
Udham Singh was not afraid of death, after 34 years his body was sent to India
नई दिल्ली। "मुझे सजा-ए-मौत की कोई फिक्र नहीं है.... मैं एक मकसद पूरा करने के लिए मौत को गले लगाने जा रहा हूं.... मैंने वो इसलिए किया क्योंकि मुझे माइकल ओ' ड्वायर से शिकायत थी और वही असल मुजरिम था... वह चाहता था कि मेरे लोगों का हौसला कुचल दे, इसलिए उसे मैंने ही कुचल डाला।" यह कहना था उस शख्स का जिसकी ना आंखों में मौत का कोई डर था और ना ही माथे पर शिकन, जिसने अपने मकसद को पूरा करने के लिए 21 सालों का लंबा इंतजार किया और उसे अंजाम देने के बाद खुशी-खुशी मौत को गले लगा लिया। जलियावालां बाग नरसंहार के दोषी माइकल ओ' ड्वायर को लंदन में भरी सभा में गोली मारकर बदला लेकर ऊधम सिंह ने इतिहास में अपना नाम अमर कर लिया।
अपने देश की खातिर यह कदम उठाने वाले भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महान सेनानी और क्रांतिकारी ऊधम सिंह ने जिंदा रहते हुए माइकल ओ' ड्वायर को मारना ही अपनी जिंदगी का मकसद बना लिया था, लेकिन मौत के बाद भी शायद उनकी रूह अपने वतन को ना पाकर परेशान रहती होगी। शायद यह भी एक वजह रही होगी जो मौत के 34 साल बाद ऊधम सिंह की कब्र को खोदकर उनके पार्थिव शरीर को निकाला गया और विमान से भारत भेजा गया।
अल्फ्रेड ड्रेपर द्वारा लिखी गई किताब 'अमृतसर: द मैसकर दैट एंडेड द राज' में ब्रिटिश सरकार द्वारा ऊधम सिंह पर चलाए गए मुकदमे के दौरान कही गई बात का जिक्र है। मुकदमे के दौरान ऊधम सिंह ने ब्रितानी हुकूमत की धूल मिट्टी में मिलाने का एक भी मौका नहीं छोड़ा। वहीं, जब अंग्रेज जज ने ऊधम सिंह से सीधे यह सवाल पूछा कि 'बस ये बताओ कि तुम्हें फांसी की सजा क्यों नहीं दी जाए।' इसके जवाब में ऊधम सिंह ने जोरदार आवाज में कहा, "मुझे सजा-ए-मौत की कोई फिक्र नहीं है..."
उन्होंने आगे कहा, "मैंने बदला (माइकल ओ' ड्वायर से) लेने के लिए पूरे 21 वर्षों तक लंबा इंतजार किया है... मुझे इस बात की खुशी है कि मैं अपने मकसद में कामयाब रहा... मुझे मौत से डर नहीं लगता है और मैं अपने वतन के लिए जान दे रहा हूं...।"
इसके बाद 31 जुलाई 1940 को पेंटनविले जेल में ऊधम सिंह को फांसी दे दी गई। उनकी कब्र में ताबूत पर आखिरी मिट्टी डालने के दौरान संभवता अंग्रेजों ने यह जरूर सोचा होगा कि अब ताबूत के साथ ऊधम की कहानी भी दफन हो गई है, हालांकि ऐसा हुआ नहीं। वक्त बीतता गया और 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हो गया। इस बीच भारत में कई बदलाव हुए।
इसके बाद 19 जुलाई 1974 की तारीख अंग्रेजों के लिए जख्म कुरेदने वाली साबित हुई और ऊधम सिंह के पार्थिव शरीर को उनकी कब्र खोदकर बाहर निकाला गया। इसके बाद एयर इंडिया के विशेष विमान से उनका पार्थिव शरीर भारत लाया गया। दिल्ली एयरपोर्ट पर पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री ज्ञानी जैल सिंह और शंकर दयाल शर्मा ने उनके पार्थिव शरीर का स्वागत किया।
इस दौरान एयरपोर्ट पर भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री स्वर्ण सिंह भी मौजूद थे और हवाई अड्डे से ऊधम सिंह के पार्थिव शरीर को कपूरथला हाउस पहुंचाया गया। वहां पर प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद मौजूद थीं। इसके बाद भारत में ऊधम सिंह की शव यात्रा निकाली गई और जहां भी यह यात्रा पहुंचती, हजारों की तादाद में लोग स्वागत करते और ऊधम सिंह अमर रहे के नारे लगाते।
ज्ञानी जैल सिंह ने ऊधम सिंह का अंतिम संस्कार किया और उनकी चिता को मुखाग्नि दी। इसके बाद 2 अगस्त 1974 को उनकी अस्थियों को इकट्ठा करने के बाद सात कलशों में रखा गया और इनमें से एक को हरिद्वार, एक को किरतपुर साहिब गुरुद्वारा और एक को रउजा शरीफ भी भेजा गया।
जबकि सातवें और आखिरी कलश को 1919 में नरसंहार का गवाह बने जलियांवाला बाग ले जाया गया। वर्ष 2018 में यहां बाग के बाहर ऊधम सिंह की एक आदमकद प्रतिमा स्थापित की गई, जिसमें वह अपनी मुट्ठी में खून से सनी मिट्टी उठाए हुए दिख रहे हैं।
बता दें कि 26 दिसंबर 1899 को पंजाब के संगरूर जिला स्थित सुनाम गांव में जन्में ऊधम सिंह जब दो साल के थे तब उनकी मां और 8 वर्ष की उम्र में पिता का निधन हो गया था। उनके बचपन का नाम शेर सिंह था। इसके बाद वह अपने बड़े भाई मुक्तासिंह के साथ अमृतसर स्थित एक अनाथालय में रहे। हालांकि अनाथालय में उनका नाम ऊधम सिंह और भाई का नाम साधु सिंह रखा गया। 1917 में उनके भाई का भी निधन हो गया और वो पूरी तरह अनाथ हो गए। इसके बाद 1919 में उन्होंने अनाथालय छोड़ा और देश के स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ गए।
जलियांवाला बाग नरसंहार में फायरिंग का आदेश देने वाले ब्रिगेडियर रेजिनॉल्ड डायर की मौत के बाद ऊधम सिंह का निशाना पंजाब के तत्कालीन लेफ्टिनेंट गवर्नर माइकल ओ' ड्वायर थे, क्योंकि उन्होंने ही हर बार इस नरसंहार को उचित बताया था। ऊधम सिंह पर मशहूर किताब 'दे पेशेंट असैसिन' में लेखिका अनीता आनंद लिखती हैं कि अंग्रेजों ने ऊधम सिंह का नाम जलियांवाला बाग से ना जुड़े इसकी जमकर कोशिशें की, लेकिन सफल नहीं हो सके। उनके मुताबिक नरसंहार वाले दिन ऊधम पंजाब में तो थे, लेकिन जलियांवाला बाग में नहीं थे।
इसके बाद 1933 में एक फर्जी पासपोर्ट लेकर ऊधम सिंह ब्रिटेन पहुंचे और वहां रहने लगे। 1937 में वह लंदन स्थित शेफर्ड बुश गुरुद्वारे में नजर आए, जहां बिना दाढ़ी के बेहतरीन सूट में अंग्रेजी में बातें कर रहे थे। ड्रेपर ने अपनी किताब में जिक्र किया है कि माइकल ओ' ड्वायर की हत्या के एक दिन पहले यानी 12 मार्च 1940 को ऊधम ने अपने कई दोस्तों को दावत पर बुलाया और सबका मुंह मीठा कराने के बाद घोषणा की कि अगले दिन लंदन में एक ऐसा काम होगा, जो अंग्रेज हुकूमत की नींव हिला देगा।
13 मार्च 1940 को राम मोहम्मद सिंह आजाद नाम का अपना आई-कार्ड कोट की ऊपर की जेब में डालकर वह सेंट्रल लंदन स्थित कैक्सटन हॉल पहुंचे। उन्होंने अपनी पैंट की जेब में आठ गोलियां रखी हुई थीं और कोट के अंदर स्मिथ एंड वेजेन मार्क टू रिवॉल्वर। हॉल के भीतर उन्होंने ड्वाएर के ऊपर दो गोलियां दाग दीं और वह वहीं गिर गया। इसके बाद हॉल के स्टेज पर खड़े स्टेट ऑफ इंडिया के सेक्रेटरी लॉर्ड जेटलैंड को भी दो गोलियां मारीं, जबकि बॉम्बे के पूर्व गवर्नर लॉर्ड लैमिंग्टन और पंजाब के पूर्व एलजी सुई डेन को भी एक-एक गोली मारी।
Updated on:
13 Mar 2021 03:21 am
Published on:
13 Mar 2021 03:04 am

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