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यहां एक दिन बाद विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है रक्षाबंधन

ऐतिहासिक परम्परा को आज भी निभाती है बहनें.

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यहां एक दिन बाद विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है रक्षाबंधन

महोबा. रविवार को रक्षाबंधन का पर्व पूरे देश में एक साथ मनाया जा रहा है। बहनें इस पर्व पर भाई की कलाई पर राखी बांधकर रक्षा का वचन लेती हैं। बुंदेलखंड के महोबा में ऐतिहासिक परम्परा के चलते भाई बहन का ये पर्व एक दिन बाद मनाया जाता है। इस दिन महोबा में ऐतिहासिक मेले का भी आयोजन होता है साथ ही यहाँ के वीरों को याद करने के लिए भव्य शोभा यात्रा भी निकाली जाती है।
भारत देश में पर्वों का अलग महत्व है। खासकर भाई बहन को एक सूत्र में पिरोने वाले पर्व रक्षाबंधन का। आज के दिन बहन अपने भाई की कलाई पर राखी बांधकर उससे रक्षा का वचन लेती है। ये पर्व एक साथ पूरे देश में आज मनाया जा रहा है, लेकिन महोबा में आज ये पर्व नहीं मनाया गया। सदियों से इस पर्व को एक दिन बाद मानाने की परंपरा है।

चंदेल शासक परमाल का का राज था
ऐतिहासिक परम्परा होने के चलते आज भी रक्षाबंधन पर्व को दूसरे दिन मनाया जाता है। इसके पीछे एक बहन भाई के प्रेम और ऐतिहासिक युद्ध की कहानी है। इतिहासकार शरद तिवारी बताते हैं कि महोबा का एक अपना गौरवशाली इतिहास है। यहाँ एक दिन बाद रक्षा बंधन मनाया जाता है। ये परंपरा 1182 ई. के चंदेल शासनकाल से चली आ रही है। एक दिन बाद रक्षा बंधन मनाने का गौरवशाली इतिहास भी है। दरअसल 11 वीं सदी के अंत मे दिल्ली के शासक पृथ्वीराज चौहान ने महोबा पर हमला कर दिया था, उस समय महोबा में चंदेल शासक परमाल का का राज था।


जानकार बताते है कि जब पृथ्वीराज चौहान का आक्रमण महोबा में होने की खबर रानी चन्द्रावली को लगी तो उसने अपने मुंह बोले भाई आल्हा को राखी के वचन की याद दिलाई। रक्षा पर्व के दिन ही महोबा में हुए पृथ्वीराज चौहान के आक्रमण से रक्षाबंधन का पर्व नहीं मनाया जा सका। इस युद्ध मे महोबा की कई वीरांगनाओं ने अपने राजा की पुत्री चंद्रावल की रक्षा के लिए तलवार उठा ली थी। युद्ध मे सभी जाति समुदाय के लोंगो ने भाग लिया था। इस युद्ध के अगुआई राजा परमाल के सेनापति वीर आल्हा और ऊदल कर रहे थे। युद्ध महोबा के रक्षाबंधन के दिन ऐतिहासिक तालाब कीरत सागर के किनारे हुआ था, जिसमे पृथ्वी राज चौहान को हार का सामना करना पड़ा था। महोबियों ने अपनी जीत के बाद रक्षाबंधन पर्व को विजय पर्व के रूप में मनाया।

युद्ध में जीत को लेकर अगले दिन रक्षाबंधन को विजय दिवस के रूप में मनाया गया और इसी ऐतिहासिक कीरतसागर के किनारे राजा परमाल द्वारा कजली महोत्सव के नाम से एक समारोह आयोजित किया गया तब से वही प्रथा आज तक चली आ रही है। यहां एक दिन के बाद बहने भाइयों को राखी बाँधती हैं और एक सप्ताह तक कजली महोत्सव मनाया जाता है। इस ऐतिहासिक पर्व के साथ ही 27 अगस्त से कजली मेले का भी शुभारम्भ हो जायेगा।

ये दिन हम बहनों के लिए बड़ा खास है
रक्षा बंधन में रक्षासूत्र बाँधती हुए बीए की छात्रा स्वाति बताती हैं कि हम इस दिन का बड़ी बेसब्री से इंतजार करते हैं। हम अपने भाई की कलाई में राखी बांधकर उनसे अपने सुरक्षा का भरोसा लेते हैं और भाई हमे उपहार भी देते हैं। महोबा में रक्षाबंधन के दिन तो चंदेल शासक परमाल की पुत्री की रक्षा के लिए आल्हा ऊदल ने उन्हें अपनी बहन मानकर दिल्ली के शासक पृथ्वीराज से युद्ध किया था। इस युद्ध में पृथ्वी राज चौहान को हार का सामना करना पड़ा था और महोबा में अगले दिन रक्षा बंधन मनाया गया था। तभी से महोबा में अगले दिन रक्षा बंधन मनाने की परंपरा चली आ रही है। ये दिन हम बहनों के लिए बड़ा खास है।

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