
मुरैना. बाबूजी! नाबार्ड ने चार साल पूर्व फलदार पौधे लगवाए थे, न तो पौधों में फल आए हैं और न हम फसल कर पा रहे हैं। इसके अलावा इन पौधों को तैयार करने पर लाखों रुपए का कर्ज और हो गया। अब स्थिति यह है कि परिवार के पालन पोषण में परेशानी आ रही है। यह दर्द है, पहाडग़ढ़ विकासखंड के उन आदिवासियों का जिनके खेतों में फलदार पौधे रोपे गए थे। इस योजना के तहत आदिवासियों को आत्मनिर्भर बनाना था। लेकिन आदिवासी इस योजना के चलते अपनी फसल भी नहीं कर पा रहे हैं।
राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) के तहत पहाडग़ढ़ विकासखंड के दस गांव में वाड़ी परियोजना के तहत चार साल पूर्व 450 आदिवासियों को फल उद्यान और 50 भूमिहीन आदिवासियों को पशुपालन के लिए 3.34 करोड़ की राशि अनुमोदित की थी। इस काम को बिहार की ‘रियेक्ट’ नामक एनजीओ को काम दिया गया था। पहली साल में 200 वाड़ी योजना और दूसरी साल में 60 वाड़ी योजना विकसित करनी थीं लेकिन एनजीओ की गलत मंशा और अधिकारियों की अनदेखी के चलते ये योजनाएं शुरू होने से पहले ही दम तोड़ चुकी हैं। स्थिति यह है कि इस योजना के चलते आदिवासी परिवार न तो फसल कर पा रहे हैं और न ही फल वाले पौधे तैयार हो सके हैं। पिछले चार साल से आदिवासी परिवार इसी भरोसे रात दिन मेहनत कर रहे हैं कि उनकी आमदनी का श्रोत शुरू हो जाएगा। खेतों में पौधे लगा दिए इसलिए अन्य फसल (बाजरा, गेंहू, सरसों आदि) भी नहीं हो पा रही है। मजबूरन आदिवासियों को परिवार के भरण पोषण के लिए अन्य जगह काम करना पड़ रहा है।
आदिवासी विकास योजना के अंतर्गत पहाडग़ढ़ की जिन वाड़ी योजना के तहत आदिवासियों के खेतों में एनजीओ ने 70 अमरूद, 30 आम, 100 सागवान के पौधे रोपे गए थे, इनमें से सागवान, आम व अमरूद के ज्यादातर पेड़ सूख चुके हैं। दोबारा से अमरूद के कुछ पौधे रोपे गए हैं। उनमें भी अभी तक फल नहीं आए हैं।
पहाडग़ढ़ विकासखंड में नाबार्ड द्वारा कन्हार, मरा, खड़रिया पुरा सहित दस गांव की योजना के संचालन के लिए 3 करोड़ 34 लाख स्वीकृत किए थे। इनमें से बिहार की एनजीओ ने योजना के संचालन के नाम पर 50 लाख रुपए खर्च कर दिए जबकि आदिवासियों के लिए कोई ऐसा कार्य नहीं हो सका जिससे वह आत्मनिर्भर बन सकें।
नाबार्ड ने मरा गांव व कन्हार गांव की वाड़ी परियोजना के तहत सोलर ऊर्जा की प्लेट लगवाई लेकिन प्रोपर बिजली की सप्लाई नहीं मिलने से पानी की व्यवस्था ठप पड़ी है। आदिवासियों को भाड़े पर पानी लेना पड़ रहा है। वहीं एनजीओ ने सिर्फ आदिवासियों को पौधे दिए गए, उनको रोपना, उनकी कवायद उनके द्वारा ही स्वयं की गई।
बाजरा, तिली, सरसों व मूंगफली की फसल करते वह भी नहीं हो पा रही है। 12 बीघा में चार साल पूर्व पौधे लगवाए थे, बोर कर गए हैं, उसका बिजली का बिल हमको भरना पड़ रहा है। इन पौधों की देखभाल के लिए कर्ज और लेना पड़ रहा है।
नाबार्ड के द्वारा हम दो भाइयों की दस बीघा में अमरूद, पपीता आदि के फल लगवाए गए थे। पानी भाड़े पर लेना पड़ रहा है, बागड़ भी लगानी पड़ी। इस योजना के संचालन के लिए करीब डेढ़ लाख का कर्ज हो चुका है।
खेत में आम, अमरूद, पपीता, सागवान लगवाई लेकिन ज्यादातर पेड़ नष्ट हो गए। चौथी साल चल रही है, अभी तक हमको कुछ भी नहीं मिला है। सोलर पंप लगवाया था, वह भी पानी की सप्लाई नही दे पा रहा है।
पहाडग़ढ़ विकासखंड के आदिवासी बाहुल्य दस गांवों के लिए वाड़ी परियोजना शुरू की थी। इसके तहत 450 परिवारों के खेतों में फल उद्यान, 50 भूमिहीन परिवारों के लिए पशुपालन के लिए 3 करोड़ 34 लाख की राशि स्वीकृति हुई थी। इसका काम बिहार की एनजीओ ‘रियेक्ट’ को काम दिया था, वह काम नहीं कर पाया। इसलिए किसी अन्य एनजीओ को काम देकर दोबारा से काम शुरू किया जा रहा है।
Published on:
16 Jul 2025 04:01 pm
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