30 जनवरी 2026,

शुक्रवार

Patrika Logo
Switch to English
home_icon

मेरी खबर

video_icon

शॉर्ट्स

epaper_icon

ई-पेपर

Special: इस विश्वप्रसिद्ध चर्च की खासियत जान हो जाएंगे हैरान, 25 पैसे की मजदूरी देकर कराया था निर्माण

  Highlights: -हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच स्थित सरधना का विश्व प्रसिद्ध चर्च -चर्च बनाने वाले मिस्त्री को मिलती थी 25 पैसे मजदूरी, 4 लाख रुपये आई थी लागत -माता मरियम की चमत्कारी तस्वीर के सामने शीश नवाने आते है विदेश से श्रद्धालु

3 min read
Google source verification

मेरठ

image

Rahul Chauhan

Dec 24, 2020

church-of-sardhana.jpg

केपी त्रिपाठी

मेरठ। मेरठ में सरधना का चर्च जो कि विश्व प्रसिद्ध है। हिंदू और मुस्लिम आबादी के बीच स्थित ये चर्च आज भी देश की एकता-अखंडता और मजहबी भाईचारे का प्रतीक बना हुआ है। देश के बंटवारे के बाद हुए दंगे हो या फिर सांप्रदायिक बवाल। कृपाओं की माता मरियम का यह चर्च सभी से अछूता रहा। इस चर्च में ईसाई लोगों के अलावा हिंदू और मुस्लिम भी अपनी मन्नत पूरी करने के लिए माता मरियम के सामने शीश नवाते हैं। बात इस चर्च के इतिहास की करें तो इसको बेगम समरू द्वारा बनवाया गया था। उसके बाद से सरधना के इस चर्च का नाम विश्व के बड़े ईसाई इबादतगाहों में शामिल हो गया। इस चर्च में कृपाओं की माता की मरियम की चमत्कारिक मूर्ति मौजूद है।

यह भी पढ़ें: Noida के पुराने फर्नीचर की मार्केट में लगी भीषण आग, फायर ब्रिगेड की एक दर्जन गाड़ी मौके पर

इस चर्च को कैथोलिक माइनर बसिलिका का दर्जा प्राप्त है। यह दर्जा देश के मात्र 19 चुनिंदा गिरजाघरों को ही प्राप्त है। उनमें से सरधना का चर्च भी शामिल है। विश्व में कुल 948 गिरजाघरों को कैथोलिक माइनर बसिलिका का दर्जा प्राप्त है। वैसे तो वर्ष भर चर्च में श्रद्धालुओं का आवागमन लगा रहता है। लेकिन साल में नवंबर माह के दूसरे शनिवार व रविवार को कृपाओं की माता महोत्सव में देश, विदेश से आए लाखों श्रद्धालु माता मरियम की चमत्कारी मूर्ति के सामने शीश नवाकर मन्नत मांगते हैं।

रेनार्ड समरू की हुई फरजाना तो बन गई बेगम समरू

इतिहासकार डा. विध्नेश त्यागी के अनुसार बागपत के कोताना गांव के किसान लतीफ खां के परिवार में जन्मी फरजाना बेगम भाइयों के जुल्म से परेशान होकर मां के साथ दिल्ली चली गई। फरजाना ने दिल्ली में जाकर वहां नृत्य को अपना पेशा बनाया। इसी दौरान उनकी मुलाकात सरधना रियासत के हुक्मरान वाल्टर रेंनार्ड समरू से हुई। रेंनार्ड समरू और फरजाना की आंख चार हुई और दोनों एक-दूसरे के हो गए। फरजाना नाचने वाली से बेगम समरू बन गई। वाल्टर रेंनार्ड समरू की मृत्यु के बाद बेगम समरू ने कैथोलिक ईसाई धर्म अपना लिया। उन्होंने 1809 में चर्च का निर्माण शुरू कराया। चर्च तैयार होने में करीब 11 वर्ष लगे और लागत चार लाख आई।

यह भी पढ़ें: अंग्रेजों के जमाने में बनाए गए इस पार्क आज भी प्रवेश नहीं कर सकते पुरुष, जानिये क्यों-

उन्होंने बताया कि माता मरियम का तीर्थ स्थान बनाने की तैयारियां शुरू हुई। जिसके लिए रोम स्थित मौन्टेनेरो पर माता मरियम के तीर्थ स्थान से तस्वीर की हूबहू नकल कराई गई। माता मरियम की तस्वीर को संत पोप ने सजदा करके बरकत दी। उत्तर भारत में माता मरियम का तीर्थस्थान शुरू करने की स्वीकृति प्रदान की। माता मरियम की पवित्र तस्वीर को जुलूस के रूप में 1917 में सरधना लाकर चर्च में स्थापित किया गया। 1961 में सरधना चर्च को राजकीय बसीलिका का दर्जा मिल गया। तब से सरधना चर्च कैथोलिक ईसाई समाज के लिए तीर्थस्थान बन गया।

आकर्षण का केंद्र संगमरमर का स्मारक

चर्च में संगमरमर से बना स्मारक पर्यटकों के लिए आकर्षण का मुख्य केंद्र है। जिसे बेगम के वंशज डेविड डाइस समरू ने बनवाया। पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए प्रवेश द्वार से चर्च के गेट तक क्ब् सुंदर स्मारक बनाए गए हैं। जिसमें प्रभु येसु को क्रूस पर लटकाए जाने की घटना को प्रतिमाओं के माध्यम से दर्शाया गया है। सरधना स्थित बेगम समरू के चर्च की इमारत बेहद ही खूबसूरत बनायी गई है।

यह भी देखें: कांग्रेस कार्यकर्ताओ ने अनोखे ढंग से किया प्रदर्शन

ये हैं चर्च की खूबी

चर्च की दीवारों पर सुंदर नक्काशी की गई है। चर्च के बराबर में ही बेगम समरू का महल बना है जिसमें वह रहती थीं। इस महल में भी नक्काशी और कारीगरी का बेजोड़ नमूना पेश किया गया है। चर्च में लगी जीसस की मूर्ति श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती हैं। बेगम समरू ने इस चर्च का निर्माण कराते हुए कभी नहीं सोचा होगा कि एक दिन उनका बनाया यह चर्च एक तीर्थ स्थान के रूप में विख्यात होगा। सरधना चर्च के बारे में मौजूद दस्तावेजों के अनुसार इस चर्च के निर्माण का कार्य वर्ष1809 में शुरू हुआ। इसके खास दरवाजे पर इस इमारत के बनने का साल 1822 दशार्या गया है। जबकि कुछ अभिलेखों में इसके निर्माण का वर्ष 1820 बताया गया है। उस वक्त सबसे ऊंची मजदूरी करने वाले मिस्त्री को 25 पैसे दिए जाते थे। इस चर्च के निर्माण करने वाले मिस्त्री को भी 25 पैसे मजदूरी दी जाती थी। जबकि अन्य मजदूरों का हिसाब कौडियों से किया जाता था।

Story Loader