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इंदरगढ़/ग्वालियर। 20 जुलाई से सावन का महीना शुरू हो गया है। इस महीने में शिव मंदिर में शिवलिंग की पूजा के लिए भक्तों की कतार बढ़ जाती है। सेंवढ़ा-दतिया रोड पर इंदरगढ़ से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर बसे ग्राम दोहर का नाम बहुत कम लोग जानते हैं कि दोहर क्यों पड़ा। इस गांव में एक अति प्राचीन शिव मदिर है जिसकी जलरी में भगवान भोले नाथ के एक साथ दो शिवलिंग हैं। दो शिवलिंग होने की वजह से ही इसका नाम दोहर पड़ गया।
दंत कथाओं के अनुसार दोहर में स्थित शिव मंदिर में भगवान भोलेनाथ का एक शिवलिंग हर वर्ष अपने स्थान से घूम जाता है। गांव के बुजुर्ग किशोरी शरण कुशवाहा के मुताबिक इस गांव में कारसदेव अपनी बहन अहलादी के साथ रहते थे जो शिवभक्त थीं। अहलादी प्रतिदिन हर रोज मिट्टी के शिवलिंग बना कर पूजा करती थीं।
एक बार राजा उनसे मिल गया तो अहलादी के साधना में लीन होने की वजह से उन्होने पिंडी को उठाया जो उनसे हाथ से छूट कर जमीन पर गिर गई। इससे अहलादी क्रोधित हुई तो राजा के महल में आग लग गई। राजा तुरंत महल की ओर वापस आ गया। बाद में राजा नए शिवलिंग का निर्माण करा कर अहलादी के आश्रम में पहुंचा तब अहलादी शिवलिंग का निर्माण कर चुकी थी। लेकिन राजा के लाए हुए शिवलिंग का अनादर न हो इसलिए उन्होंने उसी जलरी में दूसरा शिवलिंग रख दिया तभी से गांव के मंदिर में एक जलरी में दो शिवलिंग हैं और इसका गांव का नाम दोहर पड़ गया। गांव में कारसदेव बाबा का चबूतरा भी है।