21 जनवरी 2026,

बुधवार

Patrika LogoSwitch to English
icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

कबाड़ का बिजनेस कर कम समय में महिला समूह ने बदली अपनी तकदीर

महासमुंद. कबाड़ का बिजनेस कर शहर की महिलाओं का एक समूह आत्मनिर्भर बन गया है। अब महिलाएं अपने बच्चों को स्कूलों में भी पढ़ा रही हैं। इसके अलावा स्वयं भी बैंक संबंधित कार्यों के लिए हस्ताक्षर करना या बैंक में पैसे जमा करने के लिए आवेदन भरना तथा अक्षर ज्ञान भी सीख गई हैं।

2 min read
Google source verification
कबाड़ का बिजनेस कर कम समय में महिला समूह ने बदली अपनी तकदीर

कबाड़ का बिजनेस कर कम समय में महिला समूह ने बदली अपनी तकदीर

महासमुंद. कबाड़ से होने वाली कमाई से महिलाओं की जिंदगी में बदलाव आया है। एक समय था जब देवार महिलाओं को कबाड़ खरीदने के लिए बैंक ऋण देने के लिए तैयार नहीं था। बैंक असमंजस में था कि महिलाएं कर्ज का भुगतान कर पाएंगी या नहीं। लगातार निवेदन के बाद बैंक ने एक लाख का कर्ज दिया था। जिसका पूरा किस्त महिलाएं एक वर्ष में ही भुगतान कर चुकी हैं। जय मां दुर्गेश्वरी महिला समूह की सुंदरी बाई ने बताया कि हम छोटे-छोटे कबाडिय़ों से कबाड़ का सामान खरीदते हैं। फिर इसे यहां से वाहन बुक कर सीधे रायपुर भेज देते हैं। इससे प्रति माह लगभग 35-४० हजार रुपए कमाई हो जाती है। समूह में कुल 10 सदस्य हैं। हर सदस्य को लगभग 3 हजार रुपए प्राप्त हो जाते हैं व बैंक का किस्त भी भुगतान कर देते हैं। उन्होंने बताया कि महिलाओं की जिंदगी में इससे बदलाव आया है। पहले कोई बैंक हमें लोन नहीं देता था, लेकिन अब बैंकों से लोन भी आसानी से मिल जाता है।
महिलाओं की जिंदगी में आया बदलाव
राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन की मार्गदर्शक प्रेमशीला बघेल ने बताया कि शुरुआत में कोई बैंक महिलाओं को कोई लोन नहीं देना चाहता था। अब 6 लाख तक को लोन भी मिल गया है। महिलाएं छोटे कबाडिय़ों से कबाड़ खरीदती हैं, जिसे रायपुर में बेचकर आय अर्जित करती हंै। महिलाओं ने अब हस्ताक्षर करना व अक्षर ज्ञान भी सीख गईं है। महिलाएं अच्छा कार्य कर रही हैं। साफ-सफाई पर भी अब ज्यादा ध्यान देती हैं। उन्होंने बताया कि वे महिलाओं का मार्गदर्शन करती आ रही हैं।
ये महिलाएं समूह से जुड़ीं
संदरी बाई ने बताया कि समूह में माला देवार, हेम कुमारी, मैनू मांझी, इंद्राणी सोनवाली, रूखी देवार, बुगला मरकाम, वीरधर्मा उर्फ प्रिया, संगीता कुलहरिया, सतीरानी आदि जुड़े हुए हैं। महिलाओं के परिवार में अब खुशहाली है। बच्चे जो कबाड़ का काम करते थे, वे अब स्कूल जाते हैं।