इसी अनोखे रसायन वाले प्लूम ने ऊपर आकर पूरी प्लेट का कायाकल्प कर दिया।

इस खोज का वैश्विक महत्व और भविष्य के रास्ते

ओकायामा विज्ञान विश्वविद्यालय और उनकी सहयोगी टीम का यह शोध केवल एक मृत ज्वालामुखी की कहानी नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी के काम करने के तरीके को समझने का एक नया जरिया है।

ज्वालामुखी केवल सतह नहीं बदलते

रिसर्च का कंक्लूजन यह है कि अब तक माना जाता था कि ज्वालामुखी सिर्फ पृथ्वी की ऊपरी सतह या समुद्र तल पर लावा जमा करते हैं। लेकिन इस रिसर्च से साबित हुआ है कि बड़े ज्वालामुखी विस्फोट टेकटोनिक प्लेटों को अंदर से पूरी तरह नया आकार दे सकते हैं। इससे वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद मिलेगी कि महासागरीय प्लेटें समय के साथ कैसे विकसित होती हैं और उनका क्षरण कैसे होता है। यह खोज हमें यह समझने के और करीब ले जाएगी कि कैसे इस महा-विस्फोट ने प्राचीन काल में पृथ्वी के वायुमंडल, महासागरों में ऑक्सीजन की मात्रा और बड़े पैमाने पर जीवों के विलुप्त होने को प्रभावित किया था।

पृथ्वी में जटिल और कई विस्मयकारी हलचल जारी

बहरहाल, पृथ्वी के सीने में दफन ओन्टोंग जावा पठार आज भी वैज्ञानिकों के लिए एक अनसुलझी पहेली जैसा था, लेकिन भूकंपीय तरंगों और जापानी वैज्ञानिकों की सूझबूझ ने इसके नीचे छिपे 'डाइक नेटवर्क' और 'रासायनिक रूपांतरण' के रहस्य उजागर कर दिए हैं। यह खोज साबित करती है कि हमारी पृथ्वी जितनी बाहर से गतिशील है, उसके गर्भ में उससे कहीं अधिक जटिल और कई विस्मयकारी हलचल जारी हैं, जो आज भी इसका भूगोल नियंत्रित कर रही हैं।