
Radha krishna
मथुरा। Tourist Guide के रूप में पत्रिका आपको नंदगाँव के आस-पास उन स्थलों के दर्शन कराएगा, जो आम श्रद्धालुओं की नजर से दूर हैं। नंदगांव से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर शांत वातावरण में वन के बीच स्थित महादेव का प्राचीन मंदिर है। इसे आशेश्वर वन के नाम से भी जाना जाता है। नंदगांव स्थित यह प्राचीन मंदिर ब्रज के प्रसिद्ध पंच महादेव मंदिरों में से एक है और यहां दूर-दराज से श्रद्धालु अपनी मनोकामना लेकर आते हैं। यहीं पर आश्वेश्वर कुंड है। दोऊ मिल वन में राधा और कृष्ण मिला करते थे। राधा के आंसुओं से बना प्रेम सरोवर भी दिखाएंगे। वह पवित्र स्थल भी दिखाएंगे, जहां राधा और कृष्ण झूला करते थे। बस बने रहिए हमारे साथ।
आशेश्वर महादेव मंदिर
भगवान श्री कृष्ण और नंद बाबा कंस के अत्याचारों से दुखी हो गए। उन्होंने अपने गुरु से अपने साथ हो रहे अन्याय और अत्याचारों के बारे में अवगत कराया। गुरु गर्गाचार्य ने उन्हें महावन स्थित गोकुल छोड़कर कहीं और जाने को कहा। गुरु की आज्ञा से नंद बाबा कान्हा के साथ-साथ गोकुल वासियों को लेकर नंदीश्वर पर्वत चले गए। यहां नंद बाबा ने नंदगांव बसाया। मान्यता के अनुसार आशेश्वर महादेव भगवान श्री कृष्ण के दर्शन करना चाहते थे। माता यशोदा ने उनके रूप को देखकर कान्हा को दिखाने से मना कर दिया। भगवान शंकर दर्शन की आस में नंदगांव से करीब डेढ़ किलोमीटर आगे शांत जगह पर चले गए। वहीं मंदिर बना हुआ है।
ये है कहानी
मंदिर के समीप एक कुंड है, इस कुंड को आशेश्वर कुंड कहा जाता है। शास्त्रों के अनुसार भगवान शंकर नंदगांव में अपने इष्ट भगवान श्रीकृष्ण के बालस्वरूप के दर्शन करने के लिए द्वापर काल में यहां आए थे। उस वक्त उनकी विचित्र वेशभूषा, सांप और बिच्छू आदि को देखकर माता यशोदा स्वयं भयभीत हो गईं और उन्होंने भगवान शंकर को अपने नन्हें कान्हा के दर्शन नहीं करने दिए। दर्शन की आशा लेकर भगवान शिव नन्दगॉव के जंगल के वन में स्थित कुंड के तट पर समाधि लगाकर बैठ गए। तब भगवान कृष्ण ने लीला रची और इसी स्थान पर महादेव को अपने बालस्वरूप के दर्शन कराए। भगवान भोलेनाथ इस स्थान पर अपने प्रभु के दर्शन की आशा लेकर विराजे थे, इसीलिए इस स्थान को आशेश्वर महादेव कहा जाता है।
मनोकामना होती है पूरी
महंत जयराम दास ने बताया कि इस वन में समाधि लगाने से स्वयं भगवान की आशा पूर्ण हुई तभी से भगवान शंकर यहां आशेश्वर महादेव के नाम से विराजमान हो गए। तब से इस वन और कुंड को भी आशेश्वर वन व आशेश्वर कुंड नाम से जाना जाता है । लोक मान्यता के अनुसार जो भक्त अपनी मनोकामनाएं लेकर इस मंदिर में आता है और भगवान आशेश्वर महादेव की श्रद्धा के साथ पूजा अर्चना करता है, उसकी सभी आशाएं भगवान भोलेनाथ पूर्ण करते हैं। तभी तो यहां वर्ष भर लाखों श्रद्धालु अपनी-अपनी मनोकामनाएं लेकर यहां आते हैं और भगवान शिव उनके सभी मनोरथ पूर्ण करते हैं ।
दोऊ मिल वन में मिलते थे कान्हा और राधा
आशेश्वर महादेव मंदिर से नंद गांव की तरफ लौट कर वापस चल दिए। नंदगांव आने के बाद बरसाने की तरफ करीब 5 किलोमीटर चलने के बाद बाएं हाथ पर एक कच्चा रास्ता जाता है ‘दोऊ मिल वन’ के लिए। पुजारी राजनदास त्यागी बाबा ने बताया कि इस वन की मान्यता यह है कि भगवान श्री कृष्ण और राधा का पहला मिलन इसी वन में हुआ था। कहा यह भी जाता है कि भगवान श्री कृष्ण नंदगांव से चल कर और राधा रानी बरसाने से चलकर ऐसी जगह आकर अकेले मिलते थे। तब से लेकर आज तक इसे दोउ मिल वन के नाम से जाना जाता है। यहां होकर ब्रज चौरासी कोस का पड़ाव स्थल भी इस वन को माना गया है।
राधा के आंसुओं से बना प्रेम सरोवर
दोउ मिल वन से करीब 100 मीटर की दूरी पर स्थित है प्रेम सरोवर। यह सरोवर भगवान कृष्ण और राधा की प्रथम मिलन स्थली भी माना गया है। कहा जाता है कि इस सरोवर के पास बैठकर राधा और कृष्ण बातें किया करते थे। यह सरोवर राधा के आंसुओं से बना है। क्योंकि जब राधा कृष्ण से मिलकर वापस बरसाना जाती थी तो वह कृष्ण को छोड़कर नहीं जाना चाहती थी और इसी वियोग में राधा के आंसू निकलते थे।
संकेत वन में झूला
नंदगांव से तकरीबन 10 किलोमीटर आगे चलकर बरसाना की तरफ चलें तो संकेत वन का मार्ग है। यहां हमने राधा और कृष्ण की विवाह वेदी पत्थर की शिला पर अंकित है। संकेत वन के पुजारी कोमल दास ने पाषाण काल के झूला और विवाहवेदी शिला की जानकारी देते हुए बताया कि यह वह झूला है, जहां भगवान श्री कृष्ण और राधा आकर झूला करते थे। आज भी ऐसा कहा जाता है कि राधा और कृष्ण के यहां आने का आभास लोगों को होता है। इसी झूले पर राधा और कृष्ण झूलते हैं। जब भगवान कृष्ण और राधा का विवाह हुआ था तो ब्रह्मा के द्वारा इस विवाहवेदी शिला पर उनके विवाह का वर्णन किया है। इसी प्रांगण में रास स्थल भी मौजूद है, जहां राधा और कृष्ण गोपियों के साथ रास किया करते थे।
Updated on:
08 Sept 2019 12:09 pm
Published on:
08 Sept 2019 10:00 am

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