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चतुर्दशी पर कर रहे पितरों का श्राद्ध तो पहले जान ले ये बात, श्राद्ध तर्पण के दौरान बरते सावधानी

Chaturdashi Shradh 2023: चतुर्दशी पर पितरों का श्राद्ध नहीं करना चाहिए। ऐसा ज्योतिषाचार्यों का कहना है। चतुर्दशी पर अपमृत्यु को प्राप्त हुए पितरों का श्राद्ध करने का विधान है। इसमें भी बहुत सावधानी बरतनी चाहिए।

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मेरठ

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Kamta Tripathi

Oct 11, 2023

Chaturdashi Shradh 2023

अनामिका ऊँगली में सोने की अंगूठी पहन कर तर्पण करने से करोड़ गुना अधिक फल प्राप्त होता है।

Chaturdashi Shradh 2023: पंडित भारत ज्ञान भूषण के अनुसार महाभारत इत्यादि ग्रंथों में जिनकी मृत्यु शस्त्र से न होकर स्वाभाविक रूप से चतुर्दशी को हुई हो उनका श्राद्ध दूसरे दिन अमावस्या को करना चाहिए। चतुर्दशी का श्राद्ध ऐसे पितरों के लिए आरक्षित है जो किसी शस्त्र या विष दुर्घटना आदि से अपमृत्यु को प्राप्त हुए हों। ऐसे पितरों की किसी भी तिथि में मृत्यु हुई हो। उनका श्राद्ध केवल चतुर्दशी को किए जाने पर पितृ तृप्ति पाते हैं अन्य तिथि में नहीं। उन्होंने बताया कि अगर चतुर्दशी को सामान्य पितरों का श्राद्ध किया जाता है तो आगे के वंश संतति के लिए बाधक रूप में अत्यंत बुरा प्रभाव देने के योग बनता है।

श्राद्ध तर्पण में क्या करें क्या न करें
क्या करें- पितरों के लिए तर्पण प्रातः करें तथा श्राद्ध भोजन दोपहर 2 बजे से 4 बजे के मध्य “कुतुप” समय में संपन्न कर लेने से तथा कुश, तिल अनिवार्य रूप से प्रयोग कर लेने से पितरों के लिए दिया दान अक्षय फलदायी हो जाता है।
पितरों के भोजन में जौ, धान, तिल, गेहूं, मूंग, संवा, सरसों का तेल तथा आम, बेल, अनार, पुराना आंवला, नारंगी, नारियल, खजूर, परवल, मटर, कचनार, बेर और इंद्र जौ व दूध चावल की चिरोंजी डाल कर खीर पितरों को पूर्ण ग्रहण होती है।

काले तिल की मात्रा अधिक से अधिक प्रयोग हो
काले तिल की मात्रा अधिक से अधिक प्रयोग हो पर सफ़ेद तिल का तर्पण व्यर्थ होता है, चांदी व ताम्बे के पात्र पितरों को तारने वाले पात्र कहलाते हैं। जबकि लोहे व स्टील व मिट्टी के पात्र पितरों के लिए निषेध हैं। श्राद्ध भोजन गरम अन्न का घर की दक्षिण दिशा में शांत अवस्था में कराया जाना पितरों को तृप्त करता है। पीरों को उपहार में वस्त्र देना अनिवार्य, किन्तु ऊनी वस्त्र वर्जित है।

तर्जनी ऊँगली में चांदी की अंगूठी पहन कर तर्पण करने से लाख गुना अधिक फल

पंडित भारत ज्ञान भूषण के अनुसार पद्म पुराण में बताया गया है कि श्राद्ध और हवन के समय एक हाथ से पिंड व आहुति दें व तर्पण में दोनों हाथों से जल देना चाहिए। तर्जनी ऊँगली में चांदी की अंगूठी पहन कर तर्पण करने से लाख गुना अधिक फल तथा अनामिका ऊँगली में सोने की अंगूठी पहन कर तर्पण करने से करोड़ गुना अधिक फल प्राप्त होता है।
सभी पितरों का श्राद्ध एवम पितृ विसर्जन पित्री अमावस्या को अवश्य कर लेना चाहिए। श्राद्ध भोजन के लिए एक ब्राह्मण पर्याप्त रहता है अथवा 3 ब्राह्मण उचित रहते हैं। ब्रह्म ज्ञान में लगा योगी श्राद्ध के लिए सुपात्र होता है किन्तु गेरुए वस्त्र धारी सन्यासी नहीं।

क्या न करें - शाम के समय और रात्रि में श्राद्ध पितरों को प्राप्त न होकर आसुरी शक्तियों को होता हैं यदि घर व नगर से बाहर हों तो किसी दूसरे की निजी भूमि पर श्राद्ध नही कराएं, सार्वजनिक स्थल पर ही कराएं।

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पितरों के लिए निषेध भोजन
शास्त्र के अनुसार पितरों के लिए जो भोजना निषेध माना गया है उनमें राजमा, मसूर, अरहर, गाजर, चना, भेलिया, गोल लौकी, बैंगन, शलजम, सिंघाड़ा, प्याज, लहसुन, मांसाहार, हींग, काला नमक, काला जीरा और सुपारी है।