
करोड़ों वर्ष पुराने है शंख झिरी की पहाड़ी में मिलने वाले शंख
मंडला. जिला मुख्यालय से करीब 45 किलोमीटर की दूरी पर स्थित पाला सुंदर गांव प्रशासनिक अनदेखी के चलते गुमनामी के अंधेर में है। पाला सुंदर गांव के रहने वाले रमेश गोंड का कहना है कि कुछ सालों पहले वैज्ञानिकों का दल गांव में आया था। उन लोगों ने यहां जांच की थी, लेकिन जांच किस बात की हुई यह आज तक पता नहीं चला। क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि यह पहाड़ पुरातत्व की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण है, लेकिन गुमनामी के अंधेरे में खोया हुआ है। गांव के कुछ लोग इसी पहाड़ से खोदकर शंख लाते हैं। जिन्हें जानकारी नहीं है, वे लोग इसके पत्थरों का उपयोग सडक़ के गड्ढ़ों की पुराई तक के लिए कर लेते हैं। पहाड़ के प्रति ग्रामीणों में काफी आस्था है। पहाड़ पर पाए जाने वाले शंखों की वजह से ही इसका नाम शंख झिड़ी पहाड़ पड़ गया। यहां के शंख पुरातत्व संग्रहालय में भी संरक्षित किए गए हैं।
जानकारों के अनुसार नर्मदा वैली को विश्व की पुरातन सभ्यता का साक्षी माना जाता है। अजगर दादर की करोड़ों साल पुरानी आग्रेय चट्टान और पत्थर में तब्दील हो चुके घुघवा फाशिल्स पार्क में रखे पेड़-पौधे के साथ ही जिला मुख्यालय स्थित पुरात्तव संग्रहालय में रखी पुरानी धरोहरें तथा वनस्पतियां इस बात की गवाह हैं। बताया गया कि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) जो वन मंत्रालय के अधीनस्थ काम करता है की रिसर्च में भी यह बात सामने आ चुकी है कि धरती पर सबसे पहले प्राणी ने नर्मदा वैली में ही जन्म लिया था। इससे पूर्व मंडला का यह इलाका जलमग्न था। यहां डायनासौर की मौजूदगी के भी प्रमाण मिले हैं। यहां अब भी ऐसी चीजें मौजूद हैं, जो लोगों को आश्चर्य में डाल देती हैं। इन्हीं में शुमार है मंडला के पालासुंदर गांव के समीप स्थित शंख झिड़ी पहाड़ इस पहाड़ के पत्थरों के गर्भ में लाखों की संख्या में शंख मौजूद हैं। कौतूहल वश अब भी लोग इन शंखों को निकालकर अपने साथ ले जाते हैं। ये शंख पाषाण का रूप ले चुके हैं।
हर पग पर बिखरा रहस्य
इतिहासकार प्रो डॉ शरद नारायण खरे के अनुसार शंख झिड़ी पहाड़ करोड़ों वर्ष पुराना है। शोध में यह बात भी सामने आई है कि अरबों साल पहले यह इलाका जलमग्न था। पहाड़ पर शंखों की मौजूदगी यहां भारी मात्रा में जल होने की ओर इशारा करती है। यह भी माना जाता है कि यह क्षेत्र कभी नर्मदा जल के आगोश में रहा होगा। इसी वजह से यहां छोटे आकार के शंख आए। अब लाखों वर्ष की यात्रा में वे पत्थरों में तब्दील हो गए। यह पहाड़ मंडला जिला मुख्यालय से करीब 45 किमी दूर पालासुंदर पंचायत क्षेत्र में स्थित है। पहाड़ पर करीब दो सौ मीटर चढऩे के बाद ऐसे पत्थरों का मिलना शुरू हो जाता है, जो शंखनुमा हैं या फिर पत्थरों को फोडऩे पर उनके अंदर से शंख निकलते हैं। यूं कहेंं कि यहां हर पग पर शंख बिखरे पड़े हैं। इन्हें देखकर लोग अब भी हैरान रह जाते हैं।
एक पत्थर में कई शंख
पुरातत्व के जानकार हेमंतिका शुक्ला बताती है कि पाला सुंदर स्थित इस शंख झिड़ी पहाड़ में एक पत्थर में कई शंख निकलते हैं। पत्थर तोडऩे पर इसमें बंद और खुले दोनों प्रकार के शंख पाए जाते हैं। इस पहाड़ी के बारे में अभी ज्यादा प्रचार-प्रसार नहीं है। कई पत्थरों के अंदर तो बड़े शंख निकलते हैं, लेकिन छोटे पत्थरों में छोटे आकार की शंखियां निकलती हैं। माना जाता है कि ये शैशव अवस्था में ही रह गए और प्रकृति ने अपना रंग बदल लिया।
Published on:
21 Jan 2020 11:18 am

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