पहाड़ पर युद्धाभ्यास: काम आया सियाचिन का सबक, भारत ने चीन पर हासिल की बढ़त

Highlights.

- भारतीय सेना पिछले कुछ दशकों से सियाचिन और इस जैसे कुछ दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में लगातार युद्ध अभ्यास करती रही है

- इससे जवानों ने इन क्षेत्रों में तैनाती और युद्ध के दौरान आने वाली चुनौतियों का सामना करने में सफलता हासिल की है

- सियाचिन क्षेत्र, पूर्वी लद्दाख से भी दुष्कर है, इसलिए भारतीय सैनिकों को पीएलए से मुकाबले के दौरान ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ा

नई दिल्ली।

लगभग 8 महीने से भारत और चीन के बीच सीमा (एलएसी) पर तनाव है। यह पहली बार नहीं है। दोनों देशों के सैनिकों के बीच इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में ऐसे तनाव के क्षण पहले भी आते रहे हैं और यह भारतीय सैनिकों के लिए अक्सर काफी मुश्किलभरा साबित होता था, मगर इस बार हमारे जवानों ने पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को जिस दृढ़ता से जवाब दिया, वह सियाचिन के सबक का असर भी माना जा रहा है।

बता दें कि भारतीय सेना ने बीते कुछ दशकों में पहाड़ पर अपने युद्धाभ्यास को काफी गंभीरता से लिया है। सियाचिन इनमें से एक है। यहां जवानों ने तमाम चुनौतियों का सामना किया और कठिन तप से दुर्गम पहाड़ पर खुद को जीवट बनाए रखने में कामयाबी पाई। निश्चित रूप से इसका सुखद परिणाम कारगिल और बीते कुछ महीनों में चीन से हुई हिंसक तकरार के दौरान देखने को मिला है।

सियाचिन, जो कि दुनिया का सर्वोच्च ऊंचाई वाला युद्ध क्षेत्र भी है, यहां भारतीय सेना पिछले कुछ दशकों से लगातार कठिन युद्धाभ्यास कर रही है। इस दौरान यहां कई सबक हमारे जवानों ने सीखे और यह उसे अब तक अद्भुत और अद्वितीय सफलता दिलाते रहे हैं।

कठिन चुनौतियों का सामना करने में कामयाब हुए हमारे जवान

भारतीय सेना के कई अधिकारी और रक्षा विशेषज्ञ, जो पहाड़ पर लड़े जाने वाले युद्ध से बखूबी परिचित हैं, इस बात से बिल्कुल सहमत हैं कि सियाचिन पर हमारे वीर जवानों की ओर से किया जा रहा युद्धाभ्यास और दुर्गम पहाडिय़ों पर उनकी मौजूदगी भारत को उत्तर तथा उत्तर-पूर्व क्षेत्र में लगातार मजबूत बना रही है। विशेषज्ञों के मुताबिक, उच्च ऊंचाई वाले युद्ध क्षेत्र में भारतीय सैनिकों को युद्ध का अनुभव नहीं था। यह स्थिति करीब 80 के दशक तक बनी रही, मगर पाकिस्तान और चीन की सेना के लगातार घुसपैठ के बाद भारत ने इस क्षेत्र में अपनी सीमा सुरक्षित करने के लिए नई और कठिन चुनौतियों का सामना करते हुए अपने सैनिकों को प्रशिक्षण देना शुरू किया।

इस ठंड में भी 20 हजार फीट की ऊंचाई वाले क्षेत्र में तैनात हैं सैनिक

चीन ने वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) को विवादित स्वरूप देते हुए जब गत जून-जुलाई में पैंगोंग त्सो झील और इससे सटी पहाडियों पर कब्जे की कोशिश की, तो भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया। यह पहली बार है कि तब सेे अब तक लगातार भारत और चीन की सेना इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में भारी लाव-लश्कर के साथ तैनात हैं। हालांकि, इस तनाव को कम करने के लिए दोनों देशों के बीच सैन्य और राजनयिक दोनो स्तर पर लगातार चर्चा हो रही है, मगर ठोस नतीजा अब तक सामने नहीं आया।

शारीरिक और मानसिक तौर पर सैनिकों ने खुद को तैयार किया

विशेषज्ञों के अनुसार, अगर भारतीय सेना इस कड़ाके की ठंड में भी करीब 20 हजार फीट की ऊंचाई पर मुस्तैदी से जमी हुई है, तो यह सियाचिन के सबक का नतीजा है। वहां युद्ध अभ्यास करने से सैनिकों ने न सिर्फ शारीरिक बल्कि, मानसिक रूप से खुद को तैयार किया है। इन ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैनिकों ने खुद में शारीरिक तथा मानसिक तौर पर रहन-सहन विकसित करने में अद्भुत सफलता पाई है, जिससे उन्हें इस कठिन मौसम में भी वहां रहने में ज्यादा दिक्कत नहीं हो रही। इसके अलावा, भारतीय सेना ने भी इस क्षेत्र में अपनी पहुंच सुगम बनाने के लिए काफी काम किया है। इन वजहों से चीन इस बार भारत पर दबाव बनाने में सफल नहीं हो सका।

हेलीकॉप्टर पायलट इस क्षेत्र में तैनात सैनिकों की जीवन रेखा

विशेषज्ञों की मानें तो सियाचिन की स्थितियां पूर्वी लद्दाख की तुलना में ज्यादा चुनौतीपूर्ण हैं। उत्तर सेना के पूर्व कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल डीएस हुड्डा के मुताबिक, जीवटता, स्वास्थ्य देखभाल, ठंड की चोटों से सुरक्षा और हिमस्खलन से बचाव का सबक भारतीय सैनिकों ने सियाचिन में ही सीखा। सेना और वायुसेना के हेलीकॉप्टर पायलट सियाचिन में तैनात सैनिकों की जीवन रेखा हैं। ये पायलट उच्च ऊंचाई वाले अभियानों से अच्छी तरह परिचित हैं। पूर्वी लद्दाख में सेना के अभियान में यह काफी मददगार साबित हो रही है।

पहाड़ी क्षेत्रों में उड़ान मुश्किल, तकनीशियनों की टीम भी है तैनात

पूर्वी लद्दाख में, भारतीय सैनिक पैंगोंग त्सो के उत्तरी तट पर फिंगर एरिया में लगभग 20,000 फीट की ऊंचाई पर तैनात हैं। भारतीय वायुसेना के पास ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हवाई रखरखाव का दशकों का अनुभव है। 15,000 फीट से अधिक की ऊँचाई और हेलीकॉप्टर तथा परिवहन विमान, दोनों के लिए टेम्पलेट के रूप में कार्य करने के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं है, जिनका पालन किया जाता है। पहाड़ी क्षेत्रों में उड़ान (हिल फ्लाइंग) काफी मुश्किल है। इन क्षेत्रों में हर हेलीपैड की अपनी खासियत होती है। भारतीय सेना के पास इस तरह के संचालन के लिए अनुभवी पायलट हैं। हेलीकॉप्टर और परिवहन विमान को फिट रखने के लिए तकनीशियनों की टीम भी इस क्षेत्र में तैनात रहती है।

सैनिकों को रहने के लिए इस क्षेत्र में बनाए जा रहे आधुनिक आवास

भारत अब चीन की हर नापाक कोशिशों को दृढ़ता से विफल करने में जुटा है। भारतीय सेना अब इस क्षेत्र में तैनात अपने सैनिकों के रहने के लिए आवास और दूसरी बुनियादी जरूरतों को पूरा करने पर तेजी से काम कर रही है। यहां कई क्षेत्रों में पारा माइनस 40 डिग्री तक पहुंच जाता है, इसलिए इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार करने के दौरान आने वाली हर चुनौतियों तथा मुश्किलों को ध्यान में रखा जा रहा है।

वहीं, इसके विपरित चीन की सेना इस क्षेत्र में सैनिकों को जुटाने और तैनाती के दौरान बुनियादी जरूरतों को पूरा करने में मुसीबतों का सामना कर रही है।

Ashutosh Pathak
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