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2005 – सूचना का अधिकार कानून हुआ लागू

सूचना का अधिकार अधिनियम भारत के संसद द्वारा पारित एक कानून है जो 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ था

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जयपुर

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Sunil Sharma

Aug 14, 2017

2005 suchna ka adhikar

2005 suchna ka adhikar

सूचना का अधिकार अधिनियम भारत के संसद द्वारा पारित एक कानून है जो 12 अक्टूबर 2005 को लागू हुआ था। इस नियम के द्वारा भारत के सभी नागरिकों को सरकारी रिकॉर्ड और प्रपत्रों में दर्ज सूचना को देखने और उसे प्राप्त करने का अधिकार प्रदान किया गया है। यह जम्मू एवं काश्मीर सूचना का अधिकार अधिनियम 2012 के अन्तर्गत लागू है। सूचना का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 (1) के तहत मौलिक अधिकारों का हिस्सा है।

अनुच्छेद 19 (1) कहता है कि प्रत्येक व्यक्ति को बोलने और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इस कानून के तहत भारत के नागरिकों को केंद्र और राज्य सरकार के रिकॉर्ड से संबंधित सूचना हासिल करने का अधिकार प्रदान करता है। सूचना का अधिकार 2005 प्रत्येक नागरिक को ये अधिकार प्रदान करता हैसरकार से कुछ भी पूछे या कोई भी सूचना मांगे। किसी भी सरकारी निर्णय की प्रति ले सकता है।

किसी भी सरकारी दस्तावेज का निरीक्षण कर सकता है। किसी भी सरकारी कार्य का निरीक्षण कर सकता है।केंद्रीय आरटीआइ कानून के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को छोडक़र संपूर्ण भारत को कवर किया गया है। सभी संगठन, जो संविधान या किसी कानून या किसी सरकारी अधिसूचना के तहत गठित हुए हैं। या फिर वे सभी संगठन, जिसमें एनजीओ भी शामिल हैं, जोकि सरकार द्वारा संचालित, नियंत्रित या आर्थिक सहायता प्राप्त हैं।

वे सभी निजी संगठन जो सरकार द्वारा संचालित, नियंत्रित या आर्थिक सहायता प्राप्त हैं, प्रत्यक्ष रूप से इसके तहत आते हैं। अन्य अप्रत्यक्ष रूप से। जो भारत की प्रभुता, अखण्डता, सुरक्षा, वैज्ञानिक या आर्थिक हितों व विदेशी संबंधों के लिए घातक हो। जिससे आपराधिक जांच पड़ताल, अपराधियों की गिरफ्तारी या उन पर मुकदमा चलाने में रुकावट पैदा हो। जिससे किसी व्यक्ति के जीवन या शारीरिक सुरक्षा खतरे में पड़े। जिससे किसी व्यक्ति के निजी जिन्दगी में दखल-अंदाजी हो और उसका जनहित से कोई लेना देना ना हो। ऐसे सूचनाएं आरटीआई के तहत प्रदान नहीं की जाएंगी।

संविधान के अनुच्छेद 19(1) के तहत सूचना का अधिकार मौलिक अधिकारों का एक भाग है. अनुच्छेद 19(1) के अनुसार प्रत्येक नागरिक को बोलने व अभिव्यक्ति का अधिकार है। 1976 में सर्वोच्च न्यायालय ने राज नारायण बनाम उत्तर प्रदेश सरकार मामले में कहा है कि लोग कह और अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि वो न जानें। इसी कारण सूचना का अधिकार अनुच्छेद 19 में हिस्सा है। इसी मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने आगे कहा कि भारत एक लोकतंत्र है, लोग मालिक हैं, इसलिए लोगों को यह जानने का अधिकार है कि सरकारें जो उनकी सेवा के लिए हैं, क्या कर रहीं हैं?

प्रत्येक नागरिक कर/टैक्स देता है, यहां तक कि एक गली में भीख मांगने वाला भिखारी भी टैक्स देता है जब वो बाजार से साबुन खरीदता है। (बिक्री कर, उत्पाद शुल्क आदि के रूप में) नागरिकों के पास इस प्रकार यह जानने का अधिकार है कि उनका धन किस प्रकार खर्च हो रहा है। इन तीन सिद्धांतों को सर्वोच्च न्यायालय ने रखा कि सूचना का अधिकार हमारे मौलिक अधिकारों का एक हिस्सा हैं। यदि आरटीआई एक मौलिक अधिकार है, तो हमें यह अधिकार देने के लिए एक कानून की आवश्यकता क्यों है?

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