
नई दिल्ली। भारतीय पुरातत्व विभाग (एएसआई) ने पहली बार आधिकारिक रूप से माना है कि ताजमहल कोई मंदिर नहीं बल्कि एक मकबरा है। अधिकारियों के मुताबिक लगभग सौ साल पुराने अंग्रेजों के समय के नोटिफिकेशन के आधार पर एएसआई ने ये दावा कोर्ट में पेश किया है। विभाग ने स्थानीय कोर्ट को सौंपी गई अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि ताजमहल मंदिर नहीं बल्कि मुमताज की याद में बनवाया गया मकबरा ही है। एएसआई ने इस तर्क को मानने से भी इनकार कर दिया है कि ताजमहल हिंदुओं का शिव मंदिर है।
ये है मामला
दरअसल स्थानीय कोर्ट में इस संबंध में एक याचिका आठ अप्रैल 2015 में लखनऊ के गोमती नगर निवासी अधिवक्ता हरीशंकर जैन और उनके पांच साथियों ने दायर की थी। याचिका में कहा गया था कि ताजमहल कोई मकबरा नहीं बल्कि हिंदुओं का मंदिर है। उनका कहना था कि वहां दर्शन करने और पूजा आरती की अनुमति दी जानी चाहिए।
तेजोमहालय मंदिर था ताजमहल !
याचिका में कहा गया है कि ताजमहल दरअसल एक शिव मंदिर है जिसका वास्तविक नाम तेजोमहालय है। इसका निर्माण राजा परामार्दी देव ने 12वीं सदी में (सन्1212) में करवाया था। उनके बाद इस पर जयपुर के राजा मानसिंह का अधिकार रहा। बाद में सन् 1632 में शाहजहां ने इसे अपने कब्जे में ले लिया।
सात अजूबों में से एक
एएसआई ने कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा है कि इतिहास में दर्ज जानकारी के मुताबिक आगरा में यमुना के किनारे स्थित ताजमहल एक ऐतिहासिक स्मारक है। इसे दुनिया के सात अजूबों में से एक माना जाता है। सरकार भी ऐसा ही मानती रही है। ब्रिटिश काल में साल 1904 से ही इसे एक संरिक्षत स्मारक का दर्जा मिल गया था। इसका नोटिफिकेशन २२ दिसम्बर 1920 को जारी किया गया था। मुगल बादशाह शाहजहां (सन् 1628-1658) ने अपनी बेगम अर्जुमंद बानो बेगम (मुमताज महल) की याद में इसे बनवाया था।
11 सितंबर को सुनवाई
इस याचिका में केंद्र सरकार और केंद्रीय पुरातत्व विभाग को पक्षकार बनाया गया है। दोनों की ओर से पैरोकार ने गुरुवार को कोर्ट में जवाब दाखिल किया। इस मामले में अब कोर्ट की अगली सुनवाई 11 सितंबर को होगी।
Published on:
26 Aug 2017 02:49 pm

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