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आत्मबोध व स्वयं को जानना ही मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य

आत्मबोध व स्वयं को जानना ही मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य

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आत्मबोध व स्वयं को जानना ही मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य

मंदसौर
गरोठ मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्मबोध स्वयं को जानना ही है। यह बात भानपुरा पीठ के शंकराचार्य दिव्यानंद महाराज ने भागवत कथा के दौरान कही। इस अवसर पर युवाचार्य ज्ञानानंद महाराज ने कहा कि धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष ये चार मुख्य पुरुषार्थ हैं। धर्म का वर्ग, मोर अर्थ का वर्ग, सर्प काम का वर्ग बिलाव और मोक्ष का वर्ग मूषक हैं। जिस प्रकार बिल्ली चूहे को खा जाती हैं इसी प्रकार काम रूपी बिलाव मूषक रूपी मोक्ष को खा जाता हैं। अर्थ रूपी सर्प का धर्मरूपी मोर से सदैव बैर चलता रहता हैं। मोक्ष में पाप व पुण्य का फल नहीं होता। मोक्ष केवल धर्म का फल है। मोक्ष में कोई बंधन नहीं होता हैं। मोक्ष बंधन रहित होता हैं। धर्म को जानने के लिए वेद एवं श्रुति का अध्ययन जरूरी हैं। वेदसम्मत संस्कृति ही धर्म हैं। धर्म के लिए वेद तथा वेद को जानने के लिए ज्ञान जरूरी हैं। अर्थ का उपयोग युक्तिपूर्ण होना चाहिए क्योंकि अर्थ का अनुचित उपयोग चित्त को बिगाड़ देता हैं। महापुरुषों के वाक्य जो व्यक्ति हृदय में धारण कर लेते है उनका विवेक जागृत हो जाता हैं तथा इससे वे परमात्मा को पा जाते है। इस अवसर पर भानपुरा पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य दिव्यानंद तीर्थ ने उपस्थितजन को कहा कि भगवान कहते है कि शास्त्र मेरे द्वारा ही संपादित हैं। शास्त्र रटना नहीं बल्कि हृदयगम्य करना श्रेष्ठ पद्धति है।शास्त्रों को जो हृदय में उतार लेगा वही बुद्धिमान हैं।
भारत के सम्पूर्ण पौराणिक ज्ञान को भागवत गीता में लघुरूप में एकत्र किया गया है इसलिए गीता को गीताशास्त्र कहा गया है। आपने कहा कि संपूर्ण गीता तो ठीक केवल 12 वा अध्याय ही और उसमें भी इस अध्याय के मात्र 8 श्लोकों को ही हृदयगम्य कर ले तो जीवन सफल हो जाएगा। इसमें एक श्लोक में कहा गया है कि प्रत्येक वस्तुए जीव से अपनत्व स्थापित कर ले अद्वैश की स्थिति में आ जाऐ तो भी हम परमेश्वर मिलन मार्ग की ओर अग्रसर होना आरंभ हो जाएंगे।
प्रेम और द्वेष दोनों ही परिस्थिति की परिणीति एक ही है न भूख लगना और न नींद आना। भक्त का सर्वप्रथम लक्षण द्वेष परिस्थिति से विलग होना होता हैं। बाह्य पवित्रता से ज्यादा आवश्यक आंतरिक पवित्रता हैं। अद्वैश का मूल मंत्र गांधी के तीन बंदरों की प्रतिमा में स्थित हैं। जो न देखो नहीं देखना नही सुनो नहीं सुनना नही बोलो नही बोलना। पराधीनता दुख का कारण है सब कुछ आत्मवश में कर लेना ही सुख का कारण है। जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्मबोध हैं। पद प्रतिष्ठा तो मात्र मिथ्या हैं।सांसारिक सुख के लिए जीवन यापन के लिए आवश्यक है लेकिन मानव जीवन का मुख्य लक्ष्य आत्मबोध स्वयं को जानना ही है।
चित्रकार ने बनाई पेंटिंग
नगर के चित्रकार अजय मिश्रा ने शंकराचार्य के आकर्षक चित्र की पेंटिंग बनाई। इसका अनावरण भी जगतगुरु शंकराचार्य द्वारा कर निर्मित चित्र पर हस्ताक्षर किए।
आज भंडारे का आयोजन
कथा विराम के बाद शंकराचार्य व युवाचार्य के सानिध्य में यज्ञ का आयोजन किया गया गुरुवार को भंडारे का आयोजन किया जाएगा।