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INDEPENDENCE DAY: आजाद भारत का पहला शहीद जिस पर पाकिस्तान ने रखा था 50 हजार का ईनाम

नौशेरा में पाकिस्तान को धूल चटाई थी आजाद भारत के इस पहले शहीद ने। पाक फौजों के लिये कहर बनकर टूटे थे ब्रेगेडियर। पाकिस्तान जाने से कर दिया था साफ इनकार।

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Varanasi Uttar Pradesh

Aug 13, 2016

Brigadier Usman

Brigadier Usman

मऊ. हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है, बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा। वाकई में दीदावर बड़ी मुश्किल से ही पैदा होते हैं। मऊ जिले के बीबीपुर गांव में भी एक ऐसा ही भारत मां का लाल पैदा हुआ, जिसने न सिर्फ पाकिस्तान जाने से मना कर दिया, बल्कि जब पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपनी तोपों के मुहाने खोल दिये तो भारत मां की रक्षा के लिये सबसे पहले अपनी जान की कुर्बानी देकर उनसे लोहा लिया। इतिहास उन्हें आजाद भारत के सबसे पहले शहीद और नौशेरा के शेर ब्रेगेडियर उस्मान के नाम से जानता है। मऊ जिले की खुशनसीबी है कि ब्रेगेडियर उस्मान जैसा देशभक्त जिले में पैदा हुआ। पर आज उन्हें जैसे भुला दिया गया है। जनप्रतिनिधियों और शासन-प्रशासन ने इस अमर शहीद की जन्मभूमि को उपेक्षित छोड़ दिया है। इससे देशभक्तों में कसक है।



1947 में भारत की आजादी के बाद 148 में पाकिस्तान ने दुस्साहस किया और भारत से युद्ध लड़ा। इस युद्ध में भारत की सेनाओं ने पाकिस्तान को मुंहतोड़ जवाब दिया। यही वो जंग थी जिसमें ब्रेगेडियर उस्मान ने भारत मां की रक्षा के लिये अपनी जान न्योछावर कर दी। आजाद भारत के बाद शहीद होने वाले वह पहले भारतीय थे। ब्रिगेडियर उस्मान ने भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान पाकिस्तानी फौज के दांत खट्टे करते हुए वीरगती को प्राप्त किया। तीन जुलाई 1948 को नौशेरा में पाकिस्तानी फौजो से लोहा लेते हुए वह शहीद हुए और तभी से उन्हें नौशेरा का शेर कहा जाता है।




ब्रिगेडियर उस्मान का जन्म बीबीपुर गांव में 1913 में मुहम्मद फारुख के घर हुआ था। उस समय इस परिवार की गिनती इलाके के बडे जमींदार घरानों में होती थी। जमीदारी का रौब और शानो-शौकत में परवरिश के बाबजूद भी उस्मान के सीने में एक देशभक्त का दिल धड़कता था। इनके पिता फारुख बडी कोतवाली वाराणासी जनपद मे कोतवाल हुआ करते थे। उनके शौर्य और वीरता का प्रदर्शन देखते हुए उस समय के अंग्रेज लेफ्टिनेन्ट ने उन्हे खान बहादूर के खिताब से नवाजा। मुहम्मद फारुख के तीन बेटे थे जिसमें सबसे बडा बेटा मुहम्मद सुभान टाइन आफ इन्डिया के उप सम्पादक बने। छोटे भाई मुहम्मद गुफरान ने सेना में जाकर ब्रिगेडियर के ओहदे तक पहूंचे, दूसरे नम्बर पर ब्रेगेडियर उस्मान थे, जिन्हें देश आज भी सलाम करता है।




गांव के रहने वाले जफर आलम बताते है कि ब्रिगेडियर उस्मान तीन भाई थे। बड़े भाई टाइम्स ऑफ इन्डिया में उपसम्पादक थे। दूसरे नम्बर पर ब्रिगेडियर उस्मान और तीसरे नम्बर पर ब्रिगेडियर गुफरान थे, इनका और इनके बडे भाई का विवाह नही हुआ था। तिसरे नम्बर के भाई का विवाह हुआ था। उनकी दो सन्ताने थीं, जो अब कनाडा में रहते हैं और वहां की नागरिकता हासिल कर चुके हैं। इसके अलावा जब ब्रिगेडियर गुफरान रिटायर हुए तो वो गांव में ही आकर रहने लगे। बताते हैं कि गाव में इनके घर को लोग कोतवाली के नाम से जानते है, इनके पिता फारुक वाराणासी में कोतवाली में थे और वहां ज्ञानव्यापी मस्जिद का उस समय का सबसे बड़ा विवाद हल कराकर हिन्दु-मुस्लिम एकता का नमूना पेश किया।




पाकिस्तान जाना मंजूर नहीं था ब्रेगेडियर उस्मान को
1947 को जब आजादी मिली तो देश मजहब के आधार पर बंट चुका था। विभाजन के समय ब्रेगेडियर उस्मान सैन्य अधिकारी थे। उस समय सैन्य अधिकारियों के लिये छूट थी कि वह पाकिस्तानी सेना में जाना चाहते हैं या फिर हिन्दुस्तान के साथ रहना चाहते हैं। पाकिस्तान तमाम सैन्य अधिकारियों को बड़े ओहदे का लालच दिखाकर अपनी सेना में शामिल किये जा रहा था। पर ब्रेगेडियर उस्मान को अपने वतन की मिट्टी छोड़कर पाकिस्तान जाना मंजूर नहीं था। उन्होंने पाकिस्तान की पेशकश को ठुकरा दिया। इसके बाद तो पाकिस्तान परस्त उन पर पिल पड़े। उन्हें काफिर कहते हुए उन पर 50 हजार का ईनामक भी घोषित कर दिया। बड़ी बात यह कि उनके इनकार के बाद ही मुस्लिम सैन्य अधिकारियों का पाकिस्तान जाने का सिलसिला रूक गया। ढाई सौ सैन्य अधिकारी भारतीय सेना में बने रहे और समय आने पर अपनी देश भक्ति का परिचय दिया।




नौशेरा पहाड़ी से दुम दबाकर भागी थी पाकिस्तानी फौज
पाकिस्तानी फौजों ने कबायली वेश धरा और भारतीय सैन्य चैकियों पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया। तकरीबन डेढ़ लाख की तादात में कबायली रूप धरे पाकिस्तानी सेना के जवान नियनत्रण रेखा संगड को पार करते हुए नौशेरा पहाडी तक आ पहूंचे। उस समय नौशेरा पहाड़ी का सुरक्षा जिम्मा राजपूत रेजिमेन्ट का था, लेकिन अतिसंवेदनशीलता देखते हुए पैराब्रिगेड के सैनिको ने ब्रिगेडियर उस्मान के नेतृत्व में राजपूत रेजिमेन्ट के सहयोग से अपने अदम्य साहस व वीरता का परिचय देते हुए कबायलियो के रूप में आए पाक सैनिकों को नौशेरा पहाडी से खदेड दिया। भारतीय सेना ने झंगड व नौशेरा पर कब्जा तो कर लिया, पर पाकिस्तानी सेना द्वारा विछायी गयी बारुदी सुरंगों में बिस्फोट व गोलाबारी में अपने वीर सेनानायक ब्रेगेडियर उस्मान को न बचा सकी। तीन जुलाई 1948 का वह दिन भारतीय सेना के लिए काला दिन साबित हुआ जिसमें अपने अदम्य साहस और पराक्रम से अपनी मातृभूमि को दुश्मनों से निजात दिलाने वाले ब्रिगेडियर उस्मान को खो दिया। ब्रिगेडियर के इस अदम्य साहस के लिए नौशेरा का शेर के शेर के खिताब से नवाजा गया। शहादत के पश्चात भारतीय सेना द्वारा इस वीर सपूत को महावीर चक्र मरणोपरान्त से सम्मानित किया गया..और यह शेर पूरे वातावरण मे गूंज गया कि खुश रहो अहले वतन, अब हम तो सफर करते है।

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