IAS ऑफिसर रमेश घोलप ( Ramesh Gholap ) साल की उम्र तक मां के साथ बेचते थे चूड़ियां 10वीं की परीक्षा से पहले पिता को हो गया था निधन काफी संघर्षपूर्ण रहा है IAS रमेश घोलप की Life
नई दिल्ली। एक कहावत है किसी चीज को दिल से चाहो, तो पूरी कायनात आपको उससे मिलाने की कोशिश करती है। कुछ ऐसी ही कर दिखाया है महाराष्ट्र ( Maharashtra ) के रहने वाले रमेश घोलप ( Ramesh Gholap ) ने। इन्होंने 10 साल की उम्र तक मां के साथ सड़कों पर चूड़ियां बेची, लेकिन आज एक शीर्ष IAS अधिकारी बन चुके है। इनका जीवन काफी संर्घषों से भरा रहा, लेकिन नजरें लक्ष्य पर टिकी थी। परिणाम आज इनकी गिनती देश कद्दावर IAS ऑफिसरों में होती है।
मां के साथ चूड़ियां बेचा करते थे रमेश
रमेश घोलप ( IAS Ramesh Gholap ) मूलरूप से महाराष्ट्र सोलापुर ( Solapur ) जिल के महागांव के रहने वाले हैं। रमेश का बचपन काफी कष्ट और संघर्ष भरा था। मां दिनभर चूड़ियां और जो पैसे कमाती उनके पिता जी उसे शराब पीने में खर्च कर देते। IAS रमेश घोलप के पिता की साइकिल रिपेयर की दुकान थी। परिवार को बड़ी मुश्किल से एक वक्त का खाना नसीब हो पाता था। आलम ये था कि न तो रहने के लिए घर था और ना ही पढ़ने के लिए पैसे। रमेश उनकी मां मौसी के इंदिरा आवास वाले घर में रहते थे। काफी समय तक जिदंगी ऐसी ही बीती। रमेश जब 10वीं की परीक्षा देने वाले थे तो उससे एक महीने पहले पिता का निधन हो गया। मन पर गहर आघाता पहुंचा, लेकिन हिम्मत नहीं हारी और 88.50 प्रतिशत अंकों के पास 10वीं का इम्तिहान पास किया।
पैसे कमाने के लिए पोस्टर तक लगाए
बेटे में पढ़ने की जिज्ञयासा देख मां ने सरकारी ऋण योजना के तहत गाय खरीदने के नाम पर 18 हज़ार रुपए कर्ज लिए। माँ से कुछ पैसे लेकर रमेश IAS बनने का सपना लिए पुणे ( Pune ) पहुंचे। यहीं से रमेश की जिंदगी का असली सफर शुरू हुआ। रमेश दिनभर काम करते और रात को पढ़ाई। आपको जानकर हैरानी होगी कि पैसा कमाने के लिए रमेश शादी की पेंटिग, दुकानों का प्रचार, और दीवारों पर इश्तेहार लगाते थे। पहली बार IAS की परीक्षा दिए कामयाबी नहीं मिली। लेकिन, कहते हैं न भगवान के घर देर है अंधेर नहीं। दूसरी बार साल 2011 में उन्होंने फिर UPSC की परीक्षा दी और 287वां रैंक हासिल किया। इतना ही नहीं राज्य सर्विस की परीक्षा में रमेश घोलप टॉप किए थे। ऑफिसर बनकर जब रमेश उन्हीं गलियों में लौट, जहां कभी चूड़ियां बेचा करते थे तो लोगों ने उनका जमकर स्वागत किया। रमेश कहते हैं कि ज कभी वह बेसहारे की मदद करते हैं तो उन्हें अपनी मां की वह स्थिति याद आ जाती है, जब पेंशन के लिए उनकी अधिकारियों के दरवाजे पर गिरगिराते रहती थी। आज रमेश लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा बन चुके हैं।