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आयरन डोम से भी आगे: भारत बना रहा 3-लेयर आसमानी कवच

ईरान- इजरायल- अमरीका युद्ध में मिसाइलों के प्रयोग और इजरायल के बहुचर्चित आयरन डोम की स्थिति देख भारतीय रक्षा क्षेत्र में अपना स्वयं का आयरन डोम विकसित करने में तेजी से काम किया जाने लगा है। ऑपरेशन सिंदूर में रूसी एस-400 की सफलता के बाद अब प्रोजेक्ट कुशा के जरिए स्वदेशी मल्टी-लेयर एयर डिफेंस स्ट्रैटेजी विकसित की जा रही है।

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नई दिल्ली। ईरान- इजरायल- अमरीका युद्ध में मिसाइलों के प्रयोग और इजरायल के बहुचर्चित आयरन डोम की स्थिति देख भारतीय रक्षा क्षेत्र में अपना स्वयं का आयरन डोम विकसित करने में तेजी से काम किया जाने लगा है। ऑपरेशन सिंदूर में रूसी एस-400 की सफलता के बाद अब प्रोजेक्ट कुशा के जरिए स्वदेशी मल्टी-लेयर एयर डिफेंस स्ट्रैटेजी विकसित की जा रही है। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर से घोषित मिशन सुदर्शन चक्र का अहम हिस्सा है। कुशा से किसी भी हवाई हमले को हवा में ही विफल किया जा सकेगा। यह वायु सुरक्षा प्रणाली कम, मध्‍यम और लंबी दूरी तक के हवाई हमलों को इंटरसेप्‍ट कर उसे आसमान में ही तबाह कर सकता है।

प्रोजेक्ट कुशा (एक्सटेंडेड रेंज एयर डिफेंस सिस्टम – ईआरएडीएस) निर्णायक चरण में पहुंच गया है। भारतीय वायु सेना द्वारा 5 स्क्वाड्रन की खरीद को मंजूरी दिए जाने के बाद इस महत्वाकांक्षी परियोजना ने विकास से आगे बढ़कर परीक्षण और शुरुआती उत्पादन के चरण में प्रवेश कर लिया है। हाल ही इसका परीक्षण का पहला चरण पूरा हुआ है। अब यह प्रोजेक्ट इंटीग्रेटेड फ्लाइट टेस्ट की ओर बढ़ रहा है। जो इसी वर्ष हो सकता है। डीआरडीओ ने इसे विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड भी शामिल है।

मल्टी लेयर प्रोजेक्ट है कुशा

प्रोजेक्ट कुशा के तहत तीन विशेष इंटरसेप्टर मिसाइलें विकसित की जा रही हैं, जिन्हें एम1, एम2 और एम3 नाम दिया गया है। ये तीनों मिलकर एक 'लेयर्ड एयर डिफेंस शील्ड' बनाएंगी। एम1 की रेंज 150 किमी, एम 2 की रेंज 250 किमी और एम 3 की रेंज 350–400 किमी है। इसकी स्पीड माक 5.5 है और यह मल्टी-टार्गेट ट्रैकिंग और इंटरसेप्शन में सक्षम है। यह एईएसए रडार और नेटवर्क-सेंट्रिक वॉरफेयर के साथ आईएसीसीएस (इंटीग्रेटेड एयर कमांड एवं कंट्रोल सिस्टम से जुड़ा है। यह फाइटर जेट, ड्रोन स्वॉर्म, क्रूज मिसाइल और अवाक्स व हाई वैल्यू एसेट्स को निशाना बना सकता है।

कुशा की लागत आधी

ऑपरेशन सिंदूर में रूसी एस 400 ने भारत एयर डिफेंस में जबरदस्त भूमिका निभाई थी। भारत और रूस के बीच इसकी पांच स्क्वाड्रन के लिए लगभग 5.43 बिलियन डॉलर अर्थात 45 हजार करोड़ रूपए से ज्यादा की डील हुई है। वहीं प्रोजेक्ट कुशा की पांच स्क्वाड्रन के लिए लगभग 21700 करोड़ रूपए खर्च होंगे जो कि एस-400 से लगभग आधी कीमत है। और यह लगभग उतनी ही क्षमता से एयरडिफेंस में सक्षम है। स्वदेशी होने के मेंटेनेंस और अपग्रेड लागत भी कम होगी। आकाश और अब कुशा के बाद भारत अब सिर्फ एयर डिफेंस खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि एयर डिफेंस डिजाइन और निर्माण करने वाली शक्ति बन कर उभर रहा है।

चीन और पाकिस्तान से मुकाबला

चीन के एयर डिफेंस सिस्टम में एचक्यू-9 जिसकी रेंज 200-300 किमी है। इसके साथ ही एचक्यू 22 और एचक्यू19 जैसे मल्टी लेयर सिस्टम भी हैं। यह चीन के लिए इंटीग्रेटेड एयर डिफेंस सिस्टम तैयार करते हैं। रेंज के लिहाज से भारत की एस- 400 की रेंज बेहतर है। वहीं कुशा के शामिल होने लॉन्ग रेंज बैकअप रहेगा।

पाकिस्तान के पास एलवाई (एचक्यू-16) सीमित रेंज का एयर डिफेंस सिस्टम है। जो मुख्यतया चीन पर निर्भर है।

ऐसे होगी आसमान की सुरक्षा

-लॉन्ग एयर रेंज डोमिंनेंस – एस-400 और कुशा (एम-3) रेंज 400 किमी तक

-मिड एयर रेंज डोमिंनेंस – कुशा (एम2, एम1) 150 से 250 किमी तक

-लो-मिडलेयर – आकाश और क्यूआरएसएएम 25 से 60 किमी तक

रूसी एस-400 और प्रोजेक्ट कुशा में अन्तर

पैरामीटर एस-400 कुशा
अधिकतम रेंज 400 किमी 350–400 किमी
टारगेट एंगेजमेंट 36 टारगेट एक साथ
)
मल्टी-टारगेट (नेटवर्क आधारित)

मिसाइल प्रकार 4 वैरिएंट 3 लेयर (एम1, एम2, एम3

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