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बरसाना में लाठी तो यहां 437 साल से हुरियारों पर बरस रहे हैं कोड़े, ये है बृज का हुरंगा

ब्रज के राजा बलदेव (दाऊजी) के आंगन में हुरंगा की अनूठी परंपरा, गोप वधू सब खेलन आई, गावत गीत सुरंगा, दाऊ में मचियौ हुरंगा

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Holi 2019

Holi 2019

मथुरा। सब जग होरी, या ब्रज होरा और ब्रज के होरा में भी बलदेव का हुरंगा अद्भुत होता है। नंदगांव, बरसाना, श्रीकृष्ण जन्मस्थान की लठामार होली, गोकुल की छड़ी होली और बांकेबिहारी, द्वारिकाधीश, फालेन की आध्यात्मिक होली से होते हुए ब्रज की होली का उल्लास आखिर में बल्देव के दाऊजी मंदिर प्रांगण में हुरंगा के रूप में सिमट जाता है।

‘ऐरी सखी निकसे श्री बलराम, खेलन ब्रज में फाग हो,
गांव वृंद सब नाचत गावत, गलियन उड़त गुलाल हो, खेलन ब्रज में फाग हो...

दाऊ में मचियौ हुरंगा,
गोप वधू सब खेलन आई, गावत गीत सुरंगा, दाऊ में मचियौ हुरंगा...

गोप सखा सब लै पिचकारी, डारत ऊपर रंगा,
खैंच पोतना ब्रज नारी सब, मानत मोद सुरंगारू दाऊ में मचियौ हुरंगा।

ब्रज के राजा बलदेव (दाऊजी) के आंगन में हुरंगा की अनूठी परंपरा ब्रज में मनाए जा रहे होली उत्सव को शिखर का स्पर्श कराती है। अबीर, गुलाल और रंग के बीच यहां हुरियारिनें कपड़ों के कोड़े बनाकर हुरियारों पर तड़ातड़ बरसाती हैं। इस अनूठे प्रेम की परंपरा को देखने के लिए देश और विदेश से श्रद्धालु पहुंचते हैं। भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलदाऊ की नगरी बलदेव में 22 मार्च को हुरंगा का आयोजन किया जायेगा। ब्रज की होली अन्य आयोजन भगवान श्रीकृष्ण और राधा के प्रेम पर केंद्रित हैं तो दाऊजी के हुरंगा का मुख्य आकर्षण हैं। श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलदेव। गोस्वामी श्रीकल्याणदेव जी के वंशज सेवायत पांडेय समाज के स्त्री पुरुष बच्चे ही हुरंगा खेलते हैं।

विदेशी भक्त भी आते हैं
बल्देव नगर पंचायत के चेयरमैन कमल पाण्डेय ने बताया कि हुरंगा का आकर्षण ऐसा है कि विदेशों से आए भक्त इस अद्भुत नजारे को देख आनंदित हो जाते हैं। गोपिकाओं के कोड़ों की मार के लिए लालायित हो उठते हैं। मंदिर प्रांगण में रंगों से सराबोर विदेशी भक्त भी जमकर आनंद लेते हैं। ब्रज के राजा बलदाऊ को हुरंगा से पहले सेवक ताम्र पत्र लगी भांग का भोग लगाते हैं। इसके बाद भांग के प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

1582 से चल रही परंपरा
बलदाऊ की नगरी बलदेव में हुरंगा की परंपरा पांच सौ साल पुरानी है। माना जाता है कि श्री बल्दाऊजी के विग्रह की प्रतिष्ठा स्थापना 1582 में हुई। उनके स्थापत्य काल से बलदाऊ के हुरंगा खेलने की परंपरा पड़ी। 437 साल हो गए हैं।