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जस्टिस लोढा बोले- न्यायपालिका की स्‍वतंत्रता खतरे में, निशाने पर चीफ जस्टिस

एक पुस्‍तक विमोचन के दौरान अधिकांश पूर्व न्‍यायाधीशों ने चीफ जस्टिस का नाम लिए बगैर उनकी कार्यशैली पर सवाल उठाया।

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Dhirendra Kumar Mishra

May 02, 2018

supreme court

नई दिल्‍ली। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आरएम लोढा ने बेबाक शैली में न्यायपालिका के समक्ष उत्‍पन्‍न संकट को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए कहा कि न्यायपालिका की व्यवस्था दरक रही है। हालात लगातार बिगड़ रहे हैं और उसकी स्‍वतंत्रता खतरे में है। न्यायपालिका पर कार्यपालिका का असर यूं ही जारी रहा तो लोकतंत्र खतरे में पड़ जाएगा। उन्‍होंने चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा को आड़े हाथ लेते हुए कहा कि वो न्यायपालिका की स्वायत्तता की गारंटी नहीं दे पा रहे हैं। उन्‍होंने कहा कि अभी बहुत कुछ किया जाना है क्योंकि हमारा लोकतंत्र अभी मजबूत नहीं हो पाया है। इस समस्‍या से पार पाने के लिए हमारे पास समय कम है और सुधार का काम ज्यादा। ये बात उन्‍होंने अरुण शौरी की नई किताब अनिता गेट्स बेल का विमोचन के दौरान कही।

पारदर्शी मैकेनिज्‍म बने
जस्टिस लोढा ने कहा कि ये नेतृत्व की कमजोरी ही है। वर्ना न्यायपालिका की अपनी गरिमा है। इसे वापस लाना होगा। यह स्थिति इसलिए उत्‍पन्‍न हुई है क्‍योंकि कई तथ्यों के बताए जाने पर भी सुप्रीम कोर्ट ने उनकी अनदेखी की। ऐसे मामलों को लेकर सर्वोच्च न्यायपालिका ने संतोषजनक जवाब नहीं दिया। आज पूरी पारदर्शिता के समय में न्यायपालिका को भी चाहिए कि अपने ऊपर उठने वाले सवालों के जवाब देने के लिए या खुद को पाक साफ दिखाने के लिए कोई ऐसा ही पारदर्शी मैकेनिज्म बनाए जिससे न्‍यायपालिका में लोगों का इकबाल कायम रहे।

कोर्ट ज्‍यादा, न्‍याय कम
वरिष्ठ वकील और संविधान के जानकार फली एस नारीमन ने कुछ तंज कसते हुए कहा कि हमारे यहां कोर्ट ज्यादा न्याय कम है। वहीं कोलेजियम की मीटिंग ज्यादा और उससे निकलने वाले नतीजे कम हैं। बहुत से बड़े और पेचीदा मामलों की सुनवाई ट्राइब्यूनल को सौंप दी जाती है। फिर उसी ट्राइब्यूनल के फैसले को कोर्ट में चुनौती दी जाती है। उसके बाद सुनवाई का दौर शुरू हो जाता है। अपील दर अपील होने से न्याय व्यवस्था में विश्वास का आधार पूरी तरह से कमजोर हो गया है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एपी शाह ने तो सीधे मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा पर निशाना साधते हुए कहा कि कभी जज लोया की मौत के मुकदमे की आड़ से तो कभी अरुणाचल के पूर्व मुख्यमंत्री कलिखो पुल की खुदकुशी से पहले लिखे गए पत्र से कठघरे में आये सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश या फिर प्रसाद फाउंडेशन के जरिए जमीन घोटाले का मामला हो। हर मामले में न्‍यायपालिका की साख को बट्टा लगा है। उन्‍होंने चीफ जस्टिस पर सवाल उठाते हुए कहा कि उनकी नजर में जज लोया की मौत की जांच की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पूरी तरह गलत था। क्योंकि इस मामले में ट्रायल कोर्ट का जजमेंट बिना ट्रायल के ही आ गया।

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