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VIDEO घूंघट की ओट में भाजपा प्रत्याशी, पार्टी का नाम-पद और चुनाव चिन्ह भी नहीं मालूम

लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानि चुनाव भी महिलाओं को रूढ़िवादी बंधनों से मुक्त नहीं करा पा रहा है।

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मथुरा

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Amit Sharma

Nov 07, 2017

Woman Candidate

मथुरा। प्रसिद्ध कवि गोपालदास नीरज ने लिखा है...राजनीति के खेले समझ सका है कौन, बहरों को भी बंट रहे अब मोबाइल फोन। नीरज का ये दोहा मौजूदा दौर में 'डमी' प्रत्याशियों की हालत पर सटीक बैठता है। हर चुनाव की भांति नगर निकाय चुनाव (Nagar Nikay Chunav 2017) में भी महिलाओं को डमी प्रत्याशियों के तौर पर मैदान में उतारा जा रहा है। सीट आरक्षित होने के चलते भले ही महिलाएं चुनाव मैदान में हैं लेकिन आज वह आज भी घूंघट की ओट में हैं। लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व यानि चुनाव भी महिलाओं को रूढ़िवादी बंधनों से मुक्त नहीं करा पा रहा है। दहलीज लांघ कर बाहर आने के बावजूद समाज की पुरुष प्रधान मानसिकता उन पर हावी है। कागजों में भले ही नाम महिला का है लेकिन समर्थकों के नारे उनके पति, जेठ या परिवार के किसी पुरुष की ही जय जयकार के लग रहे हैं।

घूंघट की ओट से नामांकन

ऐसा ही नजारा मथुरा में देखने को मिला। अधिकतर महिलाएं पर्चा दाखिल करने घूंघट की ओट में पहुंचीं। यहां तक कि उन्हें यह भी नहीं पता कि वह किस पद के लिए चुनाव लड़ रही हैं, कौन सी पार्टी से चुनाव लड़ रही हैं, उनका चुनाव चिन्ह क्या है। नामांकन के दौरान ग्रामीण अंचल की महिलाएं घूंघट की ओट मेंं नामांकन करने पहुंचीं।

नंदगांव नगर पंचायत (Nagar Panchayat Election 2017) के अध्यक्ष पद के लिए आवेदन करने आईं भारतीय जनता पार्टी प्रत्याशी गुलाबो देवी से बात की गई तो वह अपनी पार्टी का नाम तक नहीं बता पाईं। गुलाबो देवी को यह भी नहीं पता कि वह किस पद के लिए चुनाव लड़ रही हैं। गुलाबो देवी से जब पूछा गया कि महिलाओं की क्या समस्याएं हैं आपके क्षेत्र में तो, गुलाबो देवी एक शब्द भी नहीं बोल पाईं। सवाल गुलाबो देवी से हो रहे थे कान में फुसफुसा कर उनके पति जवाब दे रहे थे। गुलाबो देवी के पति जो भी कहते उसी जवाब को वह दोहरातीं, वह भी आधा अधूरा। पति की पूरी बात भी नहीं समझ पा रही थीं।

सिर्फ गुलाबो देवी का ही नहीं यह हाल

ऐसी सिर्फ एक गुलाबो देवी ही नहीं थीं तमाम महिला प्रत्याशियों की हालत थी। हर महिला प्रत्याशी लंबे घूंघट की ओट में रही। उनसे जब सवाल पूछा जाता तो जवाब नहीं दे पा रही थीं कुछ तो हाथ से इशारा कर अपने पति या परिवार के किसी पुरुष से सवाल पूछने का इशारा करतीं। ऐसी स्थिति से साफ है कि महिलाओं को आज भी सिर्फ चुनाव में डमी प्रत्याशी के तौर पर उतारा जा रहा है। चुनाव तो उनके परिवार के पुरुष लड़ते हैं चुनाव जीतने के बाद निर्णय लेते हैं।