
नई दिल्ली। पुराने उपभोक्ता संरक्षण कानून-1986 के स्थान पर नया उपभोक्ता संरक्षण कानून लोकसभा में पेश किया गया। उपभोक्ता मामलों के मंत्री राम विलास पासवान ने बताया कि 1986 के उपभोक्ता संरक्षण कानून के दायरे से जो विषय बाहर थे उसे नए उपभोक्ता संरक्षण विधेयक-2018 में शामिल किया गया है। नए विधयेक में केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण (सीसीपीए) के गठन का भी प्रावधान रखा गया है। इसका मकसद उपभोक्ताओं के अधिकारों के संरक्षण करना है। एजेंसी बेहद प्रभावी अमेरिकी फेडरल ट्रेड कमीशन की तरह काम करेगी।
सवाल. उपभोक्ता कानून में बदलाव की जरूरत क्यों है?
अब बाजार काफी बदल चुका है और ऐसे में नए कानून की जरूरत महसूस हो रही है। इससे ई-कॉमर्स, डायरेक्ट सेलिंग और टेली-मार्केटिंग की चुनौतियों से निपटने में आसानी होगी। नए कानून में निर्माता, सेवा प्रदाता की जवाबदेही सभी उपभोक्ताओं के प्रति होगी ना कि केवल एक उपभोक्ता तक सीमित होगी। इसमें विवादों को समय से निपटाने का प्रावधान है।
सवाल. इसमें सजा का प्रावधान क्या है?
उपभोक्ता को होने वाले नुकसान को राम विलास पासवान ने गंभीर अपराध मानते हुए नए विधेयक में शामिल करने की बात कही हंै। नए उपभोक्ता कानून के मसौदे में आपराधिक अदालतों में मुकदमा चलाने का प्रावधान किया गया है। ऐसे अपराधियों पर उपभोक्ताओं के नुकसान के हिसाब से कार्रवाई की जाएगी। दोषी पाए जाने पर भी लोग पुराने कानून में बच जाते थे, अब भारी जुर्माना व जेल की सजा का भी प्रावधान भी रखा गया है।
सवाल. व्यापारी, सर्विस प्रोवाइडर, विक्रेता कब दोषी माने जाएंगे?
जब उपभोक्ता या उसके सामान को प्रोडक्ट इस्तेमाल करने के बाद किसी तरह का नुकसान होता या फिर उपभोक्ता की मृत्यु हो जाती है तब वह उत्पादन की जिम्मेदारी के तहत व्यापारी, सर्विस प्रोवाइडर, विक्रेता से मुआवजे की मांग कर सकता है। नए बिल के मुताबिक खराब क्वालिटी और नकली समान बेचने के लिए उत्पादक दोषी माना जाएगा उसे अपने प्रोडक्ट की जिम्मेदारी लेनी होगी। उपभोक्ता संरक्षण विधेयक, 2015 में उत्पादन के प्रति जिम्मेदारी की बात तो की गई है लेकिन किन-किन परिस्थितियों में उपभोक्ता मुआवजे की मांग कर सकता है इसकी विस्तृत जानकारी नहीं थी।
सवाल. क्या इस विधेयक में ईकॉमर्स बाजार के बारे विशिष्ट प्रावधान है?
इस विधेयक में ई-कॉमर्स के बढ़ते बाजार को भी ध्यान में रखा गया है। आज लोग ऑनलाइन खरीदारी को तरजीह दे रहे हैं। इसलिए डिजीटल प्रोडक्ट व इलेक्ट्रॉनिक नेटवर्क पर भी नजर रखी गई है। इस तहत केंद्र सरकार ई-कॉमर्स इंडस्ट्री के अनुचित व्यापार पर नजर रखेंगी। हालांकि इसका असर ई-कॉमर्स इंडस्ट्री पर किस तरह होगा इसके बारे में कानून लागू होने पर ही पता चलेगा।
सवाल. अनुचित अनुबंध पर कैसे काम करेंगी?
दरअसल उपभोक्ता और निर्माता के बीच अनुचित अनुबंध को लेकर नए बिल में कोई बदलाव नहीं किया गया है। इस मामले में 2015 के बिल की तरह काम करेंगी। अनुचित अनुबंध के लिए छह शत्र्त रखी गई हैं। इनमें डिपोजिट के तौर पर ज्यादा पैसे देना, उल्लंघन और बिना कारण कॉन्ट्रैक्ट खत्म होने पर जुर्माना आदि शामिल है। इसके अलावा अगर कोई वजह रही तब विचार कर फैसला किया जाएगा।
सवाल. खाद्य सामग्री में मिलावट की सजा क्या है?
अब तक केवल खाद्य वस्तुओं में मिलावट का मसला फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड एक्ट-2006 के दायरे में था, बाकी वस्तुओं पर कानूनी कार्रवार्ई का प्रावधान नहीं के बराबर था। नए उपभोक्ता संरक्षण कानून में मिलावटखोरों पर शिकंजा कसा जा सकेगा। इसके तहत नकली उत्पादन बनाने, बेचने और मिलावट करने वालों पर सख्त कार्रवाई होगी, जो उपयुक्त कानून के अभाव में आसानी से छूट जाते थे।
सवाल. भ्रामक विज्ञापन से कैसे मदद करेंगी?
दरअसल पार्लियामेंट स्टैंडिंग कमेटी, २०१५ में भ्रामक विज्ञापन करने वाले सेलिब्रिटीज और संबंधित लोगों पर जुर्माने और जेल का प्रावधान रखने का सुझाव दिया था। जिस पर सरकार ने सेलिब्रिटीज को जेल भेज से मना कर दिया था। नए बिल में ब्रांड के साथ सेलिब्रिटी की भी जिम्मेदारी तय होगी। गुमराह करने वाले विज्ञापन पर भी कार्रवाई होगी। पहली बार अपराध करने पर 10 लाख रुपए जुर्माना और एक साल का प्रतिबंध, दूसरी बार अपराध में 50 लाख का जुर्माना, तीन साल तक के प्रतिबंध का प्रावधान है।
सवाल. 1986 से पहले क्या प्रावधान था?
1968 के पहले उपभोक्ताओं को दीवानी अदालतों के चक्कर लगाने पड़ते थे। इस समस्या से निपटने के लिए संसद ने जिला स्तर, राज्य स्तर और राष्ट्रीय स्तर पर विवाद पारितोष अभिकरणों की स्थापना का प्रस्ताव पारित किया था। यह जम्मू-कश्मीर के अलावा पूरे देश में लागू है।
Updated on:
09 Jan 2018 04:13 pm
Published on:
09 Jan 2018 12:07 pm
बड़ी खबरें
View Allविविध भारत
ट्रेंडिंग
