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नानाजी देशमुख: संघ के लिए खपा दिया पूरा जीवन, समाजसेवा के लिए ठुकराया था मंत्री पद

नानाजी देशमुख, भूपेन हजारिका और प्रणब मुखर्जी को भारत देने का ऐलान किया गया है।

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Kapil Tiwari

Jan 25, 2019

bharat  ratan

Nanaji Deshmukh

नई दिल्ली। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के द्वारा भारत रत्न के लिए तीन नामों का ऐलान कर दिया गया है। केंद्र की मोदी सरकार की तरफ से प्रस्तावित तीनों नामों पर राष्ट्रपति ने मंजूरी दे दी है। जिन तीन नामों का ऐलान भारत रत्न के लिए किया गया है, उनमें भारतीय समाजसेवी और जनसंघ के नेता नानाजी देशमुख, गायक भूपेन हजारिका और पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नाम शामिल है।

तीनों हस्तियों ने अपने-अपने स्तर पर इस देश के लिए अहम योगदान दिया है।

कौन थे नानाजी देशमुख

समाजसेवा के लिए ठुकरा दिया था मंत्रीपद

- भारत के प्रख्यात समाजसेवी नानाजी देशमुख का जन्म महाराष्ट्र के परभणी जिले में 11 अक्टूबर सन 1916 को एक ब्राह्मण परिवार में हुआ था। नानाजी देशमुख का राजनीति से भी नाता रहा है। पूर्व में वो भारतीय जनसंघ के नेता रहे हैं। इसके अलावा मोरारजी देसाई की सरकार में वो मंत्री भी चुने गए थे, लेकिन उन्होंने ये कहकर मंत्री पद ठुकरा दिया कि 60 वर्ष से अधिक उम्र के लोग सरकार से बाहर रहकर समाजसेवा का काम करें। नानाजी पूरे जीवन दीनदयाल शोध संस्थान के अन्तर्गत चलने वाले विविध प्रकल्पों के विस्तार हेतु कार्य करते रहे। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य मनोनीत किया। अटलजी के कार्यकाल में ही भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा, स्वास्थ्य व ग्रामीण स्वालम्बन के क्षेत्र में अनुकरणीय योगदान के लिये पद्म विभूषण भी प्रदान किया।

पूरा जीवन कर दिया था संघ के नाम

- इसके अलावा आरएसएस को खड़ा करने में उनका अहम योगदान रहा। संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से नानाजी के पारिवारिक सम्बन्ध थे। नानाजी की उभरती सामाजिक प्रतिभा को पहचानते हुए हेडगेवार ने उन्हें संघ की शाखा में आने के लिए कहा। सन 1940 में हेडगेवार के निधन के बाद आरएसएस को खड़ा करने की ज़िम्मेदारी नानाजी पर आ गई और इस संघर्ष को अपने जीवन का मूल उद्देश्य बनाते हुए नानाजी ने अपना पूरा जीवन संघ के नाम कर दिया।

गांवों के उदय के लिए अतुल्नीय रहा योगदान

- जब बात समाजसेवा की आती है तो ग्रामीण इलाकों के लिए उनका योगदान अतुल्नीय है। ग्रामोदय से राष्ट्रोदय के अभिनव प्रयोग के लिए नानाजी ने 1996 में स्नातक युवा दम्पत्तियों से पांच वर्ष का समय देने का आह्वान किया। पति-पत्नी दोनों कम से कम स्नातक हों, आयु 35 वर्ष से कम हो तथा दो से अधिक बच्चे न हों। इस आह्वान पर दूर-दूर के प्रदेशों से प्रतिवर्ष ऐसे दम्पत्ति चित्रकूट पहुंचने लगे। चयनित दम्पत्तियों को 15-20 दिन का प्रशिक्षण दिया जाता है। प्रशिक्षण के दौरान नानाजी का मार्गदर्शन मिलता है। नानाजी उनसे कहते हैं- "राजा की बेटी सीता उस समय की परिस्थितियों में इस क्षेत्र में 11 वर्ष तक रह सकती है, तो आज इतने प्रकार के संसाधनों के सहारे तुम पांच वर्ष क्यों नहीं रह सकतीं?"