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देहात से निकलने वाला धुंआ इस शहर के लोगों की सेहत बिगाड़ने पर तुला, एक रिपोर्ट में खुलासा

महानगर की हवा हुर्इ जहरीली, हवा में पीएम का मानक हुआ कई गुना ज्यादा

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मेरठ। गांव-देहात की आबोहवा को काफी अच्छा बताया जाता है लेकिन इन दिनों देहात की तरफ से आती हवा मेरठ महानगरवासियों की सेहत बिगाड़ रही है। गांव में चल रहे कोल्हू और क्रेशर से निकलने वाला काला धुंआ ग्रामीणों के साथ-साथ महानगरवासियों को भी बीमारी परोस रहा है। रही-सही कसर सड़कों पर दौड़ रहे प्रदूषित वाहनों ने पूरी कर दी। जिस कारण महानगर की सांस जहरीली हो गई है।

मानकों से कई गुना पीपीएम

स्वास्थ्य को सीधे नुकसान पहुंचाने वाले पीपीएम (पार्टिकुलेट मेटर) महानगर की हवा में मानकों से कई गुना ज्यादा रिकार्ड किए गए हैं, यानि हर सांस के साथ ये जहरीले और हानिकारक कण लोगों के फेफड़ों तक पहुंच रहे हैं।

मानकों पर खरी नहीं हवा

मेरठ की हवा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और नेशनल एम्बिएंट एयर क्वालिटी स्टैंडर्ड्स (एनएएक्यूएस) के मानकों के हिसाब से खरी नहीं उतर रही। यह चौंकाने वाले आंकड़े ग्रीनपीस की हाल में जारी रिपोर्ट के हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर कार्य करने वाले ग्रीनपीस ने देशभर के 280 शहरों में हवा की गुणवत्ता की जांच करते हुए इसे डब्ल्यूएचओ और एनएएक्यूएस के स्तर पर जांचा था। देशभर में सर्वाधिक प्रदूषित 30 शहरों में मेरठ भी शामिल है। रिपोर्ट से यही निष्कर्ष निकलता है कि जो हवा हम लोग सांस के रूप में ले रहे हैं वह जहरीली है और सांस लेने लायक नहीं बची है।

पीपीएम पहुंचा 10 के स्तर पर

रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2017 दिसंबर में मेरठ में पीपीएम 10 का स्तर 157 माइक्रोग्राम/घनमीटर रिकार्ड किया गया। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानकों के हिसाब से प्रति घनमीटर पीएम 10 का स्तर 20 होना चाहिए जबकि एनएएक्यूएस के मानकों पर यह स्तर 60 होना चाहिए। यानी मेरठ में पीएम 10 का स्तर मानकों से आठ एवं ढाई गुना ज्यादा है। यानी जितने कण सांस के जरिए हमारे फेफड़ों में पहुंचने चाहिए उससे आठ गुना ये हमारे शरीर में जा रहे हैं।

यह है पीएम 10

पीएम 10 का मतलब है ऐसे पार्टिकुलेट मेटर जिनका आकार 10 माइक्रोमीटर या इससे छोटा होता है। ये कण सांस के जरिए सीधे फेफड़ों में प्रवेश करते हैं। मेडिकल माइक्रोबायलाॅजी विभाग के डा. अमित ने बताया कि एक महीने से सांस के रोगियों की संख्या में इजाफा हुआ है। लोगों में सास लेने में तकलीफ और फेफड़े में संक्रमण के अलावा गले के संक्रमण की शिकायत अधिक बढ़ी है। इसका सीधा संबंध प्रदूषण से होता है।