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chaturmas : दिव्येशचंद्र सागर का भायंदर में भव्य चातुर्मास प्रवेश

दिव्येश्चंद्र सागर ने भायंदर पश्चिम सीमंधर स्वामी जैन मंदिर में श्री पार्श्व-प्रेम श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में चातुर्मास प्रवेश के बाद विशाल धर्मसभा को संबोधित किया चातुर्मास के महत्व के बारे में विस्तार से बताया

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मुंबई

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Binod Pandey

Jul 09, 2019

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chaturmas : दिव्येशचंद्र सागर का भायंदर में भव्य चातुर्मास प्रवेश

मीरा भायंदर. धर्म आराधना का पर्व हैं चातुर्मास। इस पर्व में हम जितना धर्म करे कम हैं व्रत,भक्ति और शुभ कर्म को चार माह का चातुर्मास कहा गया हैं। धर्म साधना करनेवालों के लिए यह माह अत्यंत महत्वपूर्ण होते हैं। क्योंकि इन चार माह के दौरान साधु संतों का सानिध्य पूरी तरह प्राप्त होता है। गुरु भगवंतों द्वारा लोगों को सदमार्ग दिखाया जाता है। उपरोक्त विचार दिव्येश्चंद्र सागर ने भायंदर पश्चिम सीमंधर स्वामी जैन मंदिर में श्री पार्श्व-प्रेम श्वेताम्बर मूर्तिपूजक संघ के तत्वावधान में चातुर्मास प्रवेश के बाद विशाल धर्मसभा को संबोधित करते हुए व्यक्त किये। इस अवसर पर उन्होंने चातुर्मास के महत्व के बारे में विस्तार से बताया उन्होंने कहा जीवन में कभी काम से अपने को समय नहीं होगा लेकिन चातुर्मास के लिए हमे थोड़ा समय निकलना चाहिए। प्रवेश पर सामूहिक आयंबिल तप का आयोजन हुआ। गुरुदेव के साथ मुनि तत्तवेषचन्द्र सागर आदि ठाणा का भी प्रवेश हुआ।

आत्मा को उज्ज्वल पवित्र निर्मल बनाने का महनीय मंत्र है
ठाणे. साध्वी अणिमा व साध्वी मंगलप्रज्ञा के सानिध्य में सुश्री काव्या कोठारी ने कोपरी में अढ़ाई तप का पर व्याख्यान किया उपस्थित परिषद ने। अर्हम की हर्षध्वनि के साथ तपस्वी बहन का अभिवादन किया। साध्वी श्री आणिमा ने अपने मंगल उद्बोधन में कहा काव्या कोठारी चातुर्मास लगने से पूर्व संध्या पर अढ़ाई तप का उपहार लेकर आई है, दादर का कोठारी परिवार तप के क्षेत्र में आगे रहा है। मुंबई के हमारे हर चातुर्मास में कोठारी परिवार बड़ी तपस्या लेकर आया है। विमला कोठारी पखवाड़ा लेकर आई थी। मासाखमड लेकर आया है,मासाखमड बाकी है। यद्यपि पूर्व में कोठारी परिवार ने अनेक मासाखमंन हुए है। डालचंद ने जोड़े से मासखमण किया है और उस इतिहास को दोहराना है,काव्या ने छोटी उम्र में अढ़ाई कर दृढमनोबल एवं इच्छाशक्ति का परिचय दिया है। तप के क्षेत्र में निरंतर आगे रहना व तप कर्म निर्जरा का अमोघ साधन है। आत्मा को उज्ज्वल पवित्र निर्मल बनाने का महनीय मंत्र है। तप के द्वारा हम अपनी आत्मा का उर्ध्वारोहन करे और मनुष्य जीवन को सार्थक बनाए। साध्वीमंगलप्रज्ञा ने प्रेरणा-पाथेय प्रदान करते हुए कहा बरसात की झड़ी लगने से पूर्व तप की कड़ी लगा देना अपने आप मे महत्वपूर्ण है। तप की झड़ी सिर्फ जैन धर्म में ही लग सकती है।

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